इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस

हर वर्ष 15 मार्च को 'इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है। यह तिथि 2019 में न्यूज़ीलैंड के क्राइस्ट चर्च की दो मस्जिदों पर हुए आतंकी हमलों में 51 मृतकों की स्मृति से जुड़ी है,

Update: 2026-03-13 21:40 GMT

—अरुण कुमार डनायक

इस्लामोफोबिया से निपटने का अंतरराष्ट्रीय दिवस सिर्फ औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामाजिक जागरूकता का अवसर है। यह हमें सोचने को विवश करता है कि हम विविधता को भय की दृष्टि से देखते हैं या समृद्धि और सह-अस्तित्व का अवसर मानते हैं। वास्तविकता यह है कि धर्म, जाति, रंग, भाषा और नस्ल के आधार पर भेदभाव आज भी विश्वभर में व्याप्त है।

हर वर्ष 15 मार्च को 'इस्लामोफोबिया से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है। यह तिथि 2019 में न्यूज़ीलैंड के क्राइस्ट चर्च की दो मस्जिदों पर हुए आतंकी हमलों में 51 मृतकों की स्मृति से जुड़ी है, जिसने धार्मिक घृणा के हिंसक परिणामों को वैश्विक स्तर पर उजागर किया। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने इस्लामिक देशों के संगठन के समर्थन से प्रस्ताव प्रस्तुत किया और उसे धार्मिक सहिष्णुता, भेदभाव-निरोध व मानवाधिकारों जैसी व्यापक कूटनीतिक शब्दावली में प्रस्तुत कर वैश्विक सहमति बनाई, जिसके परिणामस्वरूप वह संयुक्त राष्ट्र महासभा में आम सहमति से पारित हो सका।

सर्वसम्मति बन जाने के कारण भारत ने प्रस्ताव का प्रत्यक्ष विरोध नहीं किया, पर 'व्याख्या-स्थिति' दर्ज कराते हुए बहुलवाद को केंद्र में रखने की आवश्यकता पर बल दिया और 16 नवंबर के अंतरराष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस का उल्लेख करते हुए सभी प्रकार के धार्मिक पूर्वाग्रहों को समग्र रूप से संबोधित करने की बात कही। इसी क्रम में 2024 में प्रस्तुत एक अन्य प्रस्ताव से, जो मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव, हिंसा, और कुरान की अवमानना की निंदा करता है, भारत ने मतदान प्रक्रिया से स्वयं को प्रथक कर लिया ।

पुर्तगाल सहित कुछ यूरोपीय देशों एवं भारत, का मत है कि यह प्रस्ताव एक धर्म विशेष पर केंद्रित है, जबकि सभी धर्मों के विरुद्ध असहिष्णुता को समान रूप से संबोधित किया जाना चाहिए; इसलिए वे इसे औपचारिक राष्ट्रीय स्तर पर नहीं अपनाते हैं और आयोजन प्राय: नागरिक संगठनों या स्थानीय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने हाल के वर्षों में इस्लामोफोबिया की बढ़ती घटनाओं को 'महामारी जैसी स्थिति' बताया है। यूरोप, अमेरिका और कनाडा में सर्वेक्षणों व आधिकारिक आंकड़ों से मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह और घृणा अपराधों में वृद्धि के संकेत मिले हैं। भारत में, जहां मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं, कुछ स्वतंत्र अध्ययनों में यह चिंता व्यक्त की गई है कि ध्रुवीकरण और घृणा-भाषण सामाजिक तनाव को बढ़ा रहे हैं। इन रुझानों से स्पष्ट है कि यह समस्या केवल पूर्वाग्रह तक सीमित नहीं, बल्कि हिंसा, धार्मिक स्थलों पर हमलों और सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार के रूप में भी प्रकट हो रही है।

इस्लामोफोबिया की जड़ें यरूशलम के क्रूसेड्स, स्पेन के रिकॉनक्विस्टा तथा भारत में मंदिर-मस्जिद विवाद जैसे मध्ययुगीन धार्मिक संघर्षों, औपनिवेशिक मानसिकता और उस प्रवृत्ति में निहित हैं, जिसमें भिन्न धार्मिक या सांस्कृतिक समुदायों को 'पराया' या 'खतरे' के रूप में चित्रित किया गया। आलोचक कुरान की कुछ युद्ध-संदर्भित आयतों का हवाला देकर इसे गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध हिंसा से जोड़ते हैं, किंतु इन आयतों का संदर्भ 7वीं शताब्दी के विशिष्ट संघर्षों और आत्मरक्षा की परिस्थितियों से जुड़ा है साथ ही कुरान न्याय, सहअस्तित्व और सीमा-नियंत्रण पर बल देता है। अत: चयनित पंक्तियों के आधार पर समग्र धर्म को हिंसक सिद्ध करना न तो ऐतिहासिक रूप से उचित है और न ही बौद्धिक रूप से न्यायसंगत।

