बच्चों के पोषण में डिजिटलीकरण न बने बाधा

भोजन और पोषण से जुड़ी योजनाओं में बढ़ते डिजिटलीकरण को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है, ताकि तकनीक बच्चों तक भोजन और पोषण की पहुंच में बाधा न बने।;

By :  DB Desk
Update: 2026-10-05 21:40 GMT
  • राजु कुमार

भोजन और पोषण से जुड़ी योजनाओं में बढ़ते डिजिटलीकरण को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है, ताकि तकनीक बच्चों तक भोजन और पोषण की पहुंच में बाधा न बने। डिजिटलीकरण के कारण बच्चे की भोजन और पोषण सेवाएं प्रभावित नहीं होनी चाहिए। बच्चों के निजी आंकड़ों की सुरक्षा का सवाल भी इससे जुड़ा है। दूसरी ओर, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और शिक्षकों पर डिजिटल रिपोर्टिंग का काम इतना नहीं बढ़ना चाहिए कि बच्चों के साथ सीधे काम करने का उनका समय कम होने लगे।

हाल के वर्षों में लगभग हर क्षेत्र में डिजिटल प्रक्रिया तेजी से बढ़ी है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लक्षित समूहों के लिए चलाई जा रही विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं में भी तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इससे योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता बेहतर हो सकती है, लेकिन तकनीकी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण पात्र व्यक्ति योजना से वंचित रह जाए, तो यह चिंता का विषय है। बच्चों के भोजन और पोषण से जुड़ी योजनाओं में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि देश में बाल कुपोषण अब भी गंभीर समस्या बना हुआ है। ऐसे में आधार, ई-केवाईसी, फेस रिकग्निशन या किसी ऐप की तकनीकी प्रक्रिया के कारण किसी बच्चे का भोजन और पोषण नहीं रुकना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल योजनाओं को बेहतर बनाने और उनकी निगरानी के लिए हो सकता है, लेकिन गरीब, प्रवासी, आदिवासी और दूसरे वंचित परिवारों के बच्चों के लिए ऐसी शर्तें भोजन और पोषण सेवाओं तक पहुंच को और कठिन बना सकती हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के अनुसार देश में पांच साल से कम उम्र के 29.3 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन के शिकार हैं, 19 प्रतिशत बच्चे दुबले हैं और 31.8 प्रतिशत बच्चों का वजन उनकी उम्र के अनुसार कम है। पिछले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुकाबले इन संकेतकों में सुधार दर्ज हुआ है, लेकिन करीब हर तीन में से एक बच्चे का उम्र के अनुसार कम वजन होना बताता है कि चुनौती अभी भी बड़ी है। बच्चे के जीवन के शुरुआती दो वर्षों में पर्याप्त और विविध आहार मिलना भी पोषण का महत्वपूर्ण आधार है इसलिए कुपोषण को खत्म करने के लिए बहुआयामी प्रयास जरूरी हैं।

बच्चे के पोषण की बुनियाद गर्भावस्था के दौरान ही पड़ जाती है। गर्भवती महिला को पर्याप्त पोषण और स्वास्थ्य सेवाएं मिलना, जन्म के बाद स्तनपान, छह महीने के बाद पर्याप्त और विविध पूरक आहार, साफ पानी, संक्रमण से बचाव और समय पर स्वास्थ्य सेवाएं मिलना बच्चे के विकास से सीधे जुड़े हैं। इसके बाद आंगनवाड़ी और स्कूल में मिलने वाला भोजन आता है। इसलिए कुपोषण सामने आने के बाद बच्चे का वजन बढ़ाने के प्रयासों के साथ उन कारणों पर भी काम करना जरूरी है, जिनके चलते बच्चा कुपोषण का शिकार होता है।

इस पूरी व्यवस्था में आंगनवाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण है। गरीब, आदिवासी, दूरदराज और वंचित परिवारों के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी पोषण के साथ स्वास्थ्य और शुरुआती देखभाल की व्यवस्था भी है। इसके लिए जरूरत के मुताबिक पर्याप्त आंगनवाड़ी केंद्र, अच्छे भवन, पानी, बिजली और स्वच्छता की सुविधाएं तथा पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कार्यकर्ता जरूरी हैं। भोजन की गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध दाल, मोटे अनाज, सब्जियां और दूसरी पौष्टिक सामग्री से गर्म पका भोजन दिया जा सकता है। स्कूलों में स्थानीय भोजन और किचन गार्डन को बढ़ावा देने के साथ बच्चों में जंक फूड के बढ़ते इस्तेमाल को रोकने के उपाय भी जरूरी हैं।

