अवतार कौल : एक काबिल डायरेक्टर जिसे बिसरा दिया गया

आज भी उन्हें उनकी इन ऑल टाइम क्लासिक $िफल्मों से जाना जाता है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-11 21:50 GMT
  • ज़ाहिद ख़ान

किताब समीक्षा : 'अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी', लेखक : विनोद कौल, प्रकाशक : पब्लिकेशन डिवीजन मिनिस्ट्री ऑफ इनफार्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, पेज : 280, मूल्य : 365

हिन्दी सिनेमा में जब भी समानांतर सिनेमा की बात होती है, तो कुछ फिल्म डायरेक्टरों का अहमियत से जि़क्र होता है और बाकी को बिसरा दिया जाता है। जबकि कुछ डायरेक्टर और ऐसे हैं, जो सिर्फ एक ​फिल्म से फिल्मी दुनिया में अपनी अविस्मरणीय छाप छोड़ गए। आज भी उन्हें उनकी इन ऑल टाइम क्लासिक फिल्मों से जाना जाता है। इनमें पहला नाम, अवतार कौल और दूसरा रवीन्द्र धर्मराज है। 'चक्र' फिल्म के निर्देशक रवीन्द्र धर्मराज को महज़ 33 साल की उम्र मिली। और उनकी बद—किस्मती देखिए, जिस साल 1981 में उनकी फिल्म रिलीज हुई, उसी साल उनकी मौत हो गई। यानी फिल्म की कामयाबी देखने से पहले ही वे इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। ठीक यही कहानी इससे पहले अवतार कौल के साथ घटित हुई थी। और साल था 1974। जिस साल उनकी फिल्म '27 डाउन' को दो राष्ट्रीय पुरस्कारों—सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफी के पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का एलान हुआ, ठीक उसी दिन अपनी महिला दोस्त को समंदर में डूबने से बचाने के चक्कर में उनकी बेवक्त मौत हो गई। अवतार कौल की उस वक्त उम्र जानें, तो महज़ 35 साल थी। यह होनहार डायरेक्टर, जो काफी जद्दोजहद कर इस मुकाम तक पहुॅंचा था, अपनी कामयाबी नहीं देख पाया। अवतार कौल की जि़ंदगी देखें, तो उनकी इब्तिदाई जि़ंदगी बेहद तकलीफदेह रही। बचपन में अवतार ने एक चाय की दुकान और होटल पर भी काम किया। संघर्षों के बाद विदेश मंत्रालय में उन्हें एक छोटी—सी नौकरी मिल गई और उनका तबादला अमेरिका में हो गया। न्यूयॉर्क में नौकरी के दौरान उन्होंने वहॉं फिल्म निर्माण सीखा। भारत लौटने पर कौल ने मर्चेंट आइवरी प्रोडक्शंस की 'बॉम्बे टॉकी' में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। और दो साल बाद अपनी पहली फिल्म '27 डाउन' शुरू की।

बहरहाल, '27 डाउन' जब रिलीज हुई, तो इसको न सिर्फ दर्शकों का बेशुमार प्यार मिला, बल्कि लीक से हटकर बनी इस आर्ट फिल्म की फिल्म क्रिटिक और एक्सपर्ट ने भी दिल से सराहना की। ख़ास तौर से फिल्म के निर्देशन, फोटोग्राफी और राखी की अदाकारी को ख़ूब तारीफ मिली। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी सराहना और अवार्ड हासिल हुए। इतनी सारी उपलब्धियाँ हासिल करने के बावजूद '27 डाउन' और अवतार कौल दोनों को एक लंबे दौर तक गुमनामी का सामना करना पड़ा। समानांतर सिनेमा आंदोलन में उनको वह मुकाम हासिल नहीं हुआ, जिसके वह वास्तविक हकदार थे। यही सब वजह हैं कि अवतार कौल के भांजे विनोद कौल ने उनके ऊपर एक शोधपरक किताब 'अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी' लिखी, जो अवतार कौल के संघर्षमय जीवन और उनके फिल्मी सफर ख़ास तौर पर '27 डाउन' पर तफसील से नज़र डालती है। विनोद कौल, 'राज्यसभा टीवी' के कार्यकारी निदेशक पद पर रहे हैं। 'अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी' तकरीबन 280 पेज की है और दो हिस्सों में बॅंटी हुई है। किताब के पहले और अहम हिस्से में अवतार कौल की जि़ंदगानी के सफर को दस्तावेज़, मौखिक इतिहास, अभिलेखों और नायाब तस्वीरों के मार्फत पेश किया गया है। चौदह गहन शोधपरक अध्याय अवतार कौल के बचपन, नौजवानी, शिक्षा, संघर्षों और उनकी अमेरिकी पत्नी ऐन कौल की कहानी को तटस्थता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। वहीं किताब का दूसरा हिस्सा अवतार कौल को एक शख़्सियत और एक डायरेक्टर के तौर पर समझने की कोशिश है, जिसे उनके साथ काम करने वाले साथियों, क्रू मेम्बरों, जर्नलिस्ट, विद्वानों और फिल्म क्रिटिक के तजुर्बों और ख़यालात से बुना गया है। मसलन सिनेमेटोग्राफर ए.के.बीर, साउंड रिकॉर्डिस्ट अरुणोदय शर्मा, एफटीआईआई फैकल्टी पंकज सक्सेना, स्टूडेंट अर्पित गोयल, राइटर—जर्नलिस्ट अविजित घोष और फिल्म क्रिटिक ए.के.अरुण, जय अर्जुन सिंह के ख़यालात के मार्फत अलग—अलग नज़रिए पेश किए गए हैं। ताकि अवतार कौल की पूरी शख़्सियत और उनके डायरेक्शन का ढंग और तरीका पाठकों को पता चले।

