अनिर्बंध : जीवन की ओर लौटती कविताएँ
शाखा मुलमुले के कविता-संग्रह अनिर्बंध को पहली दृष्टि में पढ़ते हुए यह भ्रम हो सकता है कि यह यात्राओं, नगरों, नदियों और स्मृतियों का संग्रह है।;
शाखा मुलमुले के कविता-संग्रह अनिर्बंध को पहली दृष्टि में पढ़ते हुए यह भ्रम हो सकता है कि यह यात्राओं, नगरों, नदियों और स्मृतियों का संग्रह है। लेकिन थोड़ा ठहरकर पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि इन कविताओं का वास्तविक विषय इनमें से कोई भी नहीं है। यात्रा, नदी, शहर, स्मृति, शोक, मृत्यु, प्रेमये सब यहाँ माध्यम हैं। इन सबके पीछे जो केंद्रीय जिज्ञासा लगातार सक्रिय है, वह मनुष्य और उसके होने का प्रश्न है। यही कारण है कि संग्रह की अनेक कविताएँ भिन्न विषयों पर होते हुए भी अंतत: एक-दूसरे से जुड़ती हुई दिखाई देती हैं।
संग्रह की शीर्षक कविता 'अनिर्बंध' इसी अर्थ में एक कुंजी-कविता है। यहाँ यात्रा किसी गंतव्य तक पहुँचने का साधन नहीं, बल्कि सीमाओं के अतिक्रमण का अनुभव है। 'नदी की तरह बहते हुए' अपनी सीमाएँ तोड़ने की आकांक्षा केवल भौगोलिक नहीं, अस्तित्वगत है। यह कविता संग्रह की समूची संवेदना का द्वार खोलती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि कवयित्री इस मुक्ति को किसी विजयोन्माद की तरह नहीं देखती। उनके यहाँ अनिर्बंध होना मुक्त होना अवश्य है, किंतु निरंकुश होना नहीं। यह स्वयं को विस्तृत करने की प्रक्रिया है।
यही भाव आगे चलकर 'जीवनोत्सव' में एक और रूप ग्रहण करता है। यदि 'अनिर्बंध' यात्रा की घोषणा है, तो 'जीवनोत्सव' उस यात्रा का जीवन-दर्शन है। वहाँ जीवन को किसी उपलब्धि, सफलता या लक्ष्य से नहीं जोड़ा गया, बल्कि यात्रा के रूप में देखा गया है। मनुष्य यात्री है और यात्रा ही उसका सत्य। यह दृष्टि आधुनिक जीवन की उस बेचैनी का प्रतिपक्ष निर्मित करती है जिसमें हर चीज़ को परिणाम और उपलब्धि से मापा जाता है। विशाखा मुलमुले की कविताएँ परिणाम नहीं, प्रक्रिया में विश्वास करती हैं।
इसी कारण इस संग्रह में बार-बार लौटने वाला एक भाव है- अस्थायित्व का स्वीकार। 'नावघर' कविता को इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। एक नाव, जो आज घर है और कल किसी दूसरे की हो जाएगी, केवल वस्तु नहीं रह जाती,वह मनुष्य की समूची स्थिति का रूपक बन जाती है। आधुनिक मनुष्य स्थायित्व के भ्रम में जीना चाहता है, जबकि यह कविता उसे याद दिलाती है कि घर भी अस्थायी है, यात्रा भी अस्थायी हैऔर शायद स्वयं जीवन भी।लेकिन विशाखा इस अस्थायित्व को निराशा में नहीं बदलतीं। उनके यहाँ क्षणभंगुरता जीवन के सौंदर्य का हिस्सा बन जाती है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ अस्तित्ववादी उदासी में नहीं फँसतीं। वे जीवन की अस्थिरता को स्वीकार करते हुए भी जीवन से प्रेम करती हैं।
संग्रह में यह प्रेम केवल मनुष्य तक सीमित नहीं है। वह स्थानों, स्मृतियों और सांस्कृतिक अनुभवों तक फैला हुआ है। 'वाराणसी' श्रृंखला की कविताएँ इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। हिंदी कविता में बनारस एक बहुचर्चित नगर रहा है, लेकिन विशाखा का बनारस किसी सांस्कृतिक पोस्टकार्ड की तरह नहीं आता। वह जीवित, बेचैन और परिवर्तित होता हुआ शहर है।
जब कवयित्री लिखती हैं कि 'नामांतरण हुआ है उसका / बनारस से पुन: वाराणसी में ', तब यह केवल नाम-परिवर्तन का उल्लेख नहीं है। यहाँ शहर की स्मृति और उसके वर्तमान के बीच तनाव उपस्थित है। यह तनाव केवल बनारस का नहीं, हमारे समय का तनाव है। आधुनिक भारत में शहर बदल रहे हैं, उनके नाम बदल रहे हैं, उनके अर्थ बदल रहे हैं। लेकिन क्या स्मृतियाँ भी इतनी आसानी से बदल जाती हैं? विशाखा मुलमुले की कविता इसी प्रश्न के भीतर प्रवेश करती है।
