'आखिरी मुनादी'

अशरा-ए-निजात के चार दिन बीत गए हैं। ईद की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। उम्मीद है इसी हफ़्ते ईद के चांद के दीदार होंगे;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-06-28 05:13 GMT
  • डॉ.नवनीत धगट

रहमान सूबेदार साहब, रिटायरमेंट के बाद से नमाज़ के बड़े पाबंद थे। सुबह सच्चे उजाले फज्र की नमाज से बहुत पहले जाग जाते, गुस्ल कर तैयार होते। रमजान की सहरी भी उनकी वक्त पर होती। उन्हें नब्बू शाह तकिएदार की कोई ज़रूरत न थी, पर नब्बू शाह तकिएदार का फितरा और दीगर खैरात के बिना ईद पूरी होगी कैसे ? मोहल्ले के दूसरे रोज़ेदारों को तो थी ज़रूरत कि कोई सहरी जगाए। सारे दिन की मशक्कत और रोज़ा अफ़्तारी के बाद जो गहरी नींद आती वो नब्बू शाह की आवाज़ पर ही खुलती। सो रमज़ान की सुबहों में नब्बू शाह की खूब जानी-पहचानी खरजदार बुलंद आवाज़ ही कारगर थी।

अशरा-ए-निजात के चार दिन बीत गए हैं। ईद की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। उम्मीद है इसी हफ़्ते ईद के चांद के दीदार होंगे। रमज़ान के महीने भर से सहरी जगाने वाले नब्बू शाह की आवाज़ से अल सुबह मुर्गों की बांग से पहले नींद खुल जाती है। शहर के काज़ी मुहाल, शुक्रवारी, पठान टोला, शनीचरी, पुरानी सदर, कछियाना के बच्चे-बूढ़े कौन होंगे जो नब्बू शाह और उनकी आवाज को पहचानते न हों !

रहमान सूबेदार साहब के घर की छत पर हाथों की बनी सिवईयें सूखने लगी हैं। उनकी अहलिया के वालिद कुरवाई रियासत के ओहदेदार थे। वे अपने मायके से हाथों से सिवईयाँ बनाने का ऐसा हुनर सीख कर आई थीं कि उन्हें सिवईयाँ बनाते देखने आस- पड़ोस की औरतें धूप निकलते ही अपने सिरों को ढंक के उनके घर की छत पर डेरा जमा लेतीं। झक्क सफेद मैदे की लोइयाँ उनके हाथों की अंगुलियों में कुछ ऐसे पसरतीं कि देखते ही देखते धागे के जैसी पतली सिवईयों में तब्दील होती जातीं। छत पर करीने से जमा कर पलंगों पर में सूखने फैला दी जातीं। इन्हें बनते हुए देखना गजब कौतूहल होता, जैसे कोई जादू हो। कैसे मैदे की लोई तार-तार होती, उनमें से न कोई टूटती, न उलझतीं। इन्हें देखने में समय का जैसे पता ही नहीं चलता। ये आज के ज़माने की बात थोड़ी न है। अब तो ज़्यादातर घरों में तो पीतल की मशीनें - जो टेबल के किनारों में कसी जातीं हैं, से सिवईयें बनाई जाने लगी हैं। किसे फुरसत है इन झमेलों में पड़ने की ? और सच तो ये कि जादूगरी सा लगने वाला ये हुनर सब के हाथों में है कहाँ ? अब तो शरीफ टेलर मास्टर की बड़ी बेटी के निकाह की तारीख़ भी तय हो गई है। कितनी ही बार पूछती है -

'फुफ्फी, हमें भी बताओ ना ? सेवइयों का मैदा कैसे बनाते हैं कि ये रबर के जैसा खिंचता है, टूटता नहीं ?'

सूबेदारनी हमेशा कोई बहाना कर के टाल जातीं, फौरन बात बदल देतीं ...

'वो जो तुझे क्रोशिए का स्वेटर बनाना सिखाया था,कड़ी बुनाई वाला, बनाना शुरू किया या नहीं ?'

