मोदी को आ रही हैं आत्मा की आवाजें, लोगों की नहीं
शरीर मिथ्या है आत्मा अमर है! इसलिए पूरे देश से निकल रहीं एलपीजी, तेल की किल्लत की आवाजें सुनाई नहीं दे रहीं
- शकील अख्तर
बंगाल में दांव ममता का भी नहीं मोदी का लगा है। हार और जीत उन पर असर डालेगी। वहां ममता की वापसी मतलब मोदी की कमजोरी पर मोहर। विपक्ष का दिल्ली का रास्ता आसान। यह बात लेफ्ट को भी समझना चाहिए। इस समय बंगाल उसकी और कांग्रेस की प्रतिष्ठा से नहीं जुड़ा। बंगाल केवल मोदी के वापस ताकतवर होने या उनका जादू खतम होने का चुनाव है। जीत कर ममता वहीं की वहीं रहेंगी।
शरीर मिथ्या है आत्मा अमर है! इसलिए पूरे देश से निकल रहीं एलपीजी, तेल की किल्लत की आवाजें सुनाई नहीं दे रहीं। मगर बंगाल की आत्मा की आवाज •ारूर सुनाई दे रही है।
और जब प्रधानमंत्री मोदी ने उसे अच्छी तरह सुन लिया और उसका खूब प्रचार कर दिया कि बंगाल बदलाव चाहता है तो चुनाव आयोग ने वहां सहित पांच राज्यों में चुनाव का अनाउंस कर दिया।
सारी समस्याएं इस समय बंगाल में हैं। यहां तक कि वहां की सरकार भी अपराधी चला रहे हैं। मगर कोई यह नहीं पूछ सकता कि केन्द्र की सरकार कौन चला रहा है? अमेरिका!
सब कुछ तो उसके आदेश अनुसार हो रहा है। रुस से तेल खरीदना बंद करो। बंद हो गया। 30 दिन के लिए खरीद सकते हो खरीदने लगे। लेकिन यह सब किसी को दिखाई नहीं दे रहा है। ठीक कोविड की तरह। लोग मर रहे हैं। आक्सीजन सिलेंडर नहीं हैं, दवा नहीं है, अस्पताल में बेड नहीं है। और मर जाएं तो शमशान नहीं। लाशें पुल से नीचे फेंक दी गईं। गंगा किनारे रेत में गाड़ दी गईं। मगर मोदी मोदी की आवाजों में कोई कमी नहीं आई। यहां तक कह दिया कि जो मर रहे हैं वे सीधे स्वर्ग जाएंगे।
नफरत का नशा ऐसा ही होता है। पहले नोटबंदी में देखा। पूरा देश परेशान हो गया। फिर कोविड में जिन्दगी और मौत के बीच कोई फर्क नहीं रह गया। और अब रसोई गैस की कमी के दौरान। जनता की परेशानियों से कोई मतलब नहीं। उसकी आवाज पहले तो निकलती ही नहीं है और जो थोड़ी बहुत आहें कराहें आती हैं वह सुनने के बदले जहां अपनी सरकारें नहीं हैं वहां की आत्मा की आवाजें सुन रहे हैं।
नफरत के नशे का यह आखिरी इम्तहान इस बार बंगाल में होगा। अगर यहां मोदी सफल नहीं हुए तो समझ लीजिए देश भर से नफरत का नशा टूटना शुरू हो गया है। पांच राज्यों में चुनाव है। मगर बीजेपी को सबसे ज्यादा उम्मीद बंगाल में है। विपक्ष शासित राज्यों में केरल और तमिलनाडु में कोई संभावना नहीं। यह दोनों राज्य एक बात और साबित करते हैं कि दक्षिण के लोग नफरत से कितने दूर हैं। हम क्यों नफरत में जी और मर रहे हैं यह दक्षिण के राज्यों को देखकर जरा सोचना चाहिए।
बंगाल में प्रधानमंत्री को जो जो कहना था सब कह लिया। उन्हें बातों से ही भरोसा है। आखिर बातों के दम पर ही वे 12 सालों से देश में शासन कर रहे हैं। जहां चुनाव होते हैं वे बातों का तूमार बांध देते हैं। चुनाव के बाद न उन्हें बिहार याद है न दिल्ली, कोई प्रदेश नहीं। जिसको मन चाहा मुख्यमंत्री बनाया। हटाया जैसे बिहार में हटा रहे हैं, मध्यप्रदेश से शिवराज को हटाया। कोई पूछने वाला नहीं।
प्रधानमंत्री को दो बातों पर भरोसा है। एक हिन्दू-मुसलमान का जो जहर उन्होंने फैलाया है उससे उन्हें लगता है कि कुछ भी करें इस जहर के नशे में डूबी जनता अब कुछ भी देखने-समझने काबिल नहीं रही। उसे काल्पनिक डर दिखाओ वह उस डर में जीते हुए मोदी ही बचाएंगे की सोच में उनका समर्थन करती रहेगी।
दूसरी बात उन्हें खासतौर से बंगाल के संदर्भ में यह लगता है कि वहां टीएमसी के खिलाफ लेफ्ट और कांग्रेस के भी होने से उन्हें मदद मिलेगी। पता नहीं लेफ्ट और कांग्रेस क्या सोचते हैं मगर यह बात सही है कि अगर बंगाल में ममता हार गईं तो उनके लिए दिल्ली और दूर हो जाएगी।
बंगाल का चुनाव ममता के अस्तित्व के लिए नहीं है। ममता बनी रहेंगी तो देश में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ जाएगा। लेकिन अगर ममता हार गईं तो मोदी फिर से ताकतवर हो जाएंगे। एक तरह से पुनर्जन्म हो जाएगा।
