ओमप्रकाश वाल्मीकि का काव्य-संसार : हाशिए के समाज का उद्घोष
भारतीय साहित्य की लंबी परंपरा में दलित साहित्य का उदय एक साहित्यिक घटना के रूप में सदियों की सामाजिक-राजनैतिक चुप्पी को तोड़ने वाली एक महान क्रांति है
- अजय चौधरी
भारतीय साहित्य की लंबी परंपरा में दलित साहित्य का उदय एक साहित्यिक घटना के रूप में सदियों की सामाजिक-राजनैतिक चुप्पी को तोड़ने वाली एक महान क्रांति है। दलित साहित्य आज हाशिए के समाज के दु:ख, पीड़ा, उत्पीड़न, शोषण और अमानवीय अत्याचार को शब्दबद्ध करने में सक्षम हो गया है। यहाँ तक पहुँचने में इस समाज के पूर्ववर्ती साहित्यकारों को कड़े विरोधों और तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद, दलित समाज के साहित्यकारों ने जैसे-तैसे अपनी रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाया। जब यह साहित्य पाठकों तक पहुँचा, तो मुख्यधारा के साहित्यकारों ने इसे 'सौन्दर्यशास्त्र' के आधार पर घेरने की साजिश शुरू की। कभी इसे 'सहानुभूति' और 'स्वानुभूति' के दायरे में बाँधकर इसकी आवाज़ को दबाने की कोशिश की गई, तो कभी भाषा के आधार पर अभद्र कहा गया। इन विषम परिस्थितियों में भी ओमप्रकाश वाल्मीकि ने सृजन का साहस नहीं छोड़ा। उनके इसी साहस और कटु यथार्थ का परिणाम आज हम 'चक्रव्यूह टूटेगा' में देख सकते हैं।
यह काव्य संग्रह संख्यात्मक रूप से भले ही संक्षिप्त हो, परंतु इसकी संवेदना का धरातल व्यापक और मारक है। यह संग्रह भारतीय साहित्य की उन चुप्पियों को तोड़ने वाली सामाजिक-राजनैतिक क्रांति का साहित्यिक रूप है, जो सदियों से मौन रखे गए, जो बहिष्कृत और उपेक्षित जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करता है।
इस महत्वपूर्ण साहित्य को विस्मृति के गर्त में जाने से बचाने और पाठकों तक पहुँचाने का संपूर्ण श्रेय डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि के अथक और जतनपूर्ण प्रयासों को जाता है। यदि वे अपनी अडिग इच्छाशक्ति से इन असंकलित रचनाओं को सहेजते नहीं, तो हिन्दी जगत ओमप्रकाश वाल्मीकि की उन वैचारिक ऊँचाइयों वाली कविताओं से हमेशा के लिए वंचित रह जाता, जो उनके जीवनकाल के प्रमुख संग्रहों में स्थान नहीं पा सकी थीं।
यह संकलन एक सामूहिक साहित्यिक यात्रा की परिणति है, जिसके लिए डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने वर्ष 1982 से 2013 के बीच की दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं और पुराने काव्य संकलनों की खोज की। इस कठिन खोज यात्रा में उन्हें डॉ. एन. सिंह, विजय गौड़ और प्रो. राजेश पाल जैसे विद्वानों का सक्रिय सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, जिन्होंने अपने निजी पुस्तकालयों से 'अंगुत्तर', 'फिलहाल', 'उत्तर हिमानी', 'समकालीन जनमत' और 'इन दिनों' जैसी दुर्लभ पत्रिकाएँ उपलब्ध कराईं। यह संग्रह एक साहित्यिक प्रयास के रूप में सामूहिक स्मृति और सम्मान का प्रतीक बन गया है, जो यह सुनिश्चित करता है कि वाल्मीकि का 'दुस्साहस' और उनकी परिवर्तनकामी चेतना आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहे।
