समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर यूपी गांव कैसे बना शिपिंग कारोबार का केंद्र?
उत्तर प्रदेश के जौनपुर का धनियामऊ गांव समुद्र से सैकड़ों किमी दूर है, लेकिन यहां के तमाम लोग शिपिंग कारोबार से जुड़े हैं;
उत्तर प्रदेश के जौनपुर का धनियामऊ गांव समुद्र से सैकड़ों किमी दूर है, लेकिन यहां के तमाम लोग शिपिंग कारोबार से जुड़े हैं. इसकी शुरुआत करीब एक सदी पहले मुंबई गए एक ग्रामीण से हुई और आज गांव के लोग जहाजों और शिपिंग कंपनियो
उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का धनियामऊ गांव समुद्र से काफी दूर है. यहां न कोई समुद्री बंदरगाह है और न ही आस पास का खारे पानी का नामोनिशान. लेकिन गांव की पहचान समुद्र और समुद्री जहाजों के कारोबार से जुड़ गई है.
करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव के सैकड़ों लोग किसी न किसी रूप में शिपिंग कारोबार से जुड़े हैं. कई लोग समुद्री जहाजों पर काम करते हैं, तो कुछ लोग शिपिंग से जुड़ी कंपनियां चलाते हैं. हालांकि डीडब्ल्यू ने स्वतंत्र रूप से इन आंकड़ों की पड़ताल नहीं की है लेकिन बड़ी संख्या में लोग इस कारोबार से जुड़े हैं और कई लोगों के पास बड़ी शिपिंग कंपनियां हैं, इसमें संदेह नहीं है.
और इसी वजह से गांव के लोग इसे गर्व से ‘जहाज वाला गांव' कहते हैं.
मजदूरी करने मुंबई गए थे भोला नाथ मिश्र
लेकिन इस कहानी की असली शुरुआत जहाजों से नहीं, बल्कि करीब एक सदी पहले मुंबई पहुंचे एक ग्रामीण से हुई थी.
धनियामऊ गांव के रहने वाले भोला नाथ मिश्र रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई पहुंचे. उन्होंने मझगांव डॉक में एक साधारण मजदूर के तौर पर काम की शुरुआत की और बाद में गुजरात की एक शिपिंग कंपनी से जुड़ गए.
यहीं उन्होंने जहाजों की दुनिया को करीब से देखा और उसका हुनर सीखा. भोलानाथ मिश्र के दोनों बेटे आज उसी व्यवसाय में लगे हैं और उनके पास न सिर्फ कई जहाज हैं बल्कि गांव और आस-पास के सैकड़ों लोगों के लिए उन्होंने रोजगार और व्यवसाय के नए दरवाजे खोले हैं. भोलानाथ मिश्र के छोटे बेटे प्रेमशंकर मिश्र बताते हैं कि उस दौर में उत्तर भारत के किसी गांव के व्यक्ति के लिए समुद्री कारोबार में पहुंचना अपने आप में असाधारण बात थी.
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डीडब्ल्यू से बातचीत में प्रेमशंकर मिश्र कहते हैं, "हमारे पिताजी 1930 में बॉम्बे आए थे. मझगांव डॉक पर उन्होंने अंग्रेजों की एक कंपनी, जिसका नाम था- पीनू, वहां लोहार का काम शुरू किया. यह काम यहीं पर रहकर सीखा था. यहीं काम के साथ शंकर भगवान के मंदिर में पूजा करते थे. उसके बाद उन्होंने गुजरातियों की एक कंपनी- भारत लाइन कंपनी में काम करना शुरू कर दिया. यहां हमारे पिताजी के अधीन एक हजार लोग काम करते थे. यहीं उन्होंने गांव के कई लोगों को बुलाया और काम दिया. फिर धीरे-धीरे ये सिलसिला चल पड़ा.”
प्रेमशंकर मिश्र बताते हैं कि आज उनके गांव के सैकड़ों लोगों के अलावा कई रिश्तेदार भी सेलिंग कर रहे हैं और डॉलर में कमाई कर रहे हैं. यानी भोला नाथ मिश्र का रोजगार धीरे-धीरे पूरे गांव का पेशा बनने लगा.
प्रेमशंकर मिश्र के मुताबिक, उनके पिता भोलानाथ मिश्र ने साल 1948 में ‘मानकेश्वर मैकेनिकल कंपनी' की स्थापना की थी जो आज भी चल रही है.
एक व्यक्ति का रोजगार कैसे पूरे गांव का नेटवर्क बना
आज धनियामऊ की कहानी को समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने लोग जहाजों पर काम करते हैं. महत्वपूर्ण यह है कि एक व्यक्ति ने अपने गांव के लोगों को अपने साथ जोड़ा.
मुंबई जाने वाले युवाओं को काम मिला, काम के साथ कौशल मिला और फिर उनमें से कुछ आगे चलकर कारोबार में आए. इस तरह रोजगार का एक नेटवर्क तैयार हुआ. यही वह सिलसिला है जिसने धनियामऊ को दूसरे गांवों से अलग बना दिया.
