अमेरिका-इजरायल के 'खतरनाक' संपर्कों से भारत सावधान रहें

नेतन्याहू एक बहुत ही तिरस्कृत व्यक्ति हैं जिनके खिलाफ युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए संयुक्त राष्ट्र समर्थित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है।

Update: 2026-03-13 21:30 GMT

जगदीश रत्तनानी

आखिर यह कैसे हुआ कि भारत अपने समृद्ध इतिहास के साथ स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से अधिकांश भाग के लिए साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ एक स्पष्ट रुख और दुनिया में शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्धता के साथ संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए सम्मान रखने वाला देश, साम्राज्यवाद के इस राक्षस के जाल में उलझ गया जो दुनिया भर में कहर फैला रहा है? इस बात पर विचार करें

दुनिया के कई हिस्सों में इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक बहुत ही तिरस्कृत व्यक्ति हैं जिनके खिलाफ युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए संयुक्त राष्ट्र समर्थित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। अक्टूबर, 2023 में इज़राइल पर हमास के हमले के जवाब में युद्ध में उतरने के बाद से इज़रायल ने गाजा में 72 हजार से अधिक लोगों को मार डाला है, जिनमें से करीब आधी महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग हैं। इज़रायल ने पिछले 28 महीनों से औसतन हर 52 मिनट में एक बच्चे की जान ली है। विश्व स्तर पर मरने वालों की संख्या और 1.7 लाख से अधिक घायलों की संख्या को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। इन हत्याओं के अपराधी इज़रायल ने भी इस बात को मंजूर किया है। नेतन्याहू की पार्टी के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट के शब्दों में 'जानबूझकर, बुरे, दुर्भावनापूर्ण और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से निर्देशित नागरिकों की अंधाधुंध, असीमित, क्रूर और आपराधिक हत्या' ने इज़रायल को विश्व में एक अछूत राज्य में बदल दिया है।

इसी तरह का खेल अब ईरान में खेला जा रहा है जिसने इज़रायल-अमेरिकी संयुक्त युद्ध आक्रमण के साथ ईरान को हत्या के मैदान में बदल दिया गया है। इस युद्ध में ईरानी नेता अली खामेनेई को पहले ही मार डाला गया है। अब वहां और अधिक मौतें तथा विनाश हो रहा है। यह ध्यान देने वाली बात है कि युद्ध को अमेरिका में व्यापक समर्थन प्राप्त नहीं है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को आने वाले समय में इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी होगी। लोगों का अनुमान है कि घरेलू स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करने वाले युद्धोन्मादी नेतन्याहू को आखिरकार एक अहंकारी ट्रम्प की भूमिका निभाने का मौका मिला है जो (ट्रम्प) नव साम्राज्यवादियों की पकड़ और एपस्टीन फाइलों में फंसा है और जिसके बेनकाब होने की प्रतीक्षा की जा रही है।

आखिर यह कैसे हुआ कि भारत अपने समृद्ध इतिहास के साथ स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से अधिकांश भाग के लिए साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ एक स्पष्ट रुख और दुनिया में शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्धता के साथ संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए सम्मान रखने वाला देश, साम्राज्यवाद के इस राक्षस के जाल में उलझ गया जो दुनिया भर में कहर फैला रहा है? इस बात पर विचार करें कि भारत और देश की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की स्थिति के लिए एक दुखद तस्वीर पेश करने के लिए घटनाएं कितनी जल्दी घटित हुईं हैं- कम अमेरिकी टैरिफ के बदले में भारत के लिए कई कठिन शर्तों वाले भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गलत समय पर इज़रायल यात्रा और जिस ईरान के साथ भारत के असाधारण रूप से अच्छे संबंध रहे हैं उस ईरान पर इज़रायल द्वारा हमला करने से ठीक दो दिन पहले नेसेट में मोदी का भाषण; नेतन्याहू ने ईरान पर हमले के बाद मोदी के साथ फोन पर बातचीत का हवाला देते हुए दावा कि भारत इज़रायल के साथ खड़ा है, हालांकि भारत ने रिकॉर्ड पर ऐसा कोई बयान नहीं दिया (और वास्तव में 'शत्रुता को जल्द समाप्त करने की आवश्यकता' को दोहराया है); युद्ध के कारण आपूर्ति में व्यवधान के मद्देनजर अमेरिका द्वारा भारत को एक महीने के लिए रूसी कच्चे तेल के आयात की अनुमति देने की छूट, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट द्वारा भारत को 'गुड एक्टर' कह कर की गई टिप्पणी में निहित अच्छे आचरण का प्रमाणपत्र, नौसेना बेड़े की प्रेसिडेंशियल रिव्यू के लिए भारत का मेहमान और युद्ध मोड में न रहने वाले ईरानी नौसैनिक जहाज का हिंद महासागर में डूबना।