इसीलिए 'वाराणसी' और 'विलोपन' को साथ पढ़ना चाहिए। 'विलोपन' कविता पूरे संग्रह की एक केंद्रीय चिंता को व्यक्त करती है। यहाँ विलोपन केवल किसी वस्तु या परंपरा का लोप नहीं है; यह मनुष्य की स्मृति, पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता के क्षरण का भी बिंब है। यदि 'वाराणसी' बदलते हुए शहर का अनुभव है, तो 'विलोपन' उस परिवर्तन की मानवीय कीमत का अनुभव है।यही कारण है कि इन कविताओं में स्मृति केवल अतीत का संग्रहालय नहीं है। वह प्रतिरोध की एक सूक्ष्म शक्ति है। स्मरण करना यहाँ बचाए रखना है। भूल जाना केवल भूल जाना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व का एक हिस्सा खो देना है।इस अर्थ में अनिर्बंध की कविताएँ हमारे समय की विस्मृति के विरुद्ध लिखी गई कविताएँ भी हैं।
यदि अनिर्बंध की पहली संवेदना यात्रा और स्मृति है, तो उसकी दूसरी बड़ी संवेदना मनुष्य और उसके आसपास की दुनिया के बदलते रिश्तों को लेकर है। इन कविताओं में अपने समय के प्रति एक गहरी नैतिक बेचैनी लगातार सक्रिय दिखाई देती है। विशाखा मुलमुले उन कवियों में नहीं हैं जो सीधे-सीधे व्यवस्था या राजनीति को संबोधित करती हैं,वे मनुष्य के अनुभवों में प्रवेश करती हैं और वहीं से अपने समय की आलोचना रचती हैं।
इस संदर्भ में 'गूँज-अनुगूँज' विशेष रूप से उल्लेखनीय कविता है। यह कविता केवल किसी घटना या विचार की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय के बौद्धिक और नैतिक अंतर्विरोधों का सूक्ष्म पाठ है। कविता में मनुष्य और मनुष्यता के बीच जो दूरी दिखाई देती हैवह केवल सामाजिक विडंबना नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता की त्रासदी है। आज मनुष्य पहले से अधिक शिक्षित, अधिक सूचनासंपन्न और अधिक तकनीकी रूप से सक्षम हैलेकिन क्या वह अधिक मानवीय भी हुआ है? यह प्रश्न कविता की अंतर्धारा में लगातार उपस्थित रहता है। विशाखा मुलमुले इस प्रश्न का उत्तर नहीं देतीं; वे केवल पाठक को उस असुविधाजनक स्थिति में खड़ा कर देती हैं जहाँ उसे स्वयं अपने समय की परीक्षा करनी पड़ती है।
यही बेचैनी 'देखो तो' कविता में एक और रूप ग्रहण करती है। यहाँ कवयित्री जीवन के विविध रंगों, अनुभवों और विडंबनाओं को देखने का आग्रह करती हैं, लेकिन अंतत: दृष्टि वहीं लौटती है जहाँ मनुष्य का संकट सबसे अधिक तीखा है। आधुनिक जीवन की उपलब्धियों के बीच मानवीय संवेदना का क्षरण उन्हें विचलित करता है। यह कविता किसी नैतिक उपदेश में नहीं बदलतीबल्कि एक ऐसी दृष्टि विकसित करती है जो देखने के साथ-साथ आत्मालोचन भी करती है।
संग्रह की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहाँ सामाजिक अनुभव कभी निजी अनुभव से अलग नहीं होता। 'इस जग में' जैसी कविता इसका उदाहरण है। पहली नज़र में यह कविता अस्तित्व और जीवन पर केंद्रित प्रतीत होती है, लेकिन उसके भीतर मनुष्य के सामाजिक संबंधों की एक गहरी समझ भी मौजूद है। विशाखा बार-बार यह संकेत करती हैं कि मनुष्य अकेले नहीं जीता; उसका अस्तित्व दूसरों से जुड़कर ही अर्थ प्राप्त करता है। इसीलिए उनकी कविता में आत्मचिंतन कभी आत्ममुग्धता में नहीं बदलता।
