“उजाले अपनी यादों के…” : बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत, विस्थापन और इंसानियत का दर्द

91 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आम लोगों की ज़ुबान बनाया। मेरठ दंगों, विस्थापन, मोहब्बत और इंसानियत के दर्द से भरी उनकी शायरी आज भी समाज को आईना दिखाती है।;

By :  Atul Sinha
Update: 2026-05-29 15:19 GMT

बशीर बद्र: मोहब्बत और इंसानियत के शायर

  • मेरठ दंगों ने कैसे बदल दी बशीर बद्र की ज़िंदगी
  • अयोध्या, अलीगढ़ और लखनऊ की तहज़ीब का असर
  • क्यों आम लोगों की ज़ुबान बन गई बशीर बद्र की शायरी
  • डिमेंशिया, तन्हाई और आख़िरी दिनों का संघर्ष
  • बशीर बद्र की ग़ज़लों में सांप्रदायिक हिंसा का दर्द
  • उर्दू अदब को बशीर बद्र का सबसे बड़ा योगदान
  • आज के दौर में बशीर बद्र को पढ़ना क्यों ज़रूरी है

जानिए कैसे बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आम लोगों की ज़ुबान बना दिया और क्यों आज के दौर में उन्हें पढ़ना पहले से ज्यादा ज़रूरी हो गया है...

'न जाने किस गली में ज़िदगी की शाम हो जाए'

-- अतुल सिन्हा

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

या फिर

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।

जी हां ये वो लाइने हैं जो बशीर ब़द्र ने 1987 के मेरठ के भयानक दंगों के बाद लिखा था, जहां इस मोहब्बत के तरक्कीपसंद शायर के शास्त्री नगर का उनका आशियाना जला दिया गया था और दंगों की इस आग में न सिर्फ उनका घर जला, वो सारे शेर, सारी पांडुलिपियां और सबकुछ जालकर खाक हो गया... नफ़रत के इस बाज़ार में मोहब्बत का पैगाम देने वाला यह शायर पिछले करीब एक दशक से अपने आप में ही कहीं खो गया था, डिमेंशिया का शिकार और अपने ही ग़ज़लों और शायरी से अनजान। लगातार बीमार रहते हुए भी बशीर साहब जब अपने ही शेर किसी से सुनते तो जैसे उनकी बहुत सी यादें आखों में तैर जातीं। 91 साल की उम्र में अगर बशीर साहब चले गए तो शायरी और गज़लों की दुनिया को एक ख़जाना देकर गए, एक ऐसा ख़ज़ाना जो किसी न किसी रूप में लोगों की ज़ुबान उनकी लफ़्जों के तौर पर रहता है।

जिस अयोध्या नगरी को लेकर देश की सियासत ने इतने रंग बदले, जिस अयोध्या ने देश को राम की राजनीति के अलावा कई नायाब हीरे दिए, उन्हीं में से एक नायाब हीरा 15 फरवरी 1935 को जब आया तो जैसे पुलिस विभाग में असिस्टेंट अकाउंटेंट रहे सैयद नज़ीर और आलिया बेगम के घर रौनक आ गई। उनका नाम रखा गया सैयद मोहम्मद बशीर। बचपन से ही पढ़ने-लिखने का माहौल मिला। कहा जाता है कि जब वो सात साल के थे तो पहला शेर कह दिया था।

उनकी शुरुआती पढ़ाई कानपुर के हलीम कॉलेज और फिर इटावा के इस्लामिया कॉलेज में हुई। शेर वो लगातार लिख रहे थे और पढ़ाई के दौरान ही अपना तखल्लुस रख लिया था बद्र। पिता की बीमारी की वजह से कुछ समय उन्हें पढ़ाई से भी दूर होना पड़ा और परिवार की जिम्मेदारियां उठानी पड़ीं। लेकिन साहित्य से रिश्ता टूटा नहीं। बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय यानी एएमयू आ गए, जहां से उन्होंने बी.ए., एम.ए. और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की।

जाहिर है साठ के दशक तक बशीर बद्र शायरी की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम बन गए थे।

