जनता को अब बंटना नहीं है, जंतर-मंतर से आई एकता को बनाए रखना है

प्रधानमंत्री मोदी ने ही देश को हिन्दू-मुस्लिम में बांटा था। और अब उन्होंने ही न केवल हिन्दू-मुस्लिम को बल्कि बाकी जाति और अन्य दूसरे जितने भी आधारों पर जनता को बांटा था सबको फिर एक कर दिया।;

Update: 2026-10-04 21:46 GMT
  • शकील अख्तर

बांटने की कोशिशें और हो सकती हैं। धर्म तो इनका आधार था ही। जाति के आधार पर। स्त्री-पुरुष के आधार पर। गांव-शहर किसी भी आधार पर यह लोगों को बांटने की फिर कोई कोशिश कर सकते हैं। वही इनका आखिरी हथियार है। जनता को बस बंटने से होशियार रहना है। इन आन्दोलनों से आई एकता की शक्ति को बनाए रखना है।

प्रधानमंत्री मोदी ने ही देश को हिन्दू-मुस्लिम में बांटा था। और अब उन्होंने ही न केवल हिन्दू-मुस्लिम को बल्कि बाकी जाति और अन्य दूसरे जितने भी आधारों पर जनता को बांटा था सबको फिर एक कर दिया। पाठक सोच रहे होंगे यह हमने मोदी द्वारा जनता को एक करने की बात किस आधार पर लिखी? उनका सोचना सही है। मोदी द्वारा बांटते हुए उन्होंने देखा है। लेकिन यह वापस जनता के जुड़ने की बात?

जी हां! हम यह इस आधार पर कह रहे हैं कि जन्तर मन्तर-2 शुरू होने के बाद भी मोदी जन्तर मन्तर -1 से सबक नहीं ले पा रहे हैं। उस आन्दोलन में शिक्षा के मुद्दे पर सब एक हो गए थे। शिक्षा सबकी जरूरत है। और उसमें धांधलियां धर्म और जाति, छात्र और छात्राओं सबको प्रभावित कर रहीं थीं। स्टूडेंट की मांग इसके लिए दोषी शिक्षा मंत्री को हटाने की थी। और उसने सबको एक कर दिया था। और आखिर एक महीने से ज्यादा समय तक सरकार विरोधी माहौल सहने के बाद मोदी को अपने शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा था।

मोदी ने उसमें जितनी देर की उतना ही उनके खिलाफ माहौल बना। और अब वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बचाने की जितनी कोशिश करेंगे उतना ही उनके खिलाफ माहौल और बनेगा एवं जनता में एकता और बढ़ेगी। चुनाव में धांधलियां तो धर्म जाति, स्त्री पुरूष से आगे जाकर अमीर-गरीब, गांव, शहर सब जगह प्रभावित कर रही हैं। इसी के खिलाफ जन्तर मन्तर-दो हो रहा है। अगर मोदी ने इसमें भी उतनी ही देर कर दी जितनी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे में की थी तो इस बार जनता की एकता फिर 2014 से पहले वाले पुराने स्तर पर पहुंच जाएगी। और इस्तीफा तब भी उन्हें ज्ञानेश कुमार का लेना होगा।

हम इसलिए लिख रहे हैं कि मोदी ने ही बांटा था मोदी ही एक कर रहे हैं। आज वे समझ नहीं पा रहे कि क्या करें? और फिर जब करने को कुछ नहीं रहता तो वही करते हैं जो पहले करना था।

जन्तर मन्तर का आन्दोलन बढ़ता जा रहा है और उसे दबाने के लिए सरकार पुलिस से ज्यादा ज्यादतियां करवा रही है। इस बार निशाने पर पत्रकार भी हैं। उन्हें काम करने से रोका जा रहा है। और सबसे शर्मनाक बात यह है कि महिला पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा शारीरिक छेड़छाड़ की घटिया हरकत की जा रही है। एक महिला पत्रकार ने पुलिस पर सीधा आरोप लगाया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लेकर पत्रकार संगठनों ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए दोषी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

सरकार पुलिस के द्वारा जितना दमन करने की कोशिश करेगी जनता की एकजुटता उतनी ही बढ़ेगी। युवाओं के माता-पिता भी आन्दोलन में आएंगे। लोगों को बांटने की सारी कोशिशें असफल हो जाएंगी। और यही मोदी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल होगी।