जब दलित साहित्यकारों ने अपनी 'स्वानुभूति' को स्वर देना शुरू किया, तो मुख्यधारा के आलोचकों ने इसे 'सौंदर्यशास्त्र' के पैमानों पर घेरने और इसे 'स्वानुभूति' तक सीमित करने की साजिशें रचीं। इन विषम परिस्थितियों और अवरोधों के बीच कवि ने अपनी सत्यनिष्ठा और अडिग साहस के साथ लिखना जारी रखा, जिसका सशक्त परिणाम आज हमारे सामने उनकी 22 असंकलित कविताओं के संग्रह 'चक्रव्यूह टूटेगा' के रूप में मौजूद है।
इस काव्य-संग्रह में संकलित 22 कविताएँ उनके अब तक के प्रकाशित चार संग्रहों से अलग हैं। ये रचनाएँ वर्ष 1982 से 2013 के बीच विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं। इस संग्रह की कविताएँ भारतीय समाज के छल, छद्म और क्रूर इतिहास की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। यह उस 'मौन' और 'बहिष्कृत' जीवन का यथार्थ है जिसे मुख्यधारा के साहित्य ने सदियों तक उपेक्षित रखा। इनकी कविताएँ सामंती सोच और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध एक तार्किक प्रतिरोध दर्ज करती हैं । इनमें 'शनिवार बाड़ा' जैसे प्रतीकों के माध्यम से पेशवाओं के दमन चक्र और ऐतिहासिक उत्पीड़न की याद दिलाई गई है।
वाल्मीकि की कविताएँ विलाप के लिए नहीं है, यह तो एक विस्फोटक ललकार प्रस्तुत करती हैं। 'शब्द बोध' कविता में यह संवेदना स्पष्ट दिखती है-
'हंसों की शक्ल में
गिद्धों का यह क्रन्दन
बदल रहा है
मेरे संताप को
बारूद में।
बारूद : किसी भी क्षण
विस्फोट कर सकता है।'
यहाँ संताप का बारूद में बदलना शोषित वर्ग की चरम बेचैनी और क्रांति की आहट का प्रतीक है। 'हिसाब' कविता में कवि सदियों के अन्याय को बराबर करने की भविष्य-दृष्टि रखता है। यह कविता करुणा के स्थान पर स्वाभिमान को प्रतिष्ठित करती है:
'तब यह भूखा-नंगा असभ्य-सा
दिखने वाला आदमी
लाल किले की सबसे ऊंची बुर्ज पर
लकीरें खींचेगा
अपना हिसाब साफ करने के लिए।'
यहाँ लाल किला सत्ता का प्रतीक है और उस पर लकीरें खींचना अपने अधिकार और न्याय की दावेदारी है। 'मुक्त होने के लिए' कविता में संवेदना निजी पीड़ा से ऊपर उठकर सामूहिक चेतना बन जाती है। इसमें भय का अंत और आवाज़ उठाने के साहस को दर्शाया गया है:
'हालांकि मेरा इस तरह सोचना
अपराध हो सकता है
तुम्हारी दृष्टि में
फिर भी मैं सोचता हूँ
मुक्त होने के लिए
दहशत अब मुझे नहीं डराती।'
कवि ने समाज के उस दृष्टिकोण को चुनौती दी है जो श्रम को 'गंदगी' मानता है। 'हिसाब' कविता में 'कीचड़' संघर्ष के गर्व का रूपक बन जाता है-
'अनगिनत श्रम कण...
धूल से मिलकर
बन जाते हैं कीचड़।
कीचड़ : एक गन्दगी है
तुम्हारे शब्द कोश में।'
'मेरे किस काम के' कविता में उन बुद्धिजीवियों, धर्मनिष्ठों और अहिंसावादियों पर तीखा प्रहार है जो प्रकृति के लिए तो रोते हैं, लेकिन मनुष्य की हत्या पर मौन साध लेते हैं:
'वे आँसू
जो कभी नहीं बहे
किसी निर्दोष की हत्या पर...