प्रकृति के साथ उनका रिश्ता भी इसी मानवीय संवेदना से निर्मित होता है। हिंदी कविता में प्रकृति का एक लंबा इतिहास रहा है- छायावाद की प्रकृति, प्रगतिशील कविता की प्रकृति, नई कविता की प्रकृति। लेकिन विशाखा मुलमुले की प्रकृति इनमें से किसी एक खाँचे में नहीं रखी जा सकती। उनके यहाँ प्रकृति सौंदर्य की वस्तु नहीं, जीवन की सहभागी है।'माँ-मायके की नदी' को इसी दृष्टि से पढ़ना चाहिए। यह कविता केवल नदी की कविता नहीं है। यह स्मृति, स्त्री-अनुभव और संबंधों की कविता है। नदी यहाँ भूगोल से अधिक आत्मीयता का रूपक है। एक नदी का दूसरी नदी से मिलने जाना केवल जल का प्रवाह नहींबल्कि उस सांस्कृतिक संसार का पुनर्स्मरण है जिसमें स्त्री अपने मायके, अपने बचपन और अपने भावलोक से जुड़ी रहती है। विशाखा मुलमुले इस अनुभव को अत्यंत सहजता से व्यक्त करती हैं। यही सहजता कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।
दरअसल इस कविता को पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि विशाखा मुलमुले की स्त्री-दृष्टि किसी वैचारिक आग्रह से नहींजीवनानुभव से निर्मित हुई है। उनकी कविताओं में स्त्री उपस्थित हैलेकिन वह नारे की तरह नहीं, दृष्टि की तरह उपस्थित है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ स्त्री-कविता होते हुए भी केवल स्त्री-अनुभव तक सीमित नहीं रह जातीं।'माँ-मायके की नदी' से लेकर 'इस जग में' और 'अस्तित्व' तक एक ऐसी संवेदनात्मक निरंतरता दिखाई देती है जिसमें स्त्री का अनुभव व्यापक मानवीय अनुभव का रूप ग्रहण कर लेता है। यहाँ स्त्री का संसार निजी नहीं रह जाता; वह मनुष्य के साझा भावलोक का हिस्सा बन जाता है।
प्रकृति और मनुष्य के संबंधों पर विचार करते हुए 'कंप-भूकंप' कविता विशेष रूप से उल्लेखनीय हो उठती है। यह कविता पर्यावरणीय संकट पर लिखी गई अनेक समकालीन कविताओं से अलग है। इसमें न तो कोई मुखर क्रोध है और न ही कोई प्रत्यक्ष पर्यावरणीय नारा। इसके बजाय यहाँ एक गहरी सुनवाई है। धरती, नदी और पहाड़ की कराह को सुनने की कोशिश है।यह कविता हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ जो कुछ घटित होता है, वह अंतत: मनुष्य के साथ भी घटित होता है। विकास की अंधी दौड़ में हम जिन नदियों, पहाड़ों और जंगलों को नष्ट कर रहे हैंवे केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं; वे हमारी सभ्यता की स्मृतियाँ हैं। इसलिए जब कविता कराह सुनती है, तो वह केवल प्रकृति की नहीं, मनुष्य की भी कराह होती है।
यहीं विशाखा मुलमुले की कविताएँ एक महत्वपूर्ण नैतिक स्थिति ग्रहण करती हैं। वे प्रकृति और मनुष्य को अलग-अलग नहीं देखतीं। उनके यहाँ दोनों एक-दूसरे के विस्तार हैं। यह दृष्टि आज के समय में विशेष महत्व रखती हैक्योंकि आधुनिक विकास मॉडल ने मनुष्य और प्रकृति के बीच कृत्रिम विभाजन पैदा कर दिया है।
लोक-स्मृति भी इसी बिंदु पर आकर प्रकृति और मनुष्य के बीच सेतु का काम करती है। 'घोड़ामहल' जैसी कविता को यदि केवल इतिहास या सत्ता की कविता माना जाए तो उसका अर्थ सीमित हो जाएगा। दरअसल यह कविता उस सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है जिसमें लोक, इतिहास और वर्तमान एक-दूसरे से संवाद करते हैं। विशाखा मुलमुले इतिहास को केवल अतीत नहीं मानतींवह उनके लिए वर्तमान को समझने का माध्यम है।
इस प्रकार अनिर्बंध की कविताएँ मनुष्य, प्रकृति, स्मृति और समाज के बीच टूटते हुए संबंधों को पुन: जोड़ने का प्रयास करती हैं। यही कारण है कि इस संग्रह की संवेदना अंतत: जीवन-पक्षधर संवेदना बन जाती है। यह कविता किसी विचारधारा की नहीं, बल्कि मनुष्यता की तर$फ खड़ी कविता है।