हाथों से सेवइयां बनाने का हुनर ही तो था, जिसकी वजह से मुहल्ले की दूसरी औरतों में सूबेदारनी की धाक और जुदा पहचान थी। बातें फिर बदल देतीं :

'घरों के काम भी कभी ख़त्म होते हैं ? ईद करीब है, इबादतें तो करनी ही हैं, नए कपड़े सिलाने हैं, घर की साफ- सफाई करनी है, नब्बू शाह का फितरा भी निकालना है।'

रहमान सूबेदार साहब, रिटायरमेंट के बाद से नमाज़ के बड़े पाबंद थे। सुबह सच्चे उजाले फज्र की नमाज से बहुत पहले जाग जाते, गुस्ल कर तैयार होते। रमजान की सहरी भी उनकी वक्त पर होती। उन्हें नब्बू शाह तकिएदार की कोई ज़रूरत न थी, पर नब्बू शाह तकिएदार का फितरा और दीगर खैरात के बिना ईद पूरी होगी कैसे ? मोहल्ले के दूसरे रोज़ेदारों को तो थी ज़रूरत कि कोई सहरी जगाए। सारे दिन की मशक्कत और रोज़ा अफ़्तारी के बाद जो गहरी नींद आती वो नब्बू शाह की आवाज़ पर ही खुलती। सो रमज़ान की सुबहों में नब्बू शाह की खूब जानी-पहचानी खरजदार बुलंद आवाज़ ही कारगर थी।

'रोज़ेदारो ! उ_ो, सेहरी का वक्त हो गया। '

लंगडाते हुए से नब्बू शाह, चलते क्या लगभग दौड़ते थे। हाथ की सांप के जैसे आकार वाली लकड़ी को फर्शियों पर पटक कर आवाज निकालते हुए। बहुत तेजी से गलियों के एक कोने से दूसरे कोने तक आवाज़ लगाते जाते।

'उ_ो... रोजेदारों, सहरी का वक्त हुआ। अल्लाह का नाम लो, रहमत का वक्त हुआ। उठो-उठो ऐ रोज़ेदारो, सहरी का वक्त आया है, बरकत वाली घड़ी आई है।''

नब्बू शाह शहर के कितने ही इलाकों में सहरी जगाने जाते। रोज़ेदारों को नींद से जागकर उठना ही होता। फज्र की अजान से पहले सेहरी हो गई तो ठीक वरना अगले दिन की रोज़ा अफ्तारी तक के लिए खाना तो क्या, तपती गर्मी में पानी का कतरा तक नसीब नहीं होना था।

अजीबो-गरीब हुलिए वाले नब्बू शाह 'तकिएदार' इस वजह से कहे जाते कि उनका ठिकाना मोहल्ले की तकिया मस्जि़द के पास चमेली के झाड़ से लगकर बना छोटा, बिना प्लास्टर का कच्चा मकान था। उम्र के बारे में कोई कुछ ठीक-ठीक तो नहीं बता पाता पर कोई पचास-पचपन से तो ऊपर रही होगी। सालों-साल एक सा देखा। छोटा कद, लिबास- हमेशा एक सा -पायजामे के ऊपर थोड़ा सा दिखाई देने वाला मटमैला कुरता और उस पर कोई पुराना गहरे रंग का मैला सा,ढीला बागानुमा, कोट। पूरे समय सिर पर अलग सी सूफियाना टोपी, - बारहों महीने, चौबीसों घण्टे...। मेहंदी से रंगी हुई खिचड़ी दाढ़ी, बेतरतीब कंधे तक झूलते हुए बाल, चेहरा बेनूर पर सुरमा लगाई चमकीली आखें...। कई मर्तबे जब खैरात मांगने निकलते उनके हुलिए में सिर पर हरा रूमाल बंधा होता, एक हाथ में एक सर्पाकार लकड़ी का टुकड़ा, दूसरे हाथ में कांसा के साथ, मोर पंख की बनी एक झाड़न होती।

चाय-बिस्कुट और अंडों की नूर होटल में कैरम और शतरंज की बाजियों में जमे चाय सुड़कते शोहदों की बातचीत में कभी कभार नब्बू शाह का जि़क्र होता। एक, दूसरे को आँख मार कर शरारती लहजे में कहता -

'तू तो नब्बू शाह अफीमची है।'