ऐसे प्रकृति चिंतक
मेरे किस काम के !'
इनकी 'अयोध्या' और 'माटी' जैसी कविताएँ भारतीय समाज के राजनीतिक, सांप्रदायिक और अस्तित्वगत संघर्षों का एक सघन कोलाज प्रस्तुत करती हैं। 'अयोध्या' कविता एक प्राचीन नगरी का वर्णन के रूप में उस डरावनी सांप्रदायिक चेतना का विश्लेषण है जो आधुनिक भारत के भूगोल में रिस रही है। कवि स्पष्ट करता है कि अब 'अयोध्या' अकेली घटना नहीं है, गोधरा और गुजरात जैसी हिंसक घटनाएँ इसकी पहचान के साथ स्थायी रूप से जुड़ गई हैं। यह कविता धर्म, 'रथ यात्रा' और 'मंडल आयोग' के उस राजनीतिक गठजोड़ को उघाड़ती है जिसका अंतिम लक्ष्य दिल्ली की सत्ता हासिल करना रहा है। वाल्मीकि यहाँ एक सामान्य नागरिक के उस गहरे भय को स्वर देते हैं, जिसमें वह आशंकित है कि कहीं नफरत की यह दस्तक उसके अपने शांत शहर को भी 'अयोध्या' जैसे प्रतीकों में न बदल दे। इसके बावजूद, कविता का अंत एक मानवीय उम्मीद के साथ होता है, जहाँ कवि का मानना है कि तमाम अभावों और षड्यंत्रों के बीच भी आपसी रिश्तों की गरमाहट अभी शेष है।
दूसरी ओर, 'माटी' और 'मेरे हिस्से की माटी' शीर्षक वाली रचनाएँ अस्मिता, वंचना और भूमिहीनता के दंश को अत्यंत मार्मिकता से व्यक्त करती हैं। 'माटी' कविता में मिट्टी का झरना एक गिरते हुए युग और गहराते अंधेरे का रूपक बन जाता है, जहाँ आदमी अपनी जड़ों से कटकर आश्वासनों और चुनावी नारों के बीच खड़ा है। यहाँ 'हैलीकॉप्टर' और 'दूरदर्शन' जैसी आधुनिकता के बीच भी आम आदमी के पाँव तले जमीन का न होना व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता है। वहीं, 'मेरे हिस्से की माटी' में कवि अपने बचपन की उन अपमानजनक स्मृतियों को कुरेदता है, जहाँ स्कूल के टाट का कोना भी उसके लिए कम पड़ जाता था और शिक्षक की छड़ी उसे निरंतर 'बौनेपन' का अहसास कराती थी। इस कविता की केंद्रीय संवेदना वह कचोट है कि इस विशाल देश में उसके हिस्से में 'एक बालिश्त जमीन' भी नहीं है, फिर भी वह अपनी इस माटी और संघर्षरत माँ की अस्मिता पर गर्व करता है।
इनकी कविताएं उस सूक्ष्म दृष्टि का प्रमाण हैं जो इतिहास और वर्तमान के क्रूर सत्य को कलात्मक साहस के साथ दर्ज करती हैं। जहाँ 'अयोध्या' सांप्रदायिकता के बाहरी खतरों से आगाह करती है, वहीं 'माटी' जातिवाद और गरीबी के उन आंतरिक घावों को सामने लाती है जिन्होंने दलित समाज को हजारों वर्षों से हाशिए पर रखा है। साहित्य जब तक मनुष्य के संपूर्ण और खुरदरे अनुभवों को समाहित नहीं करता, तब तक वह अधूरा है।
