अब गुजरात में न्याय की धज्जियां उड़ाता बुलडोजर राज
दुनिया भर में निर्माण कार्यों के लिए बुलडोजरों का उपयोग किया जाता है लेकिन 'नए भारत' में बड़े पैमाने पर अपराधियों, दंगाइयों या माफिया से जुड़े कहे जाने वाले लोगों के घरों और संपत्तियों को नष्ट करने के लिए विनाश के एक उपकरण के रूप में उनका उपयोग किया जा रहा है
- डॉ.इंदिरा हिरवे व डॉ.नेहा शाह
बुलडोजरों की मदद से तोड़फोड़ 2023 में शुरू हुई थी पर वर्ष 2024 में गुजरात में बहुत अधिक कार्रवाइयां देखी गईं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को 'दादा' के नाम से जाना जाता है पर उनके शासन काल में बुलडोजर राज को 'दादा का बुलडोजर' कहा जाने लगा है। गुजरात में बुलडोजरों का मुख्य फोकस सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण हटाने पर रहा है।
दुनिया भर में निर्माण कार्यों के लिए बुलडोजरों का उपयोग किया जाता है लेकिन 'नए भारत' में बड़े पैमाने पर अपराधियों, दंगाइयों या माफिया से जुड़े कहे जाने वाले लोगों के घरों और संपत्तियों को नष्ट करने के लिए विनाश के एक उपकरण के रूप में उनका उपयोग किया जा रहा है। ज्यादातर मामलों में लक्षित गरीब लोग होते हैं उनमें से कई अल्पसंख्यक समूहों से होते हैं और इस तरह बुलडोजर एक नए राजनीतिक उपकरण में बदल जाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने तत्काल न्याय के लिए एक असाधारण उपकरण के रूप में बुलडोजरों का उपयोग किया। इस प्रथा को अब प्रचलित किया जा रहा है। अन्य राज्य भी इसका अनुसरण कर रहे हैं।
ताजा मामला गुजरात सरकार का है जिसने पहले से ही झुग्गी उन्मूलन के लिए कार्यक्रम शुरू कर दिए हैं। ये स्लमों के पुनर्वास और पुनर्विकास हेतु विनियमन- 2010 अधिनियम के रूप में ('गुजरात स्लम पुनर्वास नीति- पीपीपी- 2013ज् [झुग्गीवासियों के पक्के घरों में पुनर्वास के लिए] और 'गुजरात किफायती आवास नीति- 2014' ('शहरी गुजरात को झुग्गी मुक्त बनाने') आए थे जिसमें गुजरात राज्य में स्लम क्षेत्रों के सुधार तथा उनके विकास का प्रावधान है। ये सभी गुजरात सरकार और अहमदाबाद नगर निगम द्वारा घोषित आधिकारिक नीतियां हैं।
अतिक्रमण के खिलाफ़ उठाए गए कदमों की एक श्रृंखला में हाल के दिनों में दो प्रमुख अभियानों में बुलडोजरों का उपयोग किया गया है। अप्रैल और मई 2025 में अहमदाबाद में, विशेष रूप से चंदोला झील क्षेत्र में घर तोड़े गए। अहमदाबाद शहर के दक्षिणी भाग में स्थित चंदोला झील एक अर्ध-सूखे झील का क्षेत्र है जो लगभग 109 हेक्टेयर भूमि को कवर करता है। यह आधिकारिक तौर पर अहमदाबाद नगर निगम के अंतर्गत आता है। झील पर अतिक्रमण कुछ किसानों द्वारा छोटे पैमाने पर फसल की खेती के साथ शुरू हुआ।
गरीब परिवारों ने रहने के लिए धीरे-धीरे झील के किनारों पर कब्जा करना शुरू कर दिया और समय के साथ व्यापक क्षेत्र पर कब्जा किया गया। यहां के अधिकांश परिवार छोटे-मोटे व्यापार और विनिर्माण कार्यों में लगे हुए थे जो निर्माण कार्य, घरेलू काम, सब्जियां बेचने और अन्य दिहाड़ी काम करने वाले मजदूर थे। झील के एक छोटे से हिस्से पर, जिसे बंगला-वास के नाम से जाना जाता है, बांग्लादेशी प्रवासियों का कब्जा था। समय के साथ इस क्षेत्र ने छोटे स्थानीय क्षेत्र की व्यावसायिक गतिविधियों के एक पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित किया। कुछ लोगों ने कानून की सीमाओं को तोड़ा और स्थानीय गिरोहों को जन्म दिया।
अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) द्वारा शुरू किए गए इस तोड़फोड़ से 7,000 से अधिक संपत्तियां प्रभावित हुई हैं जो ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के स्वामित्व वाली हैं। कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए हमले के चार दिन बाद तोड़फोड़ की कार्रवाई हुई। स्थानीय रिपोर्टों में कहा गया है कि अधिकारियों ने चंदोला के निवासियों को बिना दस्तावेजों वाले बांग्लादेशी अप्रवासियों के संदेह में हिरासत में लेना शुरू किया।
बुलडोजरों की मदद से तोड़फोड़ 2023 में शुरू हुई थी पर वर्ष 2024 में गुजरात में बहुत अधिक कार्रवाइयां देखी गईं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को 'दादा' के नाम से जाना जाता है पर उनके शासन काल में बुलडोजर राज को 'दादा का बुलडोजर' कहा जाने लगा है। गुजरात में बुलडोजरों का मुख्य फोकस सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण हटाने पर रहा है।