नब्बू शाह की गजब ऊर्जा,और सक्रियता देख कर लगता भी ऐसा ही था। जैसे थकते नहीं थे, सुस्ताते नहीं थे। मशीन के जैसे काम करते। कभी सुना नहीं कि उन की तबीयत नासाज़ रही हो। इसी वजह से तो मोहल्ले वाले उनकी की झोली में कुछ ना कुछ डालने की तैयारी ईद से पहले कर लेते। वैसे भी वे झोली ले कर निकलते तो खाली हाथ नहीं लौटते। नब्बू शाह सिर्फ सेहरी जगाने का काम ही थोड़ी न करते थे। ये कहिए कि क्या-क्या नहीं करते थे वे ? मोहल्ले वालों ने नब्बू शाह को सालों-साल, कई-कई किरदारों में देखा। पैदाइश से लेकर मातम तक उन के बिना कभी कोई काम सम्हल सका है ? सहरी जगाना तो रमज़ान की बात हुई। उनके कामों की लम्बी फेहरिस्त थी। मौत-मिट्टी से लेकर ब्याह-बारात तक के इत्तिला, ऐलान और पैगाम भी नब्बू शाह के जिम्मे होते। मुनादी, दावत ए निकाह, दावत ए वलीमा, मजलिस, फातेहा, जनाज़े की इत्तिला, दुआ की दरख्वास्त, तबर्रूक, मिलाद, अकीका, बेटी के हरे पान आने हों, रुख्सती, मेहर, सेहराबंदी,दावत की इत्तिला हो, नब्बू शाह ही काम आयेंगे। वे घरों-घर जाकर आवाज़ लगाते -

'जमाल बाबू ,जमाल बाबू...,अंजुमन मस्जि़द वाले हैदर साहब के यहाँ नूरचश्म की सेहराबंदी है। ज़रूर तशरीफ लाइए।'

'शर्मा साब, शर्मा साब... विलायत खान फारेस्ट वालों के यहाँ आप को वलीमे की दावत है। दावत कबूल कीजिए।'

'सब सब भाइयों को मालूम हो, ट्रांसपोर्ट वाले साबिर मिज़ार् के यहाँ बेटे की पैदाइश हुई है,दुआ की दरख्वास्त है। अकीका ब-रोज़ जुमे होगा। शिरकत फरमाएं।'

'इत्तिला दी जाती है कि असिफ वकील साहब के वालिद साहब का इंतकाल हो गया है। आज असर के बाद जनाजे की नमाज़ होगी। सब सब भाई शामिल हों और सबाब हासिल करें।'

ऐसे ही ना जाने कितनी खबरों, दावतों और ऐलानों के लिए नब्बू शाह दावतिया, खबरिया, नकीब,मुश्तहर सभी कुछ थे। वे ही तो थे जो तमाम घरों को उनके घर मालिकों के नामों से जानते थे।

अक्सर सुबह वे गलियों में निकल पड़ते, मोहल्लों के बच्चों को घरों से निकलवाते और अपने साथ लेकर, उन्हें नसीहतें देते हुए मदरसे छोड़ने जाते। खैरात मांगने निकलते, नंग धड़ंग या अकेली चड्डी पहन कर गली में दौड़ते बच्चे के पास रुक जाते।

'पायजामा पहना करो, मदरसे जाया करो।'

बात यहीं खत्म नहीं होती। नब्बू शाह बार बार बीमार पड़ रहे बच्चों को दुआ पढ़कर मोर पंख से झाड़ा लगा देते।

बीड़ी मज़दूरी करने वाली मेहरुन्निसा झूले में सो रहे बच्चे को देखकर, कई लोगों को बताती-

'इस की जिंदगी तो नब्बू शाह की दुआओं और झाड़ा देने से ही बची है। डॉक्टरों, हकीमों ने तो जवाब दे दिया था। कोई उम्मीद नही रही थी। '

एक काम और था उनका, जिसका जि़क्र बेहद ज़रूरी है पर हो नहीं पाया है। मौत के मातम और जनाज़ों के ऐलान के साथ, जनाज़ों को सुपुर्दे ख़ाक करने के लिए नब्बू शाह कब्रिस्तान में कब्रें खोद के तैयार करने का काम भी लेते। जनाज़ों के साथ कब्रिस्तान जाने वाले बताते कि वे कई पुरानी कब्रों को की ओर इशारा करके कहते -