किताब उस दौर के भारत के सिनेमाई परिवेश, गवर्नमेंट पॉलिसी और उन हालात पर भी रोशनी डालती है, जिनके दरमियान अवतार कौल ने अपनी फिल्म बनाने का हौसला किया। यही वजह है कि यह महज़ एक जीवनीपरक किताब नहीं, बल्कि उस समय के सिनेमा, समाज और रचनात्मक संघर्षों का भी एक दिलचस्प दस्तावेज़ है। '27| Down on the Track' अध्याय, फिल्म की टीम के सिलेक्शन की पूरी प्रक्रिया को सामने लाता है। यह अवतार कौल की सिनेमा की गहरी समझ, दूरदृष्टि और काबिलियत को पहचानने की अद्भुत क्षमता को उजागर करता है। कुछ चुनिंदा मेम्बर मसलन आर्ट डायरेक्टर बंसी चंद्रगुप्त को छोड़ दें, तो तकरीबन पूरी टीम नई थी; कई लोगों के लिए तो यह पहली फिल्म ही थी। बाद के सालों में यही लोग इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के प्रतिष्ठित और सम्मानित नामों में गिने जाने लगे। इनमें बॉंसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया, साधु मेहर, रेखा सबनिस, ओम शिवपुरी, नरेन्द्र सिंह और एम.के.रैना जैसे नाम शामिल हैं।

फिल्म निर्माण के समय सबसे चर्चित फिल्म की हीरोइन राखी थीं, जो यह जानते हुए भी कि यह अवतार कौल की पहली फिल्म है और '27 डाउन' में उन्हें बिना ग्लैमर के पेश किया जाएगा, फिल्म को करने के लिए राज़ी हो गईं। पूरी फिल्म में राखी बिना मेकअप के एक ही सूती साड़ी में नज़र आती हैं। डायरेक्टर अवतार कौल ने उन्हें बड़े ही ख़ूबसूरती से कैमरे में कैप्चर किया है। '20th July 1974' अध्याय अवतार कौल की जि़ंदगी के दो बेहद मुख़ालिफ और फैसलाकुन लम्हों—उनकी रचनात्मक उपलब्धियों और उनकी बेवक्त मौत को एक साथ छूता है। एक ओर जहाँ यह उनके राष्ट्रीय पुरस्कार और सिनेमा में मिली मान्यता जैसे गौरवपूर्ण पलों को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर उनकी अचानक और अफसोसनाक मौत के ब्यौरे को भी सामने लाता है। अवतार कौल अपनी जि़ंदगी में '27 डाउन' के उस कम्प्लीट इफेक्ट को नहीं देख पाए, जो समय के साथ सामने आया। न ही उन्हें वह व्यापक पहचान मिल सकी, जो एक लंबे रचनात्मक जि़ंदगी से हासिल हो सकती थी।

