घर हमारा, हुकूमत बाई की!
शहरी जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गृहणियाँ बाई के काम से संतुष्ट भी नहीं हैं और उसे छोड़ने का साहस भी नहीं कर पा रही हैं।;
- अजय कुमार बियानी
शहरी जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गृहणियाँ बाई के काम से संतुष्ट भी नहीं हैं और उसे छोड़ने का साहस भी नहीं कर पा रही हैं। शिकायतों की सूची लंबी है। झाड़ू ठीक नहीं लगी, पोछा अधूरा है, बर्तन पर दाग रह गए, गैस के पीछे सफाई नहीं हुई, बाथरूम चमका नहीं। लेकिन इन शिकायतों को व्यक्त करते समय आवाज़ भी धीमी रखनी पड़ती है। कहीं ऐसा न हो कि बाई अगले महीने से किसी और घर में अपनी सेवाएँ देने का निर्णय कर ले।
कभी समय था जब घर की सरकार गृहस्वामिनी मानी जाती थी। उनकी अनुमति के बिना घर में एक गिलास तक इधर से उधर नहीं होता था। लेकिन आधुनिक शहरी सोसायटियों ने पारिवारिक सत्ता संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। आज अनेक घरों में वास्तविक शक्ति न गृहस्वामी के पास है, न गृहस्वामिनी के पास। असली प्रभाव यदि किसी का है तो वह है—कामवाली बाई का।
सुबह का सूरज उगे या न उगे, दूधवाला आए या न आए, अख़बार समय पर पहुँचे या न पहुँचे, इन बातों से अब घर की दिनचर्या उतनी प्रभावित नहीं होती। लेकिन यदि बाई का संदेश आ जाए— 'आज नहीं आऊँगी '—तो पूरे घर में ऐसा वातावरण बन जाता है मानो किसी ने आपातकाल घोषित कर दिया हो।
शहरी जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि गृहणियाँ बाई के काम से संतुष्ट भी नहीं हैं और उसे छोड़ने का साहस भी नहीं कर पा रही हैं। शिकायतों की सूची लंबी है। झाड़ू ठीक नहीं लगी, पोछा अधूरा है, बर्तन पर दाग रह गए, गैस के पीछे सफाई नहीं हुई, बाथरूम चमका नहीं। लेकिन इन शिकायतों को व्यक्त करते समय आवाज़ भी धीमी रखनी पड़ती है। कहीं ऐसा न हो कि बाई अगले महीने से किसी और घर में अपनी सेवाएँ देने का निर्णय कर ले।
एक समय कर्मचारी अपने मालिक को खुश रखने का प्रयास करते थे। अब अनेक सोसायटियों में गृहणियाँ यह सोचकर परेशान रहती हैं कि कहीं उनकी कोई बात बाई को बुरी न लग जाए।
यह एक अनोखा लोकतंत्र है जिसमें मतदाता गृहणी है, लेकिन सरकार बाई की चलती है।
सुबह यदि बाई देर से आए तो तनाव। जल्दी चली जाए तो तनाव। छुट्टी ले ले तो तनाव। और यदि समय पर आकर भी मनमाफिक काम न करे तो दोहरा तनाव।
इस तनाव का प्रभाव केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे परिवार में फैल जाता है।
पति शाम को दफ्तर से लौटकर मासूमियत से पूछ बैठे— 'आज खाने में क्या बना है? '
जवाब मिलता है— 'सुबह से बाई ने दिमाग खराब कर रखा है और आपको खाने की पड़ी है! '
बेचारा पति समझ नहीं पाता कि उसका अपराध क्या था।
बच्चे भी कई बार इस अदृश्य संकट के शिकार हो जाते हैं। उनकी किसी सामान्य माँग का उत्तर असामान्य स्वर में मिलता है। कारण वही—सुबह का अधूरा पोछा और गंदे बर्तन।
विडंबना यह है कि अनेक सोसायटियों में कामवाली बाई का मूल्यांकन किसी बड़े सरकारी विभाग से भी अधिक गंभीरता से किया जाता है। अंतर केवल इतना है कि सरकारी कर्मचारी को नोटिस दिया जा सकता है, लेकिन बाई को नोटिस देने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं।
इधर बाई की भी अपनी कहानी है। वह पाँच-पाँच घरों में काम करती है। हर घर की अलग अपेक्षा, अलग नियम, अलग शिकायत। एक घर में पोछा कम गीला है तो दूसरे में अधिक गीला। कहीं बर्तन पहले चाहिए, कहीं झाड़ू पहले। ऐसे में उसका धैर्य भी परीक्षा से गुजरता है।
यानी दोनों पक्ष असंतुष्ट हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे के बिना काम भी नहीं चला सकते।
यही आधुनिक शहरी जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
कई आवासीय परिसरों में अब सुरक्षा गार्ड, प्रबंध समिति और अध्यक्ष से भी अधिक चर्चा बाई की होती है। लिफ्ट में मिलने वाली अधिकांश वार्ताओं का विषय मौसम नहीं, बल्कि यही होता है— 'आपकी वाली आज आई क्या? '
यदि किसी घर में नई बाई रखी जाए तो पड़ोसियों की जिज्ञासा किसी नई कार की खरीद से भी अधिक होती है।
'काम कैसा करती है?' 'कितना लेती है?' 'छुट्टियाँ ज्यादा तो नहीं करती?' 'हमारे यहाँ भी भेज देना। '
मानो कोई घरेलू कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति की खोज हुई हो।
आज स्थिति यह है कि अनेक घरों में शांति, सौहार्द और पारिवारिक वातावरण सीधे इस प्रश्न से जुड़ गया है—बाई आई या नहीं?
कभी-कभी लगता है कि शहरी भारत की सबसे जटिल सामाजिक संरचना पति-पत्नी, सास-बहू या पड़ोसी नहीं, बल्कि गृहणी और कामवाली बाई का रिश्ता है।
इस रिश्ते में शिकायत भी है, निर्भरता भी। असंतोष भी है, आवश्यकता भी। नाराज़गी भी है और सम्मान भी।
अंतत: निष्कर्ष यही निकलता है—
घर हमारा है, किस्तें हमारी हैं, बिजली का बिल हमारा है, रसोई हमारी है,
लेकिन सुबह का मूड, दोपहर की शांति और शाम का वातावरण...
कई बार बाई की उपस्थिति रजिस्टर पर निर्भर करता है।
और यही आधुनिक शहरी जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य है।