Gen Z दिमागी नक्सल या देश का भविष्य?

दिमागी नक्सल एक ऐसा शब्द प्रधानमंत्री ने यूज कर दिया जो केवल उनके भक्तों, जिनके लिए अब राहुल ने अंध भक्तों का नाम दे दिया है और गोदी मीडिया के अलावा किसी के भी गले नहीं उतर रहा है;

Update: 2026-08-16 22:44 GMT

दिमागी नक्सल एक ऐसा शब्द प्रधानमंत्री ने यूज कर दिया जो केवल उनके भक्तों, जिनके लिए अब राहुल ने अंध भक्तों का नाम दे दिया है और गोदी मीडिया के अलावा किसी के भी गले नहीं उतर रहा है। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने तो इसे एक्सेप्ट करते हुए चुनौती दे दी कि हां मैं दिमागी नक्सल हूं! छात्र युवाओं ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी हैं।

यह दिमागी नक्सल क्यों कहा? क्योंकि सवाल उठाने वालों पर पहले ही सवाल उठा दो। बहुत पुराना तरीका है दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों और कुछ काम न करने वालों का कि हमेशा दूसरों पर ही सवाल उठाते रहो।

राहुल पर उठाते रहे। नेता प्रतिपक्ष तो अभी दो साल पहले बने हैं। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष भी करीब इतने ही समय रहे। मगर उन पर सवाल तो 2004 से जब वे अपने पहले चुनाव के लिए अमेठी से नामांकन भरने गए थे तब से उठाते रहे। 22 साल से ज्यादा हो गए हैं। हजारों करोड़ रूपया खर्च किया। उनकी छवि खराब करने में। खुद केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह जो अभी सदन में आकर जवाब नहीं दे पाए उसके बाहर बिना इंटरप्शन की बिना सवालों की एक मीडिया बाइट में कह रहे थे कि मुझे ऐसा ऐसा कहा जा रहा है।

खुद उन्होंने सदन में गाली देने के साथ जो कम से दो बार तो नोटिस में आ गई क्या-क्या कहा यह अलग बात है। लेकिन अभी बात राहुल की हो रही है तो उनको राहुल बाबा कहकर संबोधित किया।

एक बार उस अख़बार में जहां हम काम करते थे हेडिंग में राहुल बाबा छप गया। हमने मीटिंग में पूछा किसने लिखा है? कोई जवाब नहीं मिला। हमने कहा कोई भी किसी का नाम बदल या बिगाड़ नहीं सकता है। यह अधिकार किसी को नहीं है। माता-पिता को नाम रखने का अधिकार है और जिसका रखा गया है उसे बदलने का।

सभ्य समाज के लिए यही नियम है। जो बिगाड़ते हैं वे इनफियरटी काम्पलेक्स के शिकार होते हैं। गरीब का, कमजोर का, दलित, पिछड़े, आदिवासी का पूरा नाम उन्हें अपना अपमान लगता है। उसका नाम छोटा करके बिगाड़ के लेने में उनको खुशी मिलती है। दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों का यह पुराना तरीका है।

लोकतंत्र आया तो वे इसे अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए भी यूज करने लगे। राहुल के कई अपमानजनक नाम रख दिए। अब इस शृंखला में नया दिमागी नक्सल लाए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से कहा कि इन्हें पहचानने की जरूरत है। पहचान आप ही बता देते!

देश के प्रधानमंत्री हैं। सारे साधन आपके पास हैं। आप यह भी कह रहे हैं कि ये हिंसा अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। तब तो बड़ा खतरा है।

मोदी ने कहा कि इन्हें अलग थलग करने की जरूरत है। अलग थलग क्या करना? जब आप हिंसा कर रहे हैं, कह रहे हैं तो सख्त कार्रवाई की जरूरत है। लेकिन पहले पहचान तो बताइए!

बोलिए कि परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ आवाज उठाने, एजुकेशन सिस्टम से आरएसएस को बाहर करने की मांग करने वाले, नौकरी रोजगार मांगने वाले दिमागी नक्सल हैं।

देश के चालीस करोड़ छात्र और युवा दिमागी नक्सल हैं। आश्चर्यजनक रूप से देश का प्रधानमंत्री देश के छात्र और युवा के सामने खड़ा हो गया। तो उसके ठीक बाद नेता प्रतिपक्ष ने एक और गूंज की घोषणा कर दी। मगर इस बार यह गूंज थोड़ी अलग होगी।