इस काव्य संग्रह की दो अन्य अत्यंत प्रभावशाली कविताएँ 'हिसाब' और 'चक्रव्यूह टूटेगा' हैं, जो दलित चेतना के प्रतिरोध और भविष्य के संकल्प को स्वर देती हैं। 'हिसाब' कविता वाल्मीकि की उन रचनाओं में से है जो करुणा के स्थान पर क्रांति और आत्म-सम्मान को प्रतिष्ठित करती हैं। यह कविता उस 'मौन' और 'श्रमशील' व्यक्ति की कथा कहती है जिसे सभ्य समाज ने सदियों से 'भूखा-नंगा' और 'असभ्य' कहकर हाशिए पर धकेल दिया था। कवि यहाँ 'कीचड़' जैसे बिम्ब का उपयोग एक गहरे रूपक के तौर पर करते हैं; जहाँ समाज श्रम को गंदगी मानता है, वहीं वाल्मीकि के लिए यही 'कीचड़' और 'धूल' सभ्यता की असली नींव और संघर्ष का गर्व है। कविता की सबसे बड़ी शक्ति इसका 'नियंत्रित क्रोध' है। कवि घोषणा करता है कि वंचित वर्ग की चुप्पी स्थायी नहीं है और एक दिन वह अपनी मौजूदगी का एहसास पूरी ताकत के साथ कराएगा। जब कवि कहता है कि यह आदमी 'लाल किले की सबसे ऊँची बुर्ज पर लकीरें खींचेगा', तो यह इतिहास के सदियों पुराने अन्याय का हिसाब चुकता करने और अपनी मानवीय गरिमा को पुन: प्राप्त करने का उद्घोष है। वहीं, संग्रह की शीर्षक कविता 'चक्रव्यूह टूटेगा' समूची दलित चेतना का एक वैचारिक घोषणापत्र है। यह कविता उस 'चक्रव्यूह' पर प्रहार करती है जिसे ब्राह्मणवादी, सामंती और आधुनिक सत्ताओं ने मिलकर धर्म, मर्यादा और शालीनता के नाम पर गढ़ा है। कवि यहाँ लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति पर तीखा व्यंग्य करते हुए उसे 'गरीब की जोरू' और 'हुजूरों की रखैल' की संज्ञा देते हैं। इसमें 'अभिमन्यु' का प्रतीक महत्वपूर्ण है- यह वह अभिमन्यु है जो भीड़ की दिशा के विपरीत चलता है और सत्ताओं के रथों की गड़गड़ाहट के बीच भी सच की दिशा खोजने का साहस रखता है। कविता स्पष्ट करती है कि इतिहास की जो 'किरिचें' आँखों में किरकिराती हैं, उन्हें अब विस्मृत नहीं किया जा सकता। यह रचना इस अटूट विश्वास के साथ समाप्त होती है कि शोषण और दमन का यह घेरा चाहे जितना भी जटिल और पुराना क्यों न हो, सामूहिक चेतना और तार्किक प्रतिरोध के प्रहार से यह 'चक्रव्यूह' एक दिन अवश्य टूटेगा।
इनका शब्द संयोजन सजावटी की जगह सीधा और खुरदरा है, जो वास्तविक संसार की रचना करता है। 'राख में छिपी चिंगारी', 'अंधेरे की चादर' और 'चक्रव्यूह' जैसे बिम्बों का प्रयोग सामाजिक बदलाव के औजार के रूप में किया गया है। इनकी कविताओं में एक मौन विस्फोट की ऊर्जा है, जहाँ आक्रोश को रचनात्मक ऊर्जा और प्रतिरोधात्मक सौंदर्य में बदला गया है। व्यवस्था द्वारा निर्मित अन्याय का 'चक्रव्यूह' चाहे कितना भी जटिल हो, वह चेतना और संघर्ष के प्रहार से टूटेगा जरूर। इसकी अगली कड़ी में 'मुक्त होने के लिए' कविता दलित अस्तित्व की दबी हुई बेचैनी को एक सचेत विद्रोही चेतना में बदल देती है। यहाँ कवि का शरीर इतिहास की सलाखों पर टंगा हुआ एक रूपक है, लेकिन अब वह अपनी आवाज़ उठाने को 'अपराध' मानने से इनकार कर देता है। इस कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि 'भय' से 'निर्भयता' की ओर बढ़ना है, जहाँ कवि स्पष्ट घोषणा करता है कि 'दहशत अब मुझे नहीं डराती'।