इन सभी घटनाओं को व्यक्तिगत रूप से और निश्चित रूप से एक साथ लिया जाता है तो एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश होती है जो असहाय है, जो दुनिया के गुंडों की गोद में बैठ गया है, जो एक गौरवशाली राष्ट्र के रूप में खड़े होने में असमर्थ या अनिच्छुक है तथा जिसकी अपनी स्वतंत्र सोच या आवाज नहीं है। हालांकि इज़रायल में मोदी की उपस्थिति ने नेतन्याहू को मजबूती दी है लेकिन इसके बदले में भारत को रक्षा या व्यापार सौदों के अलावा कुछ नहीं मिला जिनका मूल्य संदिग्ध है। यह देखते हुए कि ये सौदे भारत को इज़रायल के शिकंजे में और गहराई से धकेल देंगे जो आगामी सौदों और संबंधों में भारत की पसंद की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा सकता है। नेतन्याहू-ट्रम्प धुरी लंबे समय तक नहीं चलेगी। एक ऐसे नेतृत्व के साथ जुड़कर- जिसकी पहचान अहंकार, आत्ममुग्धता तथा अत्याचार है; भारत अपनी स्थिति को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाता है और यहां से विश्व राजनीति के अन्य खिलाड़ियों द्वारा सभी प्रकार के दबाव की रणनीति के लिए एक वैध लक्ष्य के रूप में देखा जाएगा।

यह भी स्पष्ट है कि इस खेल में ये अल्पकालिक हित हैं और जिसे दोस्ती नहीं कहा जा सकता। अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ की टिप्पणी पर विचार करें कि वह भारत को उन आर्थिक लाभों की अनुमति नहीं देगा जो उसने चीन को दिए हैं और इसलिए अपने लिए एक प्रतिद्वंद्वी का निर्माण करेंगे या इज़राइल में एक टेलीविजन शो की क्लिप पर विचार करें जहां एक टिप्पणीकार दावा करता है कि युद्ध के बाद जब उनके पास कोई उत्पादन लाइन नहीं होगी, इज़रायल दुनिया को रक्षा प्रणाली बेचने में व्यस्त होगा और 'हमने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया' जिसके 1.4 अरब लोग इन प्रणालियों को इज़रायल के लिए बनाएंगे!

भारतीय परिप्रेक्ष्य से अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह मेल-जोल खतरनाक है। देश को अपनी स्वतंत्रता को फिर से स्थापित करने और न केवल यथार्थवाद द्वारा निर्धारित नीतियों के आधार पर अपनी स्थिति को पुन: प्राप्त करने के लिए इस गठजोड़ से तत्काल बाहर निकलना चाहिए बल्कि उन सिद्धांतों और मूल्यों के ढांचे के भीतर काम करना चाहिए जो तेजी से बदल रही विश्व व्यवस्था में इन अल्पकालिक शक्ति समीकरणों को पीछे छोड़ देंगे। भारतीय विदेश नीति के 75 वर्षों पर इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर की पत्रिका में ऐसी राय जाहिर की गई है जो उस नैतिक आयाम पर जोर देती हैं जिसे भारत विश्व मामलों में ला सकता है; और लाना भी चाहिए। उदाहरण के लिए रूसी संघ में एक पूर्व राजदूत ने कहा कि भारत को 'विश्व मंच पर कदम रखना चाहिए और रणनीतिक व बौद्धिक घाटे के साथ-साथ नैतिक घाटे को भरने में अपनी भूमिका निभानी चाहिएÓ। रक्षा मंत्रालय के एक पूर्व प्रधान सलाहकार ने कहा कि भारत राष्ट्रीय हित और 'मानवता की भलाई' को देखता है। एक अन्य की राय थी कि भारत को एक ऐसी शब्दावली का निर्माण करना चाहिए जो अनिवार्य रूप से दुनिया के सामने उन नैतिक मूल्यों को पेश करे जिनके लिए भारतीय विदेश नीति काम करती है। जब इन राजनयिकों और विशेषज्ञों द्वारा विशिष्ट संदर्भों में ये टिप्पणियां की गई थीं तो वे उच्च स्तर तक पहुंचने की आकांक्षाओं की ओर भी इशारा करती हैं। भारत अपने मूल्यों और सिद्धांतों के विचारों के आधार पर एक बड़ी भूमिका निभा रहा है जो भारतीय सभ्यता के लोकाचार के मूल में हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस के माध्यम से)

Tags:    

Similar News