इन कविताओं की सबसे गहरी परत वहाँ खुलती है जहाँ कवयित्री अस्तित्व, भाषा और मृत्यु जैसे प्रश्नों से जूझती दिखाई देती हैं। संग्रह की अनेक कविताएँ अंतत: इसी बिंदु पर आकर मिलती हैं। यही वह क्षेत्र है जहाँ अनिर्बंध अपनी सबसे बड़ी काव्यात्मक और वैचारिक ऊँचाई अर्जित करता है।समकालीन हिंदी कविता में अक्सर यह शिकायत की जाती रही है कि या तो कविता अत्यधिक वैचारिक हो जाती है या अत्यधिक निजी। विशाखा मुलमुले की कविताएँ इस द्वंद्व से बाहर निकलती हैं। वे जीवन के दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करती हैंलेकिन उन्हें किसी बौद्धिक अमूर्तन में नहीं बदलतीं। उनके यहाँ दर्शन जीवन से पैदा होता है, जीवन पर आरोपित नहीं होता।
'मौन' कविता इसी दृष्टि से संग्रह की एक केंद्रीय कविता है। यह कविता केवल चुप रहने या शब्दों की अनुपस्थिति की कविता नहीं है। यहाँ मौन भाषा की सीमा का बोध है। मनुष्य जितना कह सकता हैउससे कहीं अधिक ऐसा है जिसे वह केवल महसूस कर सकता है। कविता इसी अनकहे प्रदेश की ओर संकेत करती है। विशाखा मुलमुले जानती हैं कि जीवन के कुछ अनुभव शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किए जा सकते। प्रेम, शोक, विस्मय, मृत्यु और आत्मानुभूति के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जहाँ भाषा स्वयं अपनी अपर्याप्तता स्वीकार कर लेती है।यही कारण है कि उनकी कविताओं में कथन की अपेक्षा संकेत अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वे पाठक को अर्थ नहीं देतीं बल्किअर्थ की ओर ले जाती हैं। उनके यहाँ कविता किसी निष्कर्ष पर पहुँचकर समाप्त नहीं होती, बल्कि एक खुली जगह छोड़ जाती है जहाँ पाठक स्वयं अपने अनुभवों के साथ प्रवेश कर सके। यही गुण उनकी कविताओं को बार-बार पढ़े जाने योग्य बनाता है।
'अस्तित्व' कविता को पढ़ते हुए यह अनुभव और स्पष्ट हो जाता है। यह कविता जीवन को किसी स्थिर पहचान या परिभाषा के रूप में नहीं देखती। मनुष्य यहाँ एक निर्मित होती हुई सत्ता है, एक ऐसी प्रक्रिया जो निरंतर चल रही है। वे मनुष्य को ब्रह्मांड का केंद्र नहीं मानतींबल्कि उसे उस विराट व्यवस्था का एक छोटा-सा हिस्सा मानती हैं जहाँ हर चीज़ परस्पर जुड़ी हुई है।इस अर्थ में उनकी कविताएँ आधुनिक मनुष्य के अहंकार के विरुद्ध भी खड़ी दिखाई देती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि हमारा अस्तित्व केवल हमारी उपलब्धियों से नहीं बनता। वह स्मृतियों, संबंधों, अनुभवों, प्रेम, हानि और उन असंख्य अदृश्य सूत्रों से निर्मित होता है जो हमें दुनिया से जोड़ते हैं।
यहीं से संग्रह का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है- शोक का अनुभव। 'शोक की नदी मेंÓ कविता श्रृंखला इस अनुभव को एक विशिष्ट गहराई प्रदान करती है। इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे शोक को केवल अनुपस्थिति की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखतीं। यहाँ शोक जीवन को नए सिरे से समझने का अवसर बन जाता है।आमतौर पर मृत्यु की चर्चा करते समय कविता या तो करुणा में डूब जाती है या दार्शनिक निष्कर्षों की ओर भागने लगती है। विशाखा मुलमुले इन दोनों अतियों से बचती हैं। वे मृत्यु को स्वीकार करती हैंलेकिन उसे सामान्य नहीं बनातीं। वे शोक को महसूस करती हैंलेकिन उसमें डूबकर जीवन से विमुख नहीं होतीं।