इनकी कविताएँ अपनी भाषा और शिल्प में तार्किक प्रतिरोध का सौंदर्य रचती हैं। वे 'मेरे किस काम के' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन तथाकथित 'महामानवों' के पाखंड को भी उघाड़ती हैं, जो प्रकृति के विनाश पर तो आँसू बहाते हैं, लेकिन किसी निर्दोष की हत्या या दलितों के 'हरे घाव' पर चुप्पी साध लेते हैं। यह पूरा संग्रह इस अटूट विश्वास को पुख्ता करता है कि आक्रोश जब रचनात्मक ऊर्जा बन जाता है, तो वह शोषण के हर जटिल 'चक्रव्यूह' को तोड़ने की क्षमता रखता है।
हम देखते पाते हैं कि इनकी कविताएँ दया या करुणा की याचना करना भूल गयी है, जो आँखों में आँखें डालकर एक सचेत विद्रोही चेतना का उद्घोष करती हैं। 'मुक्त होने के लिए' कविता में वह दलित जीवन की उस मार्मिकता को उघाड़ते हैं जहाँ शरीर स्वयं इतिहास की नुकीली सलाखों पर टंगा हुआ है। यहाँ मुक्ति कोई भावनात्मक कामना भर नहीं है, एक ठोस कदम है, जहाँ कवि भय से निर्भयता की ओर बढ़ता है और स्पष्ट कहता है कि अब 'दहशत मुझे नहीं डराती'।
इस संग्रह का प्रारंभ 'शब्द बोध' जैसी तीव्र संवेदना वाली कविता से होता है, जो सामाजिक विशेषणों और फुसफुसाहटों के 'बारूद' में बदलने की प्रक्रिया को चित्रित करती है। यह कविता स्पष्ट करती है कि दलित चेतना अस्तित्वगत अनुभव के रूप में सामने आ रही है, जहाँ अपमान का संताप किसी भी क्षण विस्फोट कर सकता है।
संग्रह की संवेदना 'भूख' और 'हिसाब' जैसी कविताओं में और अधिक गहरा जाती है। जहाँ 'भूख' अभावग्रस्त जीवन की उस जड़ता को दिखाती है जो मनुष्य को अस्तित्व बचाने के संघर्ष तक सीमित कर देती है, वहीं 'हिसाब' उस 'मौन व्यक्ति' की ज्वाला को स्वर देती है जो युगों से वंचना का बोझ ढो रहा है। कवि का यह अडिग विश्वास है कि वंचित वर्ग की यह चुप्पी स्थायी नहीं है और एक दिन वह लाल किले की सबसे ऊँची बुर्ज पर अपने अधिकारों की लकीरें खींचकर ऐतिहासिक न्याय का हिसाब बराबर करेगा।
श्रम और उत्पादन की प्रक्रिया में मनुष्य के वस्तुकरण को 'बित्ता भर आदमी' के माध्यम से बड़ी मार्मिकता से उकेरा गया है। विकास के इस दौर में आदमी स्वयं कोयला, लोहा और सीमेंट बनकर रह गया है, जो उत्पादन का हिस्सा तो है लेकिन समाज की भीड़ का अंग बनने से बहिष्कृत है। इसी सामाजिक-राजनैतिक जटिलता को संग्रह की शीर्षक कविता 'चक्रव्यूह टूटेगा' संबोधित करती है। संग्रह में वर्ग-भेद की गहरी खाइयों को 'ढिबरी जल रही है' के माध्यम से दिखाया गया है, जहाँ छोटे मकान की ढिबरी और बड़ी इमारत की दूधिया रोशनी के बीच का दारुण अंतर स्पष्ट होता है। यह कविता उस 'जानवर' के प्रति सचेत करती है जो आज भी हमारे आसपास मंडरा रहा है। इसी कड़ी में 'विष वृक्ष' कविता उन 'बौने महाकवियों' की आलोचना करती है जिन्होंने शब्दों को अभिशप्त मान्यताओं का बंधुआ बना दिया है और जो अपनी अश्लीलता से नए विषवृक्ष उगा रहे हैं। 