आजमगढ़: उत्तर प्रदेश की राजनीति में यदि सादगी, ईमानदारी और जनसेवा की बात की जाए तो समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आलम बदी (Alam Badi) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रदेश के सबसे उम्रदराज विधायकों में शामिल रहे आलम बदी ने यह साबित किया कि राजनीति में सफलता केवल संसाधनों और बड़े चुनावी अभियानों से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और साफ छवि से भी हासिल की जा सकती है। सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और पांच बार विधायक बनकर एक अलग पहचान बनाई। पांच बार के विधायक रहे आलम बदी का बुधवार देर रात निधन हो गया। वो लंबी बिमारी के बाद 92 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए।
60 वर्ष की उम्र में शुरू किया राजनीतिक सफर
आलम बदी ने सक्रिय राजनीति में अपेक्षाकृत देर से प्रवेश किया। सिंचाई विभाग में लंबी सरकारी सेवा पूरी करने के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थामा। पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में उन्हें आजमगढ़ की निजामाबाद विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। अपने पहले ही चुनाव में उन्होंने जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया। इसके बाद 2002 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी और लगातार दूसरी बार विधायक बने।
हार के बाद की लगातार तीन जीत
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की लहर के बीच आलम बदी को निजामाबाद सीट पर बीएसपी के अंगद यादव से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि यह हार उनके राजनीतिक सफर की अंतिम मंजिल नहीं बनी। उन्होंने 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में लगातार जीत दर्ज कर शानदार वापसी की और कुल पांच बार विधायक बनने का गौरव हासिल किया। उनकी लगातार सफलताओं का श्रेय उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली और जनता से सीधे जुड़े रहने को दिया जाता है।
गोरखपुर में हुई शिक्षा, इंजीनियरिंग का लिया प्रशिक्षण
आलम बदी का जन्म 16 मार्च 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गोरखपुर के बक्शीपुर स्थित इस्लामिया इंटर कॉलेज में हुई। उनके पिता वदीउज्जमा आजमी इसी विद्यालय में गेम्स शिक्षक थे। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया और सिंचाई विभाग में नौकरी शुरू की। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दीं और सेवानिवृत्ति के बाद सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए।
76 साल बाद मिला हाईस्कूल का प्रमाणपत्र
आलम बदी के जीवन का एक दिलचस्प प्रसंग इस वर्ष सामने आया, जब उन्होंने अपने हाईस्कूल का प्रमाणपत्र लगभग 76 वर्ष बाद प्राप्त किया। उन्होंने 1950 में हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की थी, लेकिन किसी कारणवश उस समय प्रमाणपत्र नहीं ले सके थे। इस वर्ष अप्रैल में वे अपने पुराने विद्यालय पहुंचे, जहां एक विशेष समारोह में उन्हें औपचारिक रूप से उनका प्रमाणपत्र सौंपा गया। यह घटना उनके जीवन की यादगार उपलब्धियों में शामिल हो गई।
मंत्री बनने के प्रस्ताव भी ठुकराए
राजनीतिक जीवन में उनकी ईमानदार और निष्पक्ष छवि के कारण उन्हें कई बार मंत्री बनने का प्रस्ताव भी मिला। समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बाद में पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव दोनों ने उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। हालांकि आलम बदी ने यह कहते हुए प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया कि सरकार में युवाओं को अधिक अवसर मिलना चाहिए। उनका मानना था कि अनुभव के साथ नई पीढ़ी को नेतृत्व की जिम्मेदारी भी मिलनी चाहिए।
विधायक होकर भी नहीं अपनाया वीआईपी कल्चर
पांच बार विधायक रहने के बावजूद आलम बदी ने कभी भी भव्य जीवनशैली नहीं अपनाई। बताया जाता है कि वे अक्सर रोडवेज बसों से यात्रा करते थे और लखनऊ में विधानसभा जाने के लिए अपनी स्कूटी का इस्तेमाल करते थे। उन्होंने कभी निजी सुरक्षा या वीआईपी काफिले की मांग नहीं की। यही कारण था कि आम लोगों के बीच उनकी पहचान एक सहज और सुलभ जनप्रतिनिधि के रूप में बनी रही।
कम खर्च में चुनाव जीतने वाले नेता
आज जब चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च होने की चर्चा होती है, वहीं आलम बदी सीमित संसाधनों में चुनाव लड़ने के लिए जाने जाते थे। बताया जाता है कि वे एक विधानसभा चुनाव में लगभग 2 से 3 लाख रुपये के खर्च में ही प्रचार अभियान पूरा कर लेते थे। उनकी सादगी और विश्वसनीयता इतनी मजबूत थी कि सीमित संसाधनों के बावजूद जनता ने उन्हें बार-बार अपना प्रतिनिधि चुना। पांच बार विधायक रहने के बाद भी उनकी कुल चल-अचल संपत्ति लगभग 40 लाख रुपये के आसपास बताई जाती थी और उनके नाम पर एक कार भी थी।
सादगी और नैतिक राजनीति की विरासत
90 वर्ष से अधिक आयु में भी आलम बदी की सक्रियता और जनसंपर्क राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने रहे। समाजवादी पार्टी के भीतर उन्हें एक ऐसे वरिष्ठ नेता के रूप में देखा जाता था, जिनकी ईमानदारी और नैतिक राजनीति पर सभी को भरोसा था। आजमगढ़ में जब भी पार्टी को किसी सर्वमान्य और विश्वसनीय चेहरे की आवश्यकता होती, आलम बदी का नाम सबसे पहले सामने आता था। उनका राजनीतिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि जनविश्वास, सादगी और सेवा की भावना के बल पर भी लंबी और सम्मानजनक राजनीतिक यात्रा तय की जा सकती है