दूसरी ओर, अल-कायदा, आईएसआईएस, तालिबान, हिजबुल्लाह और हमास जैसे इस्लामी उग्रवादी समूह हिंसा का सहारा लेते रहे हैं, यद्यपि वे मुख्यधारा इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करते। 9/11 जैसे हमलों के बाद मुसलमानों को आतंकवाद से जोड़ने की प्रवृत्ति वैश्विक स्तर पर बढ़ी, जिससे इस्लामोफोबिया को बल मिला। भारत में 1993 के मुंबई धमाके, 2001 का संसद हमला और कश्मीर की हिंसा, तथा हालिया इज़रायल-हमास/ हिजबुल्लाह संघर्ष जैसे घटनाक्रमों ने इस धारणा को और तीव्र किया। फिर भी, आतंकवाद के सबसे अधिक शिकार स्वयं मुसलमान भी रहे हैं, और अनेक मुस्लिम संगठनों व राष्ट्राध्यक्षों ने इसकी स्पष्ट निंदा की है।

इस्लामोफोबिया का प्रसार केवल धार्मिक पूर्वाग्रह का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कारकों से जुड़ा है। आर्थिक असुरक्षा, बेरोजगारी और संकट के दौर में अल्पसंख्यकों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति बढ़ती है, जिससे मुस्लिम समुदाय के प्रति नकारात्मकता गहराती है। राष्ट्रवादी राजनीति भी कई बार बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देकर उन्हें 'सांस्कृतिक' या 'सुरक्षा' खतरे के रूप में प्रस्तुत करती है। सोशल मीडिया की भ्रामक और मीडिया की सनसनीखेज प्रस्तुति इस धारणा को और मजबूत करती है। कुल मिलाकर, यह एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिघटना है, जो आर्थिक असंतुलन, राजनीतिक विमर्श और सूचना-परिस्थिति से प्रभावित होती है।

इस समस्या से निपटने के लिए शिक्षा, जागरूकता और नीतिगत सुधार आवश्यक हैं, ताकि पूर्वाग्रहों को चुनौती देकर समावेशी समाज को बढ़ावा मिल सके। संयुक्त राष्ट्र ने सदस्य देशों से धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा का आग्रह किया है। इसके लिए प्रभावी घृणा-अपराध कानून, संवेदनशील पुलिस-न्याय तंत्र तथा आभासी माध्यमों पर सख्त नियंत्रण जरूरी है। साथ ही मुस्लिम समुदाय को भी मध्ययुगीन कठमुल्लापन, रूढ़िवादी सोच और अंधविश्वास त्यागकर सामाजिक सहभागिता, आधुनिक न्याय मूल्यों तथा अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता अपनानी चाहिए। खासतौर पर मदरसा शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक विज्ञान, संवैधानिक मूल्यों और अंतरधार्मिक समझ से जोड़ना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

आज जब विश्व धार्मिक पहचान के आधार पर विभाजनों से जूझ रहा है, महात्मा गांधी का सर्वधर्म समभाव अत्यंत प्रासंगिक है। उनकी दैनिक प्रार्थना में सभी धर्मों की स्तुतियों का समावेश था। वे मानते थे कि इस्लाम का प्रसार तलवार से नहीं, बल्कि पैगंबर मुहम्मद के नैतिक गुण, न्यायप्रियता और आध्यात्मिक शक्ति से हुआ। वे भारत के मुसलमानों में दिखाई देने वाली असहिष्णु व हिंसक प्रवृत्तियों को हजरत उमर की सहिष्णुता और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत मानते थे। गांधीजी ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी समुदाय में पाई जाने वाली असहिष्णुता, कट्टरता या हिंसा उस धर्म की मूल शिक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। मुस्लिम इतिहास में सूफियों और फकीरों की आध्यात्मिक शक्ति ने धर्म की स्थायित्वता सुनिश्चित की, न कि हिंसा। गांधीजी का यह दृष्टिकोण आज इस्लामोफोबिया को चुनौती देने और सभी धर्मों के मूल उद्देश्य—मानव कल्याण—को समझने में सहायक है।

इस्लामोफोबिया से निपटने का अंतरराष्ट्रीय दिवस सिर्फ औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामाजिक जागरूकता का अवसर है। यह हमें सोचने को विवश करता है कि हम विविधता को भय की दृष्टि से देखते हैं या समृद्धि और सह-अस्तित्व का अवसर मानते हैं। वास्तविकता यह है कि धर्म, जाति, रंग, भाषा और नस्ल के आधार पर भेदभाव आज भी विश्वभर में व्याप्त है—अमेरिका में नस्लवाद, भारत में जातिगत असमानताएं और भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव इसके जीवंत उदाहरण हैं। इसलिए ऐसे दिवस की सार्थकता तभी है जब वे किसी एक धर्म तक सीमित न रहकर समग्र समावेशिता, समानता और मानवाधिकार की सार्वभौमिक प्रतिबद्धता को प्रेरित करें। महात्मा गांधी का संदेश याद दिलाता है कि सहिष्णुता कानून से नहीं, हृदय की उदारता से आती है। भारत जैसे बहुधार्मिक देश इस दिशा में वैश्विक नेतृत्व कर सकते हैं ।

(लेखक गांधी विचारों के अध्येता हैं)

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