यूपी में गन्ने के खेत कैसे बने तेंदुओं का घर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटे तराई इलाकों में बीते कई महीनों से तेंदुए स्थानीय निवासियों के लिए खतरा बने हैं.;

Update: 2026-09-17 11:51 GMT

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटे तराई इलाकों में बीते कई महीनों से तेंदुए स्थानीय निवासियों के लिए खतरा बने हुए हैं. तेंदुओं के बढ़ते आतंक को कम करने और उन्हें सुरक्षित वातावरण देने की कई कोशिशें की जा रही हैं,

उत्तर भारत के कई हिस्सों में आजकल आए दिन बारिश हो रही है. सूरज ढलते ही पश्चिमी यूपी के कई गांवों में आजकल एक अजीब-सी खामोशी पसर जाती है. हवा से सरसराते गन्ने के पत्तों की हल्की सी आवाज भी स्थानीय निवासियों के दिल की धड़कन बढ़ाने के लिए काफी होती है. बिजनौर,पीलीभीत,मुरादाबाद और आसपास के अन्य इलाकों के लगभग 500 गांवों में इन दिनों जिंदगी एक डर के साये में कट रही है. बीते आठ महीनों में वन विभाग ने अकेले बिजनौर से 50 और मुरादाबाद से 22 तेंदुए पिंजरे में कैद किए हैं.

कुल मिलाकर इस अंतराल में 100 से ज्यादा तेंदुओं के पकड़े जाने के बावजूद खौफ कम नहीं हुआ, क्योंकि हाल के हफ्तों में एक आठ साल के मासूम रवि और खेत में काम कर रही 45 साल की संतोष देवी की जान जा चुकी है. दर्जन भर से ज्यादा लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं.

मुरादाबाद के करीब 50 गांवों के एक लाख लोग खौफ में हैं. ठाकुरद्वारा के एक गांव में रहने वाले उधम सिंह खेतों में मजदूरी कर जीविका चलाते हैं. वह बताते हैं, "बीते एक महीने से यहां पर हालात ज्यादा खराब हो गए हैं. कुछ दिन पहले एक तेंदुआ घर के बाहर से एक कुत्ते को मारकर खा गया. अब खेतों में जाने से डर लगता है, इस चक्कर में रोजी-रोटी भी मुश्किल में आ गई है."

यहां वन विभाग की टीम थर्मल ड्रोन के जरिए तेंदुओं को ट्रैक करने की कोशिश कर रही है. फिलहाल गांवों में मंदिरों-मस्जिदों और सार्वजनिक स्थानों से लगातार मुनादी कराई जा रही है कि किसान अकेले खेत न जाएं, हाथ में लाठी और टॉर्च रखें, झुंड बनाकर बोलचाल करते हुए काम करें.

कोविड के दौरान जन्मे तेंदुओं को मिला नाम 'शुगरकेन लेपर्ड'

गांव वालों के लिए यह कोई जंगल से भटककर आई आफत नहीं है. लोग अब इन्हें ‘शुगरकेन लेपर्ड' कहने लगे हैं. वजह यह है कि इन तेंदुओं ने कभी घना जंगल देखा ही नहीं. इनका जन्म, बचपन और पूरा कुनबा इन्हीं गन्ने के लंबे-चौड़े खेतों में पला-बढ़ा है. रामगंगा नदी के किनारे और 10-12 फीट ऊंचे गन्ने के खेत इनके लिए किसी ऐशगाह से कम नहीं हैं. यहां छिपने की पूरी जगह है और खाने के लिए खेतों में घूमने वाले आवारा मवेशी या सियार, कुत्ते और सुअर जैसे जानवर आसानी से इनका शिकार बन जाते हैं. हालात ये हैं कि गन्ने का खेत एक तरफ किसान की रोजी-रोटी है, वहीं दूसरी तरफ तेंदुए की मांद बन चुका है. ऐसे में जब किसान फसल काटने या निराई करने खेत में कदम रखता है, तो दोनों का आमना-सामना खूनी संघर्ष में बदल जाता है.

गोरखपुर चिड़ियाघर के डिप्टी डायरेक्टर डॉ योगेश कुमार सिंह बताते हैं, "कोविड महामारी के दौरान लोगों ने घर से निकलना बंद कर दिया था और इस दौरान खेतों और फसलों में इंसानी आवाजाही बंद हो गई थी. इसी दौरान तेंदुओं को गांवों की बस्ती तक पहुंचने का रास्ता मिल गया. तराई और जंगल से सटे ऐसे बहुत सारे जिले हैं जहां पर गन्ने की फसल कई किलोमीटर दूर तक फैली होती है. इन्हें शुगरकेन बेल्ट कहा जाता है. इनमें पीलीभीत, मुरादाबाद, नजीबाबाद, बहराइच, लखीमपुर खीरी, बिजनौर आदि जिले शामिल हैं.”

सिर्फ आदमखोर तेंदुए ही पहुंचते हैं जू-रेस्क्यू सेंटर

उत्तर प्रदेश में रेस्क्यू हुए सिर्फ वही तेंदुए अलग-अलग चिड़ियाघरों में या निगरानी में रखे जाते हैं जो इंसानी संघर्ष में शामिल होते हैं. जू में जगह और तेंदुए की स्थिति के आधार पर उन्हें लखनऊ, गोरखपुर, कानपुर और इटावा के चिड़ियाघरों में भेजा जाता है. डॉ. योगेश बताते हैं, "इस साल अब तक 30 से ज्यादा तेंदुए यूपी के अलग-अलग चिड़ियाघरों में भेजे गए हैं. इनमें मैन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट में शामिल तेंदुओं से लेकर उन घायल, वयस्क या शावक तेंदुओं को भी शामिल किया गया है जिन्हें किसी भी स्तर पर चिकित्सकीय देखरेख की जरूरत हो.”

हिम तेंदुओं के संरक्षण में कामयाबी की इबारत लिखता भूटान

कई बार रेस्क्यू के बाद जंगल में छोड़े गए तेंदुए वापस इन्हीं गन्ने के खेतों तक पहुंच जाते हैं. डॉ. सिंह का कहना है कि खेतों में रहने वाले तेंदुए उस जगह से काफी घुले-मिले होते हैं. वे रोजमर्रा इंसानों को नजदीक से देख रहे होते हैं. गन्ने का निचला हिस्सा पीले-भूरे रंग के जैसा होता है. ऐसे में कई बार तेंदुए उसमें केमोफ्लाज की तरह छुप जाते हैं और आसानी से नहीं दिखते. खेतों में काम करते हुए जब लोग तेंदुए के पास पहुंचते हैं तब वह उन पर हमला कर देता है. इन्हीं में से कुछ तेंदुए मैन-ईटर यानी आदमखोर बन जाते हैं.

‘जानवरों के लिए पिंजरा नहीं जंगल बेहतर' है नियम

हालांकि सवाल यह भी है कि क्या इतने तेंदुओं को पिंजरों में कैद करना ही एकमात्र रास्ता है? सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के नियम साफ कहते हैं कि किसी भी वन्यजीव को पिंजरे में बंद करना आखिरी रास्ता होना चाहिए, न कि पहला. कानूनन, चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन की अनुमति के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता. नियम यह भी कहते हैं कि पकड़े गए हर तेंदुए को उम्रभर के लिए कैद नहीं रखा जा सकता. इस बारे में उत्तर प्रदेश की प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) अनुराधा वेमुरी ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब यह जांच हो जाती है कि कि तेंदुआ आदमखोर और बीमार नहीं है, तो उसे माइक्रोचिप लगाकर वापस घने और सुरक्षित जंगलों में छोड़ दिया जाता है. इसके अलावा ओपन एनक्लोजर भी विकल्प है.”

ओपन एनक्लोजर का मतलब जंगल जैसे बोड़े से होता है. ये ऐसे रेस्क्यू सेंटर होते हैं, जहां एक बड़ा एरिया सुनिश्चित करके वहां तेंदुओं को रखा जा सकता है. इस जगह को चेन लिंक और फेंसिंग लगाकर सुरक्षित किया जाता है. इसके अंदर ही 20 या उससे अधिक तेंदुओं को रखा जाता है, उनका भोजन मुहैया करवाया जाता है और एक प्राकृतिक माहौल में उन्हें रखने की कोशिश की जाती है. इन एनक्लोजर्स में इंसानी संघर्ष के बजाय सामान्य तेंदुओं को रखा जाता है.

डेंटल एनालिसिस से पता लगती है तेंदुओं की उम्र

वन विभाग जब भी किसी तेंदुए का रेस्क्यू करता है तो डॉक्टर पकड़े गए तेंदुओं की उम्र और स्थिति जानने के लिए उनके दांतों की जांच (डेंटल एनालिसिस), इनेमल के घिसाव और हड्डियों की बनावट का सहारा ले रहे हैं. इससे ही पता चलता है कि रेस्क्यू किया गया तेंदुआ शावक है, सब-एडल्ट, अडल्ट, प्राइम-एडल्ट या एज्ड (बूढ़ा) तेंदुआ है. इसी प्रक्रिया के तहत मुरादाबाद से पकड़े गए दो तेंदुओं में से एक की पहचान डेढ़-दो साल के शावक (सब-एडल्ट) और दूसरे की वयस्क के रूप में हुई.

डॉ. योगेश ने इस बाबत कहा, "जब हम मेडिकल जांच करते हैं तो उसमें हम एग्रेशन देखते हैं, तेंदुए का व्यवहार जांचते हैं कि क्या जानवर कंफर्टेबल है, फिट है, उसके दांत टूटे हुए हैं, कहीं चोट है आदि. उसके बाद हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि 'एनिमल इज कंप्लीट्ली फिट टू वाइल्ड' यानी वो जंगल में रहने योग्य है या नहीं. अगर जानवर जंगल में रहने योग्य है, तो हम उसको कन्फाइंड करके क्यों रखेंगे?”

तेंदुओं को बचाने के लिए यूपी में बनेगा लेपर्ड सफारी

रोज-रोज के इंसानी-वन्यजीव संघर्ष के डर से निपटने के लिए अब सरकार कागजों से निकलकर जमीन पर कुछ ठोस करने की कोशिश में है. राज्य में लेपर्ड सफारी और आधुनिक रेस्क्यू सेंटर बनाने की तैयारी चल रही है.

इस बारे में अनुराधा वेमुरी ने डीडब्ल्यू को बताया कि पीलीभीत और शाहजहांपुर की सीमा पर स्थित गोपालपुर इलाके में करीब 49 करोड़ रुपये की लागत से एक बड़ा लेपर्ड सफारी प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, जिसकी फाइल केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) के पास गई है. सोच यह है कि पकड़े गए तेंदुओं को चिड़ियाघर की लोहे की सलाखों में कैद करने के बजाय जंगल जैसे बड़े बाड़ों (ओपन एनक्लोजर) में रखा जाए, जहां अस्पताल भी हो और उनकी सही देखभाल भी हो सके.

तेंदुआ सफारी की आवश्यकता लगातार बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष के आंकड़ों से भी साफ होती है. कॉर्बेट लैंडस्केप में तेंदुओं और बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है, जिसके चलते तेंदुए गन्ने के खेतों की ओर बढ़ रहे हैं. वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले बिजनौर जनपद से वर्ष 2023 में 36, 2024 में 31, 2025 में 41 और 2026 में 13 तेंदुए रेस्क्यू किए गए. वहीं, वर्ष 2023 से मार्च 2026 तक मानव-तेंदुआ संघर्ष में कुल 37 लोगों की मौत हुई और 57 लोग गंभीर रूप से घायल हुए. राज्य के चिड़ियाघरों में अब नए तेंदुओं को रखने की क्षमता भी धीरे धीरे कम होती जा रही है, जिसके बाद अब लेपर्ड सफारी के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है.

गोपालपुर का यह वन क्षेत्र वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक रूप से पूरी तरह अनुकूल है. ट्रांसैक्ट, बायोमास और साइन सर्वे के अनुसार, यहां गोमती नदी के अलावा कहमाईया, पीरा, कईया और गुटेल वाला जैसे प्राकृतिक तालाब मौजूद हैं. साथ ही, तेंदुओं के प्राकृतिक भोजन के लिए चीतल, नीलगाय, पाड़ा और जंगली सूअर की संख्या भी काफी है. यहां कांस, कुश, खश, पनहर, मूंज और पटेर जैसी लंबी घासें भी काफी दूर तक फैली नजर आती हैं, जो इन वन्यजीवों को छिपने और विचरण करने का प्राकृतिक माहौल देती हैं. इस सफारी से वन क्षेत्र पर होने वाले अतिक्रमण और अवैध कटान को भी रोकने में वन विभाग सफल हो सकता है.

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