तमाम मुशायरों में जाने लगे थे और उनके चाहने वालों की संख्या बढ़ने लगी थी। बेशक उनकी शायरी में अयोध्या से उनका रिश्ता झलकता था। क्योंकि इस शहर से उनका रिश्ता महज पैदाइशी नहीं था बल्कि उस गंगा-जमुनी तहज़ीब का भी था जो बाद में उनकी शायरी की पहचान बनी। उनकी ग़ज़लों में जो नरमी, इंसानी अपनापन और रिश्तों की मिठास दिखाई देती है, उसकी जड़ें उसी सांस्कृतिक माहौल में थीं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का उनके व्यक्तित्व और शायरी पर गहरा असर पड़ा। अलीगढ़ उस दौर में उर्दू अदब, बहस और तरक्कीपसंद सोच का बड़ा केंद्र था। वहीं उनकी शायरी को पहचान मिलने लगी। उनकी शुरुआती ग़ज़लें और शेर लखनऊ की प्रसिद्ध पत्रिका “निगार” में छपे, जिसने उन्हें युवा शायर के तौर पर पहचान दिलाई। लखनऊ से उनका रिश्ता सीधे तौर पर अदबी दुनिया का था। लखनऊ की नफ़ासत, उर्दू तहज़ीब और मुशायरों की परंपरा ने उनकी भाषा को और निखारा। उनकी ग़ज़लों में लखनऊ की रवानी और तहज़ीब की झलक साफ महसूस होती है। वे अक्सर लखनऊ के मुशायरों में भी बुलाए जाते थे और वहां उन्हें खूब सराहा गया। अलीगढ़ में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वहीं एक कॉलेज में पढ़ाया भी।

बाद में वे मेरठ कॉलेज पहुंचे और उर्दू विभाग के अध्यक्ष बने। करीब 17 साल उन्होंने मेरठ में बिताए। यही मेरठ उनकी ज़िंदगी का सबसे अहम और सबसे दर्दनाक शहर भी बना। जब मेरठ के सबसे भयानक दंगों ने उनका सब कुछ छीन लिया।

मुझे याद है, इन दंगों के बाद तबाह हुए बशीर बद्र साहब से वह मुलाकात जब वह किसी तरह सर छुपाने के लिए अपने एक साथी के एक गैराज में थे और दंगों का दर्द उनकी आंखों में आंसू बनकर छलक रहा था... वो इस तबाही से परेशान थे, लेकिन उनके भीतर तब भी इंसानियत की आवाज़ बने रहने का साहित्यिक जज्बा था। उन्होंने इस नफरती माहौल पर खूब लिखा।

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।

या यह लिखा कि

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,

यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।

फिर परेशान होकर उन्होंने शहर छोड़ दिया। पहले दिल्ली आए, फिर भोपाल में बस गए। उन्होंने लिखा –

महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें,

जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा।

उन्हें 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी, उर्दू अकादमी पुरस्कार, मीर तकी मीर सम्मान और सरस्वती सम्मान जैसे अनेक सम्मान मिले। पिछले करीब दस सालों से वो लगातार बीमार चल रहे थे।

डॉ बशीर बद्र का परिवार

परिवार की बात करें तो उनकी पहली पत्नी से दो बच्चे हुए — नुसरत बद्र और सबा वाहिद। नुसरत बद्र आगे चलकर फिल्मी गीतकार बने। बाद में भोपाल में उनकी मुलाकात डॉ. राहत बद्र से हुई, जिन्होंने कठिन दौर में उनका साथ दिया। उनसे उनका एक बेटा तैय्यब बद्र हुआ।

बशीर बद्र की ज़िंदगी का सफर अयोध्या की सांस्कृतिक मिट्टी से शुरू होकर अलीगढ़ की अकादमिक दुनिया, लखनऊ की अदबी फिज़ा, मेरठ के दर्द और भोपाल की तन्हा शांति तक फैला हुआ है। शायद इसी वजह से उनकी शायरी में मोहब्बत के साथ-साथ विस्थापन, याद और इंसानियत का दर्द भी इतनी गहराई से दिखाई देता है। साथ ही उनका वह अकेलापन जो उन्हें भीतर तक तोड़ चुका था।

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।

दरअसल हम बशीर साहब को क्यों इतना याद करते हैं। दरअसल उन्होंने उर्दू शायरी और गजल को अदबी महफ़िलों से निकालकर आम लोगों की ज़ुबान तक पहुंचा दिया। उनकी शायरी में न तो भारी-भरकम फ़ारसी का बोझ है और न ही बौद्धिक दिखावे की अकड़ बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी, टूटते रिश्ते, शहरों की उदासी, मोहब्बत की नर्मी और इंसानी दर्द की सादगी है। उनके आठ से ज्यादा संग्रहों में खास हैं आमद, आस, मुसाफिर. अल्लाह हाफ़िज़ और उजाले अपनी यादों के अगर आप पढ़ेंगे तो आपको बशीर बज्र को समझने में आसानी होगी।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

बशीर बद्र की शायरी में प्रेम है, लेकिन सिर्फ रूमानी प्रेम नहीं; उसमें टूटते समाज की टीस, सांप्रदायिक हिंसा का दर्द और इंसानियत की पुकार भी है। यही वजह है कि वे सिर्फ एक शायर नहीं, बल्कि हमारी एक साहित्यिक ज़रूरत बने रहते हैं औऱ हमेशा रहेंगे। आज जब भाषा और संवाद दोनों में कठोरता बढ़ रही है, तब बशीर बद्र को पढ़ना दरअसल इंसानियत, नर्मी और रिश्तों की तहज़ीब को बचाए रखने जैसा है।

Tags:    

Similar News