वे बांटो और राज करो के आधार पर ही अब तक चुनाव जीत रहे थे। इसमें चुनाव आयोग उनका सबसे बड़ा सहयोगी था। अब दोनों चीजें टूट रही हैं। लोगों का बंटना बंद हो गया है और चुनाव आयोग की सारी पोल पट्टी खुल जाने के बाद वह हिम्मत हार गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा होना है। इसे कोई नहीं रोक सकता। मोदी देर चाहे जितनी कर सकते हैं। मगर इसमें उन्हें एक और खतरा है और वह बहुत बड़ा है। अपने खिलाफ आन्दोलन से घबरा कर कहीं ज्ञानेश कुमार राहुल गांधी की बात न मान लें। ज्ञानेश कुमार यह तो समझ ही गए हैं कि अब मोदी उन्हें बचा नहीं सकते। बस कुछ दिन और कुर्सी पर रख सकते हैं। मगर उससे कुछ होगा नहीं। आखिरी में उन्हें जाना भी पड़ेगा और कठोर ट्रायल का सामना भी करना होगा। राहुल देशद्रोह कह रहे हैं। बहुत कड़े कानूनों में उन पर केस होगा। फिर कोई बचाने नहीं आएगा।

ऐसे में राहुल की बात मानकर सरकारी गवाह बन जाने में ही जान बख्शी है। लेकिन मुसीबत कम उनकी होगी मोदी की बढ़ेगी। क्यों राहुल का कहना है कि उन्हें यह बताना होगा कि किस के कहने से वे वोट चोरी कर रहे थे। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के लिए अब मुसीबतों का अंत नहीं है। जनता ने बंटना बंद कर दिया है, एक हो रही है और ज्ञानेश कुमार ऐसी मुसीबत बन गए हैं जो न निगलते बने न उगलते।

मोदी ने जो किया था उनके वह कर्म सामने आ रहे हैं। राजनीति सब करते हैं। मगर मोदी ने राजनीति नहीं की बल्कि एक अहंकारी शासक की तरह सत्ता चलाई है। कुर्सी पर बैठने के बाद उन्हें लगा कि अब उन्हें कोई नहीं हटा सकता। खुद को नान बायलोजिकल बताकर उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से अमरत्व प्राप्त हो जाने की भी बात कह दी थी।

इसी अहंकार में उन्होंने सारी संवैधानिक संस्थाएं तहस नहस कर दीं। लेकिन हर चीज का एक समय होता है और वह दिखने लगा। शिक्षा के ढांचे को पूरी तरह खत्म करने के कारण हुआ छात्र आन्दोलन एक बड़ा अभियान बन गया। और लगातार 37 दिन के आन्दोलन के बाद मोदी को शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेना पड़ा था। उससे शुरूआत हो गई। और अब चुनाव आयोग के मामले में उससे भी तेज आन्दोलन शुरू हो गया। नया नेतृत्व उभर कर सामने आ गया। जेएनयू की नेहा वोरा एक ऐसी हिम्मती लड़की के तौर पर सामने आई जो हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई।

मोदी ने आन्दोलन के खिलाफ आंदोलनजीवी कहकर, जेएनयू के खिलाफ तो 2014 में सरकार बनने के साथ ही पहला निशाना उसी पर लगाकर, और अरबन नक्सल से लेकर नाराज फूफा तक पता नहीं जाने क्या क्या कहा। उद्देश्य था आवाजों को दबाना। मगर आवाजें कभी दबी हैं? वह तो राजशाही से लेकर अंग्रेजों के दौर तक हमेशा उठती रही हैं और अब लोकतंत्र में तो इसके दबने का सवाल ही नहीं।

हिन्दू-मुस्लिम की नफरती राजनीति ने कुछ समय के लिए विभाजन की आवाजों को तेज करके जनता की वास्तविक आवाजों को दबा दिया था। मगर इस नई पीढ़ी के आने के बाद हर वर्ग की आवाजें तेज उठने लगीं। इसी में नया नेतृत्व निकला है। मोदी के लिए इसे संभालना बहुत मुश्किल होगा। इसलिए बेहतर है कि वह युवा पीढ़ी, छात्र-छात्राओं से मुठभेड़ का रास्ता छोड़कर उनकी समस्याएं सुलझाने का काम करें। धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा बहुत देर से लिया था। ज्ञानेश कुमार का जल्दी लें। चुनाव में धांधली से नहीं अपने कामों से वोट लें। समय अब उनके विपरीत आ गया है। ऐसे में आन्दोलनकारियों के साथ मिलकर बात करने में ही भलाई है।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आन्दोलन को सत्याग्रह का नाम देकर व्यापक स्वरूप दे दिया है। आंदोलन सिर्फ ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ही नहीं उन्होंने देश में चल रहे हर आंदोलन को अपना समर्थन देने की घोषणा की है।

जनता की शक्ति से कोई नहीं लड़ सकता। इतने समय तक लोगों को बांटकर जो सरकार चलाई है वह अब लोगों के एक होने से खतरे में आ गई है। यह जनता की ताकत है और लोगों के एक होने से आई है।

बांटने की कोशिशें और हो सकती हैं। धर्म तो इनका आधार था ही। जाति के आधार पर। स्त्री पुरुष के आधार पर। गांव शहर किसी भी आधार पर यह लोगों को बांटने की फिर कोई कोशिश कर सकते हैं। वही इनका आखिरी हथियार है। जनता को बस बंटने से होशियार रहना है। इन आन्दोलनों से आई एकता की शक्ति को बनाए रखना है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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