'27Down on the Track' और 27 Down Through My Eyes' जैसे अध्यायों में विनोद कौल ने फिल्म के निर्माण की पूरी प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है। इसमें नई कहानी और अकहानी के सशक्त हस्ताक्षर रमेश बक्षी के चर्चित उपन्यास 'अठारह सूरज के पौधे' के पटकथा में रूपांतरण से लेकर चलती ट्रेन में राखी जैसी स्थापित अभिनेत्री के साथ आम यात्रियों के बीच शूटिंग करने के अनुभवों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। इन प्रसंगों को नायाब ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन तस्वीरों, एडिट स्क्रिप्ट्स और स्क्रिप्ट की कॉपियों के मार्फत प्रमाणिक तौर पर सामने रखा गया है। फिल्म '27 Down' के उस मशहूर टॉप-एंगल शॉट—जिसमें बॉम्बे वीटी पर लोकल ट्रेनों के रुकने के साथ खाली प्लेटफॉर्म कुछ ही पलों में भीड़ से भर जाता है—की योजना, तकनीकी तैयारी और निष्पादन पर विस्तार से चर्चा की गई है। साथ ही इस सीन को लेकर मुख़्तलिफ फिल्म समीक्षकों और विश्लेषकों के दृष्टिकोण तथा उसके सिनेमाई महत्व को भी किताब में शामिल किया गया है। बाद में यही सीन डायरेक्टर डैनी बॉयल की मोस्ट पॉपुलर और सुपरहिट फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के आख़िरी सीन में भी ज्यों के त्यों फिल्माया गया। इस सीन के अलावा सिनेमेटोग्राफर ए.के.बीर ने पूरी फिल्म में कमाल का कैमरा वर्क किया है। मसलन उन्होंने 1966 की फिल्म 'दि बैटल ऑफ अल्जीयर्स' से प्रेरणा लेकर सत्तर फीसद फोटोग्राफी हाथ के कैमरे से की। ताकि ट्रेन में भीड़ भरे माहौल को सही तरह से कैप्चर कर सकें। डायरेक्टर अवतार कौल ने छाया और प्रकाश का सही संतुलन बनाने के लिए फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनाई। फिल्म को प्रमाणिक बनाने के लिए उन्होंने ज़्यादातर शूटिंग वास्तविक लोकेशन यानी ट्रेन, रेलवे प्लेटफार्म, स्टीम यार्ड, रेलवे परिसर के बाहरी इलाकों और रेलवे क्वार्टर में की। यही नहीं उन्होंने बनारस के घाट और गलियों में भी फिल्म के अहम सीन फिल्माये। फिल्म का टाइटल '27 डाउन', बॉम्बे—वाराणसी एक्सप्रेस पर रखा गया। एक तरह से देखें, तो यह फिल्म पूरी तरह से प्रयोगधर्मी थी। जिसमें अवतार कौल ने नए—नए प्रयोग किए।

किताब में फिल्म '27 Down' के सब्जेक्ट, उसके सिनेमाई ट्रीटमेंट और किरदारों के माध्यम से सामाजिक दबावों के बीच फैसला न ले पाने की दार्शनिक स्थिति का भी विश्लेषण किया गया है। ख़ास तौर पर पुरानी और नई पीढ़ी का वैचारिक द्वंद्व, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी रहता है। फिल्म के अहम किरदार संजय (एम.के. रैना) और शालिनी (राखी) का जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में अनिर्णय की स्थिति में रहना ही '27 Down' का केन्द्रीय विषय है। लेखक विनोद कौल का मानना है कि अवतार कौल की फिल्म '27 Down' मुख्यत: दो पटरियों पर चलती है—पहली उसकी कथा और दूसरी उसका छायांकन। इन दोनों पक्षों के प्रमुख सूत्रधार क्रमश: कथाकार रमेश बक्षी और छायाकार ए.के.बीर रहे हैं। इन्हीं दोनों रचनात्मक सहयोगियों के साथ अवतार कौल के पेशेवर और व्यक्तिगत संबंधों को आधार बनाते हुए किताब में दो पृथक अध्याय—'Awtar and Bir's Duo Ñ Creation of the Over-the-Shoulder Shot' और 'A Shared Vision of Awtar and Bakshi' शामिल किए गए हैं। फिल्म के निर्माण से लेकर उसके फिल्मांकन तक की पूरी यात्रा में ये दोनों लंबे समय तक अवतार कौल के साथ जुड़े रहे तथा इस रचनात्मक सफर और उससे जुड़े विविध अनुभवों के सहभागी बने। दरअसल, इन अध्यायों के मार्फत लेखक विनोद कौल, अवतार कौल को सिर्फ एक डायरेक्टर के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, विचारशील और मानवीय व्यक्तित्व के रूप में भी सामने लाने में कामयाब रहे हैं। और यही उनकी किताब का मकसद है। एक काबिल डायरेक्टर को उसका वास्तविक हक मिले, जो वक्त की गर्द में कहीं दब सा गया है। और उसे जाने—अनजाने बिसराने की कोशिश भी होती रहती है। 

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