'शोक की नदी में' की कविताएँ पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि कवयित्री मृत्यु को जीवन के विरोध में नहीं, जीवन के भीतर देखती हैं। मृत्यु यहाँ अंत नहींबल्कि जीवन की सीमाओं का बोध है। और शायद इसी कारण जीवन अधिक मूल्यवान हो उठता है। जो नश्वर हैवही प्रिय है। जो क्षणभंगुर हैवही स्मृति में बसता है।
संग्रह की अनेक कविताएँ इस मृत्यु-बोध को अलग-अलग रूपों में व्यक्त करती हैं। 'वाराणसी' में घाटों के बीच उपस्थित मृत्यु, 'विलोपन' में धीरे-धीरे मिटती चीज़ों का दुख, 'जीवनोत्सव' में जीवन की अस्थिरता का स्वीकार, और 'शोक की नदी में' का आत्मिक अवगाहन- ये सब मिलकर एक ऐसी संवेदना निर्मित करते हैं जिसमें जीवन और मृत्यु परस्पर विरोधी नहीं रह जाते।
भारतीय चिंतन परंपरा में जीवन और मृत्यु को एक निरंतर चक्र के रूप में देखा गया है। लेकिन कवयित्री इस परंपरा को किसी दार्शनिक सूत्र की तरह नहीं दोहरातीं। वे उसे अपने अनुभव के स्तर पर पुन: अर्जित करती हैं। इसीलिए उनकी कविताएँ उपदेश नहीं देतीं,वे जीवन को जीकर प्राप्त हुई समझ साझा करती हैं।
भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी अनिर्बंध उल्लेखनीय है। यह संग्रह कविता और गद्य के बीच की उस भूमि पर खड़ा है जहाँ विचार और संवेदना एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। कई कविताएँ यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण और आत्मचिंतन की सीमाओं को छूती हैंलेकिन अंतत: कविता ही बनी रहती हैं। इसका कारण यह है कि विशाखा मुलमुले अनुभव को केवल दर्ज नहीं करतीं,उसे रूपांतरित भी करती हैं।
उनकी भाषा में कोई आडंबर नहीं है। वह पाठक को चमत्कृत करने की कोशिश नहीं करती। लेकिन इसी सादगी में उसकी शक्ति निहित है। वे जटिल अनुभूतियों को सरल शब्दों में व्यक्त कर पाने की क्षमता रखती हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पढ़ने के बाद लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती हैं।
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में अनिर्बंध का महत्व इसी बात में है कि यह संग्रह जीवन के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। यहाँ क्षरण है, विलोपन है, मृत्यु है, अकेलापन हैलेकिन इनके बावजूद जीवन के प्रति विश्वास बना रहता है। विशाखा मुलमुले अपने समय की विडंबनाओं से आँख नहीं चुरातींलेकिन उनसे पराजित भी नहीं होतीं।
यदि इस संग्रह का एक केंद्रीय कथन खोजने की कोशिश की जाए तो शायद वह यह होगा कि मनुष्य को जीवन को उसकी समस्त अपूर्णताओं, अनिश्चितताओं और क्षणभंगुरताओं सहित स्वीकार करना सीखना चाहिए। यही स्वीकृति उसे विनम्र बनाती हैऔर यही उसे मुक्त भी करती है।
इस अर्थ में अनिर्बंध केवल यात्रा का काव्य नहीं है, केवल स्मृति का काव्य नहीं है, केवल प्रकृति या शोक का काव्य भी नहीं है। यह उन कविता-संग्रहों में है जो जीवन के विविध अनुभवों को एक व्यापक मानवीय दृष्टि में रूपांतरित कर देते हैं। इसकी कविताएँ हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि मनुष्य होना केवल जीना नहीं है; देखना, स्मरण करना, प्रश्न करना, प्रेम करना, शोक करना और अंतत: जीवन को स्वीकार करना भी है।
और शायद यही कारण है कि अनिर्बंध पढ़कर समाप्त नहीं होता। वह पाठक के भीतर एक धीमी गूँज की तरह बना रहता है- कभी स्मृति बनकर, कभी प्रश्न बनकर, कभी नदी की तरह बहते हुए और कभी उस मौन की तरहजिसमें शब्द समाप्त हो जाते हैं, लेकिन अर्थ जीवित रहते हैं।
— मालिनी गौतम
— अनिर्बंध (कविता संग्रह)
— कवयित्री- विशाखा मुलमुले
— प्रकाशक- सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली