यात्रा वृत्तांत जर्मनी की सैर
सत्ताइस जुलाई, 1932 ई0 को मैं लंदन पहुँचा था। तबसे 14 नवंबर तक इंग्लैंड में ही रहा।;
- राहुल सांकृत्यायन
सवा नौ बजे रात को (प्राय:) पाँच घंटे रात बीते हमारी ट्रेन परी स्टेशन से रवाना हुई। रास्ते में जिस व$क्त गाड़ी फ़्रांस की सीमा पार कर जर्मनी में घुसी, जकात वाले ने आकर पूछ-ताछ की। सिगरेट के लिए विशेष तौर से पूछा! फिर पासपोर्ट देखने वाला आया। अँग्रेज़ी प्रजा के लिए फ़्रांस और जर्मनी में वीसे की आवश्यकता नहीं होती।
सत्ताइस जुलाई, 1932 ई0 को मैं लंदन पहुँचा था। तबसे 14 नवंबर तक इंग्लैंड में ही रहा। वहाँ के निवास के बारे में फिर लिखूँगा। 14 नवंबर को मैं पेरिस नगरी के लिए रवाना हुआ और 26 नवंबर तक वहाँ रहा। दो व्याख्यान होने के अतिरिक्त मेरे तिब्बत से लाए चित्रपटों की वहाँ—मुजीग्विमे में प्रदर्शनी भी हुई। 26 नवंबर को चित्रों को मैंने रेलवे पार्सल से भेज दिया और स्वयं फ्रांकफुर्त (जर्मनी) के लिए रवाना हुआ।
सवा नौ बजे रात को (प्राय:) पाँच घंटे रात बीते हमारी ट्रेन परी स्टेशन से रवाना हुई। रास्ते में जिस व$क्त गाड़ी फ़्रांस की सीमा पार कर जर्मनी में घुसी, जकात वाले ने आकर पूछ-ताछ की। सिगरेट के लिए विशेष तौर से पूछा! फिर पासपोर्ट देखने वाला आया। अँग्रेज़ी प्रजा के लिए फ़्रांस और जर्मनी में वीसे की आवश्यकता नहीं होती। हमारे खाने की दोनों बेंचों पर अकेले हमी थे, इसलिए सोने का आराम रहा। गाड़ी फ्रांकफुर्त, 10 बजे सबेरे या घंटा दिन चढ़े, पहुँचने वाली थी। आठ बजे पह (प्रभा) फटने लगा और फिर ड्वाश-लान्ट (जर्मनी) की सुहावनी भूमि दिखलाई देने लगी। भूमि ऊँची नीची तथा पहाड़ों से घिरी थी। लंबे-लंबे जुते हुए खेत और पत्रहीन नंगे वृक्षों की भरमार बतला रही थी कि जर्मनी सिर्फ कारख़ानों का ही देश नहीं है। जगह-जगह, कस्बों में भी, बड़ी-बड़ी चिमनियों वाले कारख़ाने हैं। रेल में मिलने वाले दीर्घकाय हृष्ट-पुष्ट ऑिफसर फ़्रांस के नफासत-पसंद दुबले-पतले शिक्षितों से पृथक हो रहे थे।
परी से ही मित्रों ने, सबेरे के कलेवे के लिए, दो सेब और सैंडविच के दो-तीन टुकड़े रख दिए थे। सैंडविच को सत्तू की तरह बहुगुणा भोजन समझिए। पतली पावरोटी बीच से फाड़कर और उसमें मक्खन लगाकर एक पतली तह बैकन (सूअर के माँस) की रख दी जाती है, बस यही सैंडविच है। इसके ऐसा नाम पड़ने का कारण यह बतलाया जाता है कि इंग्लैंड मे लार्ड सैंडविच नामक सामंत हर वक्त जूए और पासे के खेल में लगा रहता था। वह अपने खेल को छोड़कर खाने के लिए भी अधिक समय नही लगाना चाहता था, इसलिए नौकर खेल पर ही उसे उक्त प्रकार का भोजन रख देते थे। वह खेलते-खेलते उसे खाता जाता था! लार्ड सैंडविच का खाना होने से उसका नाम ही सैंडविच पड़ गया।
मैं सेब और सैंडविच खाकर तैयार था कि 10 बजे हमारी ट्रेन फ्रांकफुर्त आम माइन स्टेशन पर पहुँची। श्रीयुत इंद्रबहादुर सिंह को अपने आने की सूचना पहले से ही दे रखी थी—और साथ ही इस बात की भी कि मेरे नारंगी रंग के कपड़े दूर से ही मालूम पड़ जाएँगे! सचमुच ही, प्लेट$फार्म पर उतरते ही देखा, चश्मा दिए ,भेंड़के खाल की स$फेद गाँधी टोपी लगाए एक हृष्ट-पुष्ट नौजवान सामने आ खड़े हुए हैं। उनके साथ एक दूसरे सज्जन थे, जिनका परिचय इंद्रजी ने जापान-निवासी प्रो$फेसर डाक्टर कितायामा कहकर दिया। टैक्सी करके हम लोग शूमान-स्ट्रासे गए। डाक्टर कितायामा जापान के जो दो संप्रदाय के बौद्ध भिक्षु हैं। 10 वर्ष पूर्व, उन्हें जर्मनी में संस्कृत और आधुनिक अन्वेषण की विद्या सीखने के लिए उनके मठ ने भेजा था। डाक्टर (क्कद्ध.ष्ठ.) होने के बाद, कितने ही वर्षों से वह मारबुर्ग और फ्रांकफुर्त के विश्वविद्यालयों में बौद्ध धर्म तथा चीनी भाषा के अध्यापक हैं। डा0 रुदाल्$फ ओतोने उन्हें ख़ास तौर से, मुझे मारबुर्ग लाने के लिए भेजा था।
स्रोत :
पुस्तक : मेरी यूरोप यात्रा (पृष्ठ 142) रचनाकार : राहुल सांकृत्यायन प्रकाशन : साहित्य-सेवक-संघ, छपरा संस्करण : 1935