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प्रेम शंकर मिश्र बताते हैं, "नब्बे के दशक यानी 1995 तक शिपिंग सेक्टर में उत्तर भारत के लोगों की उपस्थिति लगभग नगण्य थी, लेकिन आज इस क्षेत्र में यहां के लोगों का दबदबा और मजबूत पकड़ है. वाराणसी और आस-पास के इलाकों में कई निजी मैरीटाइम ट्रेनिंग सेंटर खुल चुके हैं, जहां से छह महीने का विशेष प्रशिक्षण लेकर युवा सीधे अंतरराष्ट्रीय और घरेलू शिपिंग कंपनियों में रोजगार पा रहे हैं. मेरी ही कंपनी में जौनपुर के अलावा गोरखपुर और देवरिया जिलों के युवा भी बड़ी संख्या में काम करते हैं.”
‘गांव में समुद्र नहीं, लेकिन जहाज बहुत हैं'
स्थानीय लोगों के मुताबिक, धनियामऊ गांव के लगभग हर घर का सदस्य पानी के जहाजों की मरम्मत, निर्माण और संचालन के काम से जुड़ा है. गांव के कई लोग ऐसे हैं जिनके पास अपने जहाज हैं और गांव के लोगों के पास सौ से ज्यादा शिपिंग कंपनियां हैं. पड़ोस के गांव के रहने वाले धर्मेंद्र हंसते हुए बताते हैं कि धनियामऊ गांव में समुद्र नहीं है लेकिन जहाज बहुत हैं.
वहीं, प्रेमशंकर मिश्र से बातचीत में इस पूरी कहानी की एक अहम बात सामने आती है. धनियामऊ के लोगों का अपने गांव से रिश्ता आज भी मजबूत है.
रोजगार और कारोबार के कारण बहुत से परिवार मुंबई और दूसरे शहरों में रहते हैं लेकिन त्योहार, शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजन और गांव के महत्वपूर्ण मौकों पर उनका वापस आना जारी रहता है. यानी आर्थिक सफलता ने गांव से उनका रिश्ता खत्म नहीं किया, बल्कि कई मामलों में उसी आर्थिक सफलता ने गांव को और मजबूत किया.
स्थानीय पत्रकार आनंद देव बताते हैं कि शिपिंग से हुई आर्थिक तरक्की का असर यहां की अगली पीढ़ी पर भी पड़ा. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "धनियामऊ गांव के युवा सिर्फ जहाजों पर काम करने तक सीमित नहीं हैं बल्कि इंजीनियरिंग और दूसरी उच्च शिक्षा लेने वाले युवा भी हैं जो देश और विदेश की कंपनियों में काम कर रहे हैं. शिक्षा के क्षेत्र में भी यह गांव काफी आगे है, जहां प्राइमरी स्कूलों से लेकर डिग्री कॉलेज तक की बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध हैं.”
गांव में पासपोर्ट की अहमियत वोटर आईडी जितनी
यही वजह है कि धनियामऊ की कहानी का शायद सबसे दिलचस्प हिस्सा पासपोर्ट है. गांव के प्रधान लालचंद प्रसाद के मुताबिक, यहां एक हजार से ज्यादा लोगों के पास पासपोर्ट हैं और कई युवा वोटर आईडी से पहले पासपोर्ट बनवाने को प्राथमिकता देते हैं.
ग्राम प्रधान लालचंद प्रसाद के मुताबिक, "आज धनियामऊ के लोग अलग-अलग देशों में जाते हैं. कोई जहाज पर इंजीनियर है, कोई तकनीकी कर्मचारी, कोई क्रू मेंबर और कोई कारोबार संभाल रहा है. लेकिन गांव की जड़ों से लोग आज भी जुड़े हैं. त्योहार और अन्य मौकों पर अक्सर बाहर रहने वाले लोग गांव आते हैं और यहां की समृद्धि में योगदान देते हैं.”
न सिर्फ धनियामऊ बल्कि जौनपुर के आस पास के दूसरे गांवों में भी बड़ी संख्या में युवा शिपिंग सेक्टर में पहुंचे हैं. स्थानीय पत्रकार आनंद देव बताते हैं कि तिलवारी गांव में भी बड़ी संख्या में लोग शिपिंग उद्योग से जुड़े हैं.
बड़ी हवेलियां लेकिन रहने वाला कोई नहीं
हालांकि इसका एक दूसरा पहलू भी है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, गांव में कोई भी परिवार ऐसा नहीं है जो आर्थिक तंगी से जूझ रहा हो. गांव के ही रहने वाले समाजसेवी अमित मिश्र बताते हैं कि गांव की संपन्नता की गवाही बड़े अहातों में करोड़ों रुपये की लागत से बने भव्य मकान देते हैं.
अमित मिश्र के मुताबिक, "युवाओं के लिए बारहवीं या ग्रेजुएशन के बाद पहली पसंद मर्चेंट नेवी और खुद का बिजनेस ही होता है. कारोबार के सिलसिले में ज्यादातर परिवार अब मुंबई और तटीय शहरों में बस चुके हैं इसीलिए गांव के कई आलीशान मकान खाली रहते हैं. लेकिन अपनी जड़ों से उनका जुड़ाव आज भी अटूट है. धनियामऊ की ऐतिहासिक रामलीला और गांव के सामाजिक आयोजनों में ये परिवार आज भी लाखों रुपये का चंदा देकर अपनी मिट्टी का कर्ज चुकाते हैं. मेरा पूरा परिवार भी शिपिंग व्यवसाय से जुड़ा है लेकिन मैं गांव में रहता हूं.”
एक पीढ़ी ने समुद्री जहाजों पर काम किया, दूसरी ने कंपनियां बनाईं और तीसरी पीढ़ी शिक्षा और दूसरे पेशों की तरफ बढ़ी.