मां के पोषण और उसकी सामाजिक सुरक्षा का सवाल भी इससे जुड़ा है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के दौरान पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं मिलने का असर मां और बच्चे दोनों के पोषण पर पड़ता है। मातृत्व लाभ की पहुंच बढ़ाने के साथ तीन साल से कम उम्र के बच्चों के लिए क्रेच और शुरुआती देखभाल की व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा। प्रवासी मजदूरों, बेघर और विस्थापित परिवारों के बच्चों के लिए समस्या और कठिन है। पहचान या स्थायी पते के अभाव में यदि कोई बच्चा आंगनवाड़ी, स्कूल, भोजन या स्वास्थ्य सेवाओं से बाहर रह जाता है तो इसका सबसे ज्यादा असर पहले से वंचित परिवारों पर पड़ता है।

बच्चों के भोजन की व्यवस्था में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने की भी जरूरत है। स्थानीय स्वयं सहायता समूहों, रसोइयों, किसानों, ग्राम पंचायतों, माता-पिता और स्कूल प्रबंधन समितियों को इससे जोड़ने पर भोजन की गुणवत्ता और निगरानी दोनों में मदद मिल सकती है। स्थानीय किसानों से दाल, मोटे अनाज और दूसरी पौष्टिक सामग्री की खरीद बच्चों को स्थानीय और विविध भोजन उपलब्ध कराने के साथ किसानों और स्थानीय आजीविका को भी सहारा दे सकती है। इसके साथ सामाजिक अंकेक्षण, भोजन की स्वतंत्र गुणवत्ता जांच, सरकारी ठेकों में पारदर्शिता और शिकायतों के निवारण की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों के भोजन और पोषण की जिम्मेदारी सरकार की है। इसलिए निजीकरण के बजाय सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूत करते हुए स्थानीय भागीदारी को बढ़ावा देने की जरूरत है।

बदलती जलवायु और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का असर परिवारों की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी या आजीविका का नुकसान अंतत: घर में उपलब्ध भोजन को प्रभावित करता है। इसलिए आपदा के समय बच्चों और गर्भवती महिलाओं के भोजन और पोषण की व्यवस्था को राहत कार्यक्रमों का जरूरी हिस्सा बनाना होगा। स्थानीय कृषि और पोषण योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल भी जरूरी है। आंगनवाड़ी, आशा और पीएम पोषण से जुड़े फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को पर्याप्त मानदेय, सामाजिक सुरक्षा, जरूरी संसाधन और काम की बेहतर परिस्थितियां दिए बिना जमीनी स्तर पर पोषण सेवाओं में अपेक्षित सुधार मुश्किल है।

भोजन और पोषण से जुड़ी योजनाओं में बढ़ते डिजिटलीकरण को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है, ताकि तकनीक बच्चों तक भोजन और पोषण की पहुंच में बाधा न बने। डिजिटलीकरण के कारण बच्चे की भोजन और पोषण सेवाएं प्रभावित नहीं होनी चाहिए। बच्चों के निजी आंकड़ों की सुरक्षा का सवाल भी इससे जुड़ा है। दूसरी ओर, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और शिक्षकों पर डिजिटल रिपोर्टिंग का काम इतना नहीं बढ़ना चाहिए कि बच्चों के साथ सीधे काम करने का उनका समय कम होने लगे। तकनीक सुविधा और निगरानी का साधन रहे, अधिकार पाने की शर्त नहीं।

भोपाल में हाल में हुए बच्चों के भोजन के अधिकार पर तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन में तीन दिनों की चर्चा के बाद जारी घोषणा में इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया। अधिवेशन में प्रख्यात अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज सहित भोजन के अधिकार के लिए लंबे समय से काम कर रहे कई वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। अधिवेशन में भी इस बात पर जोर दिया गया कि कुपोषण रोकने के प्रयास बच्चे के कुपोषित पाए जाने के बाद ही शुरू नहीं होने चाहिए।

मां के पोषण से लेकर बच्चे के शुरुआती आहार, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य सेवाओं और स्कूल तक पोषण की निरंतरता बनाए रखने की जरूरत है। कुपोषण जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य, पोषण, मातृत्व सुरक्षा, स्थानीय खाद्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा को साथ लेकर चलना होगा। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि आधार, पहचान या कोई तकनीकी प्रक्रिया किसी बच्चे और उसके भोजन और पोषण के अधिकार के बीच न आए। 

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