ललित सुरजन की कलम से - यात्रा वृत्तांत: बूढ़ा पीपल और बूढ़ा पुल

'आचार्य शिवपूजन सहाय की जयंती पर आयोजित दो-दिवसीय कार्यक्रम में भाग लेने से मुझे बहुत संतोष मिला;

Update: 2026-07-21 22:00 GMT

'आचार्य शिवपूजन सहाय की जयंती पर आयोजित दो-दिवसीय कार्यक्रम में भाग लेने से मुझे बहुत संतोष मिला। सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह थी कि नौजवानों ने आयोजन में बढ़-चढ़कर शिरकत की। 10 तारीख को शहीद कुंवरसिंह की प्रतिमा से प्रारंभ हो शहीद भगतसिंह की प्रतिमा तक विश्व शांति, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी के लिए दो किमी का मार्च निकला, उसमें भी युवजन बड़ी संख्या में शामिल हुए।'

'मैंने उनके साथ करीब दो-ढाई घंटे तक खुली बातचीत की तो समझ आया कि ये युवा राजनीतिक रूप से बेहद सजग हैं, देश व दुनिया के प्रश्नों में उनकी गहरी दिलचस्पी है और वे हिंदी साहित्य के उत्कट अध्येता भी हैं। सभा स्थल पर पुस्तकों की दो दूकानें लगी थीं और सभी लोग रुचि के साथ किताबें खरीद रहे थे। बिहार को हम सदा से एक साहित्यप्रेमी समाज के रूप में जानते आए हैं, यह आयोजन उसका प्रत्यक्ष उदाहरण था। ट्रेन में विलंब होने के कारण मैं कार्यक्रम में दो घंटे देर से पहुंचा था, लेकिन सब धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे। शाम सात बजे के आसपास कार्यक्रम समाप्त हुआ, लेकिन श्रोतागण ने कोई उकताहट या उत्साहहीनता नहीं दिखाई।'

(देशबन्धु में 05 अक्टूबर को प्रकाशित)

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