'ये सब हमारी चवन्नियां, अठन्नियां हैं। '

नब्बू शाह ये बात किस अर्थ में बोलते, कोई समझ नहीं पाता।

पैदाईश पर दुआओं की दरख्वास्त से लेकर चालीसवें की इत्तिला तक के सारे काम नब्बू शाह के जिम्मे। और फिर खैरात मांगने वाला फकीरी का काम तो था ही। मोहल्ले के लोगों के कानों को नब्बू शाह की आवाज़ की आदत हो चुकी थी। नब्बू शाह की आवाज़ मोहल्ले वाले काम रोककर और कान लगाकर सुनते। किसी की मौत की खबर जब तक नब्बू शाह की आवाज में ऐलान होने तक कच्ची मानी जाती। शायद ही कोई दिन गुजरता जब नब्बू शाह की आवाज़ सुनाई न दे। कई बार तो दिन में दो या उस से भी अधिक बार वे मोहल्ले की गलियां नापते। कुल जमा नब्बू शाह काम के आदमी थे, और थे भी इज़्ज़तदार इंसान।

नब्बू शाह कोई दूसरा काम न होने पर कभी कभार गुदड़ी के जैसे कपड़ों की सिली कई परतों वाली झोली लिए, टहलते से, धीमे कदमों से चलते खैरात मांगने गली मोहल्लों में दिखाई देते। उनका लहज़ा फिलसूफ होता -वे हिकमत के आलिम की तर्ज में आवाज़ देते -

'जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला !!'

आसमान की ओर देखते हुए वे किसी से बात करते, नसीहतें सुनाते -

'बाबा ! माँ बाप गलती करते हैं, औलाद को भुगतना पड़ता है ।'

'माल दुनिया में रह जाएगा, नेकी साथ जाएगी।'

'बाबा सब्र करने वाले पर खुदा की रहमत होती है। दौलत से नहीं रहमदिल से इंसान बड़ा होता है ।'

'बाबा किसी का दिल ना दुखाओ दिल में खुदा बसता है ।'

'अल्लाह तमाम हाकिमों का भी हाकिम है। बाबा, अल्लाह की अदालत में तमाम हाकिमों का जाना लाबुदी है। अल्लाह की अदालत में फैसले नहीं इन्साफ हुआ करते हैं।'

इन जुमलों मे एक लय होती और आखिरी के लफ्जों पर ज़ोर और ठहराव होता था। यानी नब्बू शाह सिर्फ खैरात ही नहीं मांगते बल्कि नेकी, रहम और ईश्वर की याद दिलाने का काम करते। लोग उन्हें सिक्के, आटा, अनाज, कपड़े देते। वे इन्हें साथ की कई परतों वाली झोली में अलग-अलग रखते। नब्बू शाह अपनी खैरात की झोली में से कुछ सिक्के और कपड़े वगैरह गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों को बांटते देखे जाते थे।

आज चांद रात है। ईद के ऐलान का शिद्दत से इंतज़ार है। मोहल्ले तैयारियां कर खुशियों का इंतज़ार कर रहे हैं। महीने भर, सहरी जगाने वाले नब्बू शाह तकिएदार का मेहनताना कहिए, फितरा या खैरात, ज़्यादातर घरों में तैयार रखा हुआ है ।

अजल का पैगाम कब आ जाए कौन जाने ? जिंदगी और मौत का वक्त मुकर्रर है, मगर हमें मालूम नहीं है। ईद के इंतजार और तैयारियों के ऐन पहले बुजुर्ग नौशे मियां चल बसे। उनके घर और पास पड़ोस में मातम पसर गया। नज़ीम साउंड सर्विस वाले ने दूकान पर हमेशा बजती रहने वाली कव्वालियों की आवाज़ नहीं आ रही थी। नौशे मियां के बेटे ने सबसे पहले नब्बू शाह को खबर दी। घर में सलाह करके जनाजे का वक्त तय किया। नब्बू शाह को इत्तिला करने का काम सौंपा गया। गर्मी का मौसम और चिलचिलाती धूप। नब्बू शाह तेजी से ऐलान करने दौड़ पड़े -

'सब सब भाईयों को मालूम हो कि नौशे मियां, घटिया वालों का इंतकाल हो गया है। '