'आदमी' कविता खाली पेट अँधेरे में अपने हिस्से का 'नक्षत्र' खोजते मनुष्य के अस्तित्वगत संघर्ष को बयाँ करती है। ऐतिहासिक बोझ और सामूहिक उत्तरदायित्व का बोध 'महायुद्ध' और 'ओ मेरी उम्मीदो' जैसी रचनाओं में मिलता है। जहाँ 'महायुद्ध' सदियों के बोझ को कंधों से उतारकर सरेआम चौराहे पर टाँगने का संकल्प है, वहीं 'ओ मेरी उम्मीदो' अपनी उम्मीदों को बुलडोजर की तरह भव्य इमारतों के विरुद्ध इस्तेमाल करने का आह्वान करती है। कवि हत्यारों के गिरोह से सावधान रहने की चेतावनी देते हुए संघर्ष को गाँव की बैलगाड़ी से शहर के क्षितिज तक ले जाने की आवश्यकता पर बल देता है।
संग्रह के अंतिम हिस्से में समय और वर्तमान राजनीति के प्रति कवि की चिंताएं मुखर होती हैं। 'वक्त' कविता में समय को एक ऐसे चक्रव्यूह के रूप में देखा गया है जिसे हमने स्वयं रचा है और अब उससे निकलना भूल गए हैं इसके बावजूद, 'विश्वास अभी शेष हैं' कविता अभिव्यक्ति के अपंग होने के दौर में भी 'शब्द' की अजेय शक्ति पर अटूट विश्वास जगाती है।
संग्रह की अंतिम कविताएँ 'माटी', 'आस्था और घृणा', 'आज का मानव' और 'मौसम, पुल और मैं' वर्तमान समाज के खोखलेपन और भविष्य की संभावनाओं को समेटती हैं। 'माटी' खेत से लेकर दूरदर्शन के आश्वासनों तक के छल को उघाड़ती है, फिर भी ठंडे चूल्हे के कभी 'आग' बनने की उम्मीद रखती है। 'आस्था और घृणा' सांप्रदायिकता के उस खतरे को दिखाती है जहाँ पड़ोसी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं और साझा संस्कृति समाप्त होने लगती है। 'आज का मानव' दो मु_ी चावल के लिए जूझते हुए भी किसी 'नये सूर्य' की ताजी किरण की तलाश में है। अंतत:, 'मौसम, पुल और मैं' सन्नाटे को तोड़ने और सूखी नदी में जीवंत झरनों को फिर से जीवंत देखने की बेचैनी के साथ एक सकारात्मक भविष्य की ओर संकेत करती है।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि और सहयोगी टीम के अथक प्रयासों ने ओमप्रकाश वाल्मीकि की इन महत्वपूर्ण रचनाओं को सुरक्षित कर साहित्य को एक ऐसी धरोहर सौंपी है, जो आक्रोश को रचनात्मक ऊर्जा और विरोध को प्रतिरोधात्मक सौंदर्य में बदलने में सक्षम है। यह संग्रह निश्चित रूप से भारतीय साहित्य की आत्मा के सबसे संवेदनशील और जीवंत हिस्से के रूप में हमारे सामने है। अंतत: यह कविता संग्रह बाइस कविताओं का संकलन के रूप में दलित चेतना और सामाजिक न्याय का एक ज्वलंत घोषणापत्र है। इस संग्रह की प्रत्येक कविता अपनी मारक संवेदना और वैचारिक स्पष्टता के माध्यम से भारतीय समाज के उस यथार्थ को उघाड़ती है, जिसे सदियों से मुख्यधारा के साहित्य ने ओझल रखा था।