राज्य सरकार ने 2024 के अंत तक पूरे गुजरात में कई बार बुलडोजरों का प्रयोग किया। प्रमुख घटनाएं अहमदाबाद शहर, मेहसाणा, कच्छ, जूनागढ़, द्वारका, वडोदरा, सूरत, नवसारी और अन्य शहरों में हुई हैं। जिन क्षेत्रों में ये कार्रवाइयां की गईं वे ज्यादातर गरीब, वंचित समूहों की बस्तियां हैं जिनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। इन लोगों पर अवैध गतिविधियों और स्थानीय अपराधों में शामिल होने का आरोप है। जैसा कि कार्रवाई स्थलों से दिखाई पड़ता है कि बुलडोजर का कहर गरीब क्षेत्रों में हुआ और उसके दायरे में कभी भी पड़ोस के संपन्न इलाके नहीं थे।
2022 में एक स्थानीय पार्षद ने एक मानवाधिकार वकील के साथ मिलकर एएमसी से झुग्गी पुनर्वास योजना के तहत यहां रहने वाले परिवारों के पुनर्वास पर विचार करने का अनुरोध किया पर एएमसी ने इस विषय को इस आधार पर आगे नहीं बढ़ाया कि उस समय उसके पास कोई योजना नहीं थी। यह बात पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल), अहमदाबाद के मानवाधिकार वकील आनंदवर्धन याग्निक ने बताई। याग्निक अहमदाबाद तोड़-फोड़ सहित मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित कानूनी मामलों में शामिल रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से हाशिए के समुदायों को लक्षित करने वाले विध्वंस के खिलाफ यह तर्क देते हुए कहा है कि ऐसी तोड़-फोड़ अक्सर उचित कानूनी प्रक्रियाओं के बिना किए जाते हैं जिससे विस्थापन और कठिन होता है।
पहलगाम की घटना के बाद गुजरात नेतृत्व ने कथित तौर पर चंदोला क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित किया और एएमसी की मदद से कार्रवाई शुरू कर दी। 26 अप्रैल को तड़के 3 बजे एक टीम तलाशी अभियान के लिए आई। उसने 890 व्यक्तियों की पहचान की और उन्हें पुलिस सुरक्षा में अंधेरी रात में 4 किमी से अधिक दूर स्थित कांकरिया फुटबॉल मैदान ले गई। उन्हें वहां तीन दिनों तक रखा गया। अधिकारियों ने अंतत: पाया कि इनमें से केवल 150 व्यक्ति (16-17 प्रतिशत) अवैध रूप से बांग्लादेशी प्रवासी थे। 29 अप्रैल को 2,000 नगरपालिका कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों की टीम, एक दर्जन से अधिक बुलडोजर, लगभग 200 ट्रकों के साथ चंदोला झील पहुंची और उसने निवासियों के घरों, दुकानों और अन्य संपत्तियों को ढहाना शुरू कर दिया। लगभग 3,000 महिलाओं, बच्चों एवं पुरुषों को 44 डिग्री सेल्सियस के तापमान में भीषण गर्मी में, खुले में रहने को मजबूर कर दिया। पीयूसीएल इस मुद्दे पर एएमसी के खिलाफ मुकदमा लड़ रहा है और उसकी रिपोर्टों में ये विवरण दिया गया है।
कार्रवाई करने वालों को इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि विस्थापित कहां जाएंगे और कहां रहेंगे। अगले दिन राष्ट्रीय समाचार पत्रों में यह खबर छपी कि सरकार ने चंदोला झील से अवैध रूप से बसे बांग्लादेशियों को सफलतापूर्वक बाहर निकाल दिया है लेकिन उसमें यह उल्लेख नहीं था कि उनमें से अधिकांश अप्रवासी नहीं बल्कि भारतीय नागरिक थे।
चंदोला झील स्थल पर पूरी कवायद कई सवाल उठाती है, जिनमें सबसे उल्लेखनीय यह है कि झुग्गी कॉलोनी पिछले कुछ वर्षों में अधिकारियों की जानकारी में ही बढ़ी है। इसके अलावा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित बेदख़ली के नियमों का पालन नहीं किया- जैसे कि बेदख़ली से पहले न्यूनतम अवधि की उचित नोटिस देना। लंबे समय से रह रहे लोगों को तत्काल हटाने की क्या जरूरत थी? इसके अतिरिक्त यदि अहमदाबाद के अंतर्गत आने वाले इस क्षेत्र का इतने वर्षों में पुनर्विकास नहीं किया जा सका तो मलिन बस्ती पुनर्वास नीति का क्या कार्य है? पहलगाम घटना के मद्देनजर हुई यह कार्रवाई इसे झुग्गी-झोपड़ी हटाने की गतिविधि से अधिक कुछ संकेत देने के लिए एक खतरनाक विध्वंस का रंग देती है। ऐसा लगता है कि यह उन क्षेत्रों को अपना निशाना बना रहा है जिसमें भारतीयों और आप्रवासियों को एक साथ रखा जाता है और सभी गरीबों के- चाहे वह भारतीय हो या नहीं, अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता है।
निश्चित रूप से बिना वैध दस्तावेज़ों के आव्रजन का मुद्दा एक वैध चिंता का विषय है पर इससे निपटना संवैधानिक मूल्यों और मानवीय गरिमा के साथ संरेखित होना चाहिए। इसमें गुजरात सरकार साफ तौर पर फेल हो गई है।
(डॉ. इंदिरा हिरवे अर्थशास्त्र की प्रोफेसर व डॉ.नेहा शाह एसोसिएट प्रोफेसर हैं)