'अहले मुहल्ला से गुजारिश है कि जनाजे में शिरकत कर सबाब हासिल करें।'

' जनाज़े की नमाज में शिरकत कर सबाब हासिल करें।'

हमीद मास्टर साहब, इरफान बीड़ी सट्टेदार, मुस्तकीम वेल्डिंग वाले, मुंशी आसिफ अली मेम्बर साहब, आसिफ कम्पाऊंडर, जो नौशे मियां को इंजेक्शन लगाने उनके घर जाते, सभी घरों में खबर करते नब्बू शाह तेजी से कदम रखते ऐलान करते आगे बढ़ रहे थे। चिलचिलाता सूरज सिर पर था। बेशक बिना देखे वे गलियों के हर पत्थर और हर नुक्कड़ और गड्ढे, ज़र्रे-ज़र्रे से बखूबी वाकिफ थे। पर इंसान गलतियों का पुतला है। नब्बू शाह का पैर जल्दबाज़ी में संकरी सुनसान गली की उबड़-खाबड़ जमी दो फर्शियों के बीच की जगह में जा फंसा। ठोकर खाई, लड़खड़ाये, गिरे और सिर गली से होकर किसी मकान में चढ़ने वाली फर्शी में ज़ोरों से जा टकराया ।

'या अल्लाह !!'

उनके मुंह से बस ये दो आखिरी अल्फाज़ ही निकल सके। कोई गहरी चोट लगी थी। सिर से भलभला कर बह निकले खून से उनकी टोपी और कपड़े तर हो गए। खून सिर के पास की नाली के पानी के साथ मिल कर बहने लगा। मुंह, नाक और कान से खून बाहर आ गया। नब्बू शाह का जिस्म चंद मिनट तड़पा, और बेजान सा हो गया। उनकी सांसें उखड़ने लगीं, नज़र पड़ते ही लोग दौड़ पड़े, उन्हें लेकर छोटी अस्पताल पहुंचे, ड्यूटी डॉक्टर ने नब्ज़ और आखों की जांच कर बताया -

'खत्म हैं...।'

नब्बू शाह का बेजान जिस्म, तकिया मस्जि़द के पास उनके कच्चे बने आशियाने में लाया गया। उनकी शरीक ए हयात या कोई औलाद कोई उनके साथ रहती न थी। लोग बताते कि पहले उनकी बीवी की पहली शादी से हुई बेटी उन के साथ अकेली रहती थी। कई साल हुए, किसी बीमारी के चलते पहले ही चल बसी थी।

नब्बू शाह तकिएदार की मौत की खबर उनको जानने वालों तक किसने और कैसे पहुंचाई गई ? उनका जनाज़ा कैसे निकला गया ? कब्र किसने खुदवाई ? ईद की खुशियाँ छोड़ के कौन-कौन उनके जनाजे में शामिल हुआ ? कौन जनाजे के साथ चालीस कदम चला ? किसने सुपुर्दे खाक किया ? और उनके नाम पर रखे फितरों का क्या हुआ ?

इन बातों का जि़क्र न भी किया जाए तो भी याद किया जाना लाजि़मी है कि नब्बू शाह के बाद उनकी जगह, उनकी तरह, काम करने वाला कोई दूसरा न हुआ। नसीहतें देकर खैरात लेने वाला न हुआ। उनकी तासीर का कोई दूसरा सहरी जगाने वाला न हुआ। बच्चों की पैदाइश पर दुआओं की दरख्वास्त पहुंचाने से लेकर मौत मिट्टी की खबरों को लाने वाले नब्बू शाह तकिएदार आसमान से देख रहे हैं। ज़माना ठहरता कहाँ है ? वक्त और काम रुकते हैं भला ? अब उनका काम लाउड स्पीकर और मोबाईल फोन कर रहे हैं। बच्चों को मदरसे जाने की हिदायतें देते लोग, धागों जैसी पतली सिवईयाँ बनाने वाले हाथ अब नहीं दिखते। वो गए गुज़रे जमाने की बातें हुईं सिवईयें अब फैक्टरियों में बिजली की मशीनों से बनने लगी हैं। अब तो सभी रेडीमेड सेवइयां लेने लगे हैं।

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