मोदी इस समय बहुत कमजोर हैं। अमेरिका के सामने सरेंडर तो राहुल गांधी बहुत दिनों से कह रहे थे। आपरेशन सिंदूर बीच में रोकने के समय से ही। मगर अब जब अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के कारण देश में एलपीजी और तेल की समस्या आई तो लोगों की समझ में राहुल गांधी की बातें आने लगीं। राहुल गांधी ने कहा था बहुत बड़ा तूफान आने वाला है वह आ गया। असर सीधा मध्यम वर्ग पर है। और वह अपनी सुविधा के लिए कभी भी किसी को भी छोड़ सकता है।
मध्यम वर्ग ने ही अन्ना हजारे का साथ देकर मोदी को लाया था और अब सारी समस्याएं उसी के सिर पर गिर रही हैं। गरीब लकड़ी जलाकर रोटी बना ले रहा है। मगर मिडिल क्लास के फ्लैट में लकड़ी कोयला नहीं जल सकता। उसे एलपीजी चाहिए।
मोदी को इसलिए ईरान के राष्ट्रपति से बात करना पड़ी। उन्होंने ईरान पर हमले की निंदा नहीं की। सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की जिस तरह ट्रम्प ने हत्या करवाई और उसकी खुशी मनाई उस पर एक शब्द नहीं बोला। शोक तक व्यक्त नहीं किया। नए सुप्रीम लीडर चुने गए उसकी बधाई नहीं। जैसा अमेरिका ने कहा मोदी जी ने मान लिया। मगर अमेरिका गैस नहीं दिला पाया। हार्मुज स्ट्रेट जलडमरू मध्य से भारतीय जहाज नहीं निकलवा पाया। भारतीय मीडिया ने जरूर कोशिश की। खबरें चला दीं। मगर उससे जहाज नहीं चले। प्रधानमंत्री को खुद बात करना पड़ी।
ईरान से ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। मगर मुस्लिम के खिलाफ माहौल बनाने के चक्कर में वहां से संबंध ही तोड़ लिए। चंद भक्त और पुलिस वाले खुश हो गए। संभल के एक पुलिस अधिकारी यह कहते सुने गए कि ईरान की बात करने पर मैं यह कर दूंगा, वह कर दूंगा। मगर प्रधानमंत्री ने बात कर ली। अब क्या करेंगे?
प्रधानमंत्री भक्तों का दिल तोड़ रहे हैं। अभी ईरान से पहले यूजीसी मामले में भक्त बहुत भड़के हुए थे। अभी भी हैं। प्रधानमंत्री मोदी सहित पूरी भाजपा के लिए वह गालियां इस्तेमाल कर रहे हैं जो उन्हें कांग्रेस, दलित, ओबीसी, महिला, मुस्लिम के लिए सिखाई गईं थी। आप हिंसा, क्रूरता, नफरत, गालियां सिखाओ और सोचो कि वे आप तक नहीं आएंगी तो ऐसा नहीं हो सकता।
मोदी चारों तरफ से फंसे हुए हैं। एपस्टीन फाइल से लेकर अडानी पर अमेरिका में हुए क्रिमिनल केस तक। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बहुत आक्रामक हैं। प्रधानमंत्री लोकसभा में नहीं आ रहे। राहुल कह रहे हैं आएंगे भी नहीं। उन पर जार्ज सौरेस से पैसे लेने के आरोप बीजेपी लगाती रहती है। इस बार राहुल वे डाक्यूमेंट ले आए हैं कि मोदी के मंत्री हरदीप पुरी की बेटी को सौरेस से कितना पैसा मिला। सरकार कमजोर हो रही है। राहुल को अंदर से खबरें मिलना शुरू हो गईं हैं। यह इकबाल के खत्म होने का संकेत होता है।
अब इससे बचने का वापसी का मोदी के पास एक ही रास्ता है। अपनी पार्टी, प्रशासन पूरी व्यवस्था को यह बताना कि जनता पर उनका जादू अभी भी बरकरार है। बंगाल में इसलिए उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी है। ममता कांग्रेस का विरोध करती हैं इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या इस समय कांग्रेस को भी ममता का उतना ही विरोध करना चाहिए? इस समय ममता को एक आने नुकसान पहुंचाने का मतलब है मोदी को 16 आने फायदा पहुंचाना। पुराना मुहावरा है आने पाई वाला मगर जब लकड़ी और कोयले के पुराने दिन वापस आ गए तो पुराने मुहावरों में भी कोई बुराई नहीं है।
बंगाल में दांव ममता का भी नहीं मोदी का लगा है। हार और जीत उन पर असर डालेगी। वहां ममता की वापसी मतलब मोदी की कमजोरी पर मोहर। विपक्ष का दिल्ली का रास्ता आसान। यह बात लेफ्ट को भी समझना चाहिए। इस समय बंगाल उसकी और कांग्रेस की प्रतिष्ठा से नहीं जुड़ा। बंगाल केवल मोदी के वापस ताकतवर होने या उनका जादू खतम होने का चुनाव है। जीत कर ममता वहीं की वहीं रहेंगी। लेकिन अगर मोदी जीत गए तो ममता तो छोड़िए कांग्रेस लेफ्ट के लिए बना बनाया माहौल फिर खराब हो जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)