ललित सुरजन की कलम से - राजनीति में वंचित समाज के लिए जगह कहाँ?
'राष्ट्रपति चुनाव के इस घटनाचक्र ने एक बार फिर यह सिध्द किया है कि भारतीय मानस में श्रेणीभेदों से उपजे पूर्वाग्रहों की जड़ें कितनी गहरी हैं;
'राष्ट्रपति चुनाव के इस घटनाचक्र ने एक बार फिर यह सिध्द किया है कि भारतीय मानस में श्रेणीभेदों से उपजे पूर्वाग्रहों की जड़ें कितनी गहरी हैं। इसका ताजा उदाहरण हमने पिछले दिनों पंजाब में देखा जहां एक कांग्रेसी विधायक ने विधानसभा के भीतर सुझाव दिया कि प्रदेश के आवारा कुत्तों को उत्तरपूर्व के प्रदेशों में भेज दिया जाना चाहिए जहां उनका सही उपचार हो जाएगा।
बात भले ही मजाक में की गई हो, लेकिन इससे पता चलता है कि हमारे नीति-निर्धारिकों का वैचारिक स्तर क्या है और वे खुद कैसे-कैसे पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं। यूं तो पूरी दुनिया में ऐसे मिलते-जुलते उदाहरण मिल जाएंगे, लेकिन अपने आपको सभ्य कहलाने की सबसे बडी शर्त तो यही है कि समाज अपने आपको बंधी बंधाई धारणाओं से मुक्त करें और दुराग्रह और भेदभाव से मुक्त होकर बहुलता और विविधता का सम्मान करे।
यह कैसे हो, इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी नीति निर्माताओं याने राजनीतिक तंत्र पर है।'
(देशबन्धु में 05 जुलाई 2012 को प्रकाशित)
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