'छात्राओं की गूंज!' अभी तक के तीन छात्र सम्मेलन राहुल ने सभी स्टूडेंट के किए हैं। छात्र-छात्रा सब। मगर इस बार 22 अगस्त को पूणे में छात्रा केन्द्रित कार्यक्रम होगा। राहुल ने कहा है कि क्या चाहिए देश की लड़कियों को? बराबरी, सुरक्षा, अवसर और अपनी बात कहने की आजादी।

और राहुल सवाल करते हैं कि इन्हें मिला क्या? असुरक्षा, भेदभाव और अपने असली अधिकारों के लिए इंतजार! तो एक तरफ प्रधानमंत्री देश की Gen Z और अल्फा को भी क्योंकि वह भी अपने स्कूलों और शिक्षा को लेकर सड़कों पर उतर चुकी है दिमागी नक्सल कह रहे हैं। जो हिंसा और अराजकता के लिए मौके की तलाश में हैं। तो दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी उन्हें देश का भविष्य बताते हुए उनके साथ और मजबूती से खड़े हो गए हैं।

पिछले कुछ दिनों का घटनाक्रम मोदी और राहुल को बार-बार आमने-सामने ला रहा है। संसद के मानसून सत्र में राहुल बार-बार चैलेंज करते रहे मगर प्रधानमंत्री मोदी और उनके सबसे मजबूत साथी केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह दोनों लोकसभा में नहीं आ पाए। 20 जुलाई को सत्र शुरू हुआ था। उसी दिन छात्रों पर बेरहम लाठी चार्ज, आंसू गैस के गोले और पैलेट गन तक चलाई गई।

लड़कियों के साथ तो बहुत ही अभद्र व्यवहार हुआ। शर्मनाक! सही अर्थों में शर्मनाक! जिसे बताने में भी छात्राओं को शर्म आती है। अपने ही देश में छात्राओं के साथ ऐसा व्यवहार पहले कभी नहीं हुआ था। इसलिए जेन अल्फा की छोटी-छोटी बच्चियां सड़कों पर उतरी हैं। और इसीलिए राहुल इस बार केवल छात्रा सम्मेलन कर रहे हैं।

और यहां लोकसभा में वे मांग करते रहे कि छात्रों पर पैलेट गन चलाने के लिए गृह मंत्री अमित शाह इस्तीफा दें और प्रधानमंत्री मोदी सदन में आकर इसके लिए माफी मांगे। मगर दोनों सदन को फेस नहीं कर पाए।

आखिरी दिन 13 अगस्त को जब मालूम था कि अभी 11 बजे वंदे मातरम के साथ ही सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो जाएगा तो तीन मिनट के लिए आए और राष्ट्रगीत खत्म होते ही चले गए।

करीब एक महीने तक वे दोनों सदन का सामना नहीं कर पाए। दोनों में से एक भी सदन नहीं। लोकसभा जहां राहुल हैं वहां तो आए ही नहीं राज्यसभा भी नहीं आए। यह भी भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार हुआ कि सरकार के दोनों सबसे बड़े नेता जिनके बारे में हवा यह बनाई गई थी कि सब इनसे डरते हैं। कोई इनके सामने नहीं आ सकता। वही दोनों खुद राहुल के सामने नहीं आ पाए।

दिमागी नक्सल एक ऐसा शब्द प्रधानमंत्री ने यूज कर दिया जो केवल उनके भक्तों, जिनके लिए अब राहुल ने अंध भक्तों का नाम दे दिया है और गोदी मीडिया के अलावा किसी के भी गले नहीं उतर रहा है। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने तो इसे एक्सेप्ट करते हुए चुनौती दे दी कि हां मैं दिमागी नक्सल हूं!

छात्र युवाओं ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी हैं। काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने कहा है कि सिर्फ सवाल पूछने पर पढ़े-लिखे युवा को नक्सली कह दिया। यह अहंकार है। उनकी समस्याओं को हल न कर पाने की आपकी नाकामी है।

काकरोच जनता पार्टी जंतर मंतर टू का ऐलान कर चुकी है। प्रधानमंत्री के इस तरह के उकसाने वाले भाषण उनके आन्दोलन को और मजबूत करेंगे। पिछली बार तो केवल शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद काकरोच जनता पार्टी ने अपना आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी थी। मगर इस बार जब सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके दिल्ली में जंतर मंतर टू की घोषणा कर रहे थे उनके समर्थक छात्र कह रहे थे कि इस बार प्रधानमंत्री का इस्तीफा लिए बिना आन्दोलन खत्म नहीं करना है।

राहुल तो अभी केवल गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांग रहे हैं। मगर छात्र युवा सीधे प्रधानमंत्री मोदी का मांगने लगे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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