बांग्लादेश चुनाव से पहले यूनुस के घर के बाहर उग्र प्रदर्शन, हिंसक टकराव में 50 लोग घायल

Violent protests erupt outside Yunus home ahead of Bangladesh elections 50 people injured in clashes

Update: 2026-02-07 06:00 GMT

ढाका। बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनाव और जनमत संग्रह में अब केवल छह दिन शेष हैं, लेकिन राजधानी ढाका में राजनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है। शुक्रवार को अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के आधिकारिक आवास के बाहर इंकलाबी मंच के कार्यकर्ताओं ने उग्र प्रदर्शन किया और आवास परिसर में घुसने की कोशिश की। हालात काबू करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। झड़पों में करीब 50 लोगों के घायल होने की खबर है। हालांकि, सरकार ने घातक बल प्रयोग से इनकार किया है और देशवासियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। इसी दिन सरकारी कर्मचारियों ने भी राजधानी में प्रदर्शन करते हुए नौवें वेतन आयोग की सिफारिशों को तत्काल लागू करने की मांग उठाई। चुनाव से पहले राजधानी में दोहरे विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

इंकलाबी मंच का उग्र प्रदर्शन

इंकलाबी मंच पार्टी के कार्यकर्ता अपने संस्थापक छात्र नेता उस्मान हादी की हत्या के मामले में न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे। हादी की पिछले वर्ष दिसंबर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पार्टी का आरोप है कि सरकार ने मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं की है और जांच में देरी की जा रही है।

शुक्रवार को प्रदर्शनकारियों ने यूनुस के आधिकारिक आवास की ओर मार्च किया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज किया, पानी की बौछारें कीं और साउंड ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। ढाका मेट्रोपोलिटन पुलिस ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शनकारियों पर किसी भी प्रकार के घातक हथियार का प्रयोग नहीं किया गया। सुरक्षा के मद्देनजर बार्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) की छह प्लाटून भी तैनात की गई थीं। झड़पों में इंकलाबी मंच के मेंबर सेक्रेटरी अब्दुल्ला अल जबर सहित कई कार्यकर्ता घायल हुए। पुलिस ने दावा किया कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया गया, जबकि विपक्षी संगठनों ने इसे “अनुचित दमन” बताया है।

हादी हत्याकांड की जांच पर सरकार का रुख

घटनाक्रम से एक दिन पहले यूनुस सरकार ने घोषणा की थी कि वह उस्मान हादी हत्याकांड की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त से सहयोग मांगेगी। सरकार ने कहा है कि इस संबंध में कानूनी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है और आठ फरवरी को संयुक्त राष्ट्र एजेंसी को औपचारिक पत्र भेजे जाने की संभावना है। सरकार का कहना है कि वह निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के पक्ष में है, लेकिन इंकलाबी मंच के नेताओं का आरोप है कि यह केवल समय टालने की रणनीति है। चुनाव से ठीक पहले इस मुद्दे के उभार ने राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है।

सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन

राजधानी में तनाव का दूसरा कारण सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन रहा। कर्मचारियों ने नौवें वेतन आयोग की सिफारिशों को गजट अधिसूचना के माध्यम से तुरंत लागू करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आयोग ने अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप दे दिया है, लेकिन सरकार इसे लागू करने में देरी कर रही है। कर्मचारियों ने यूनुस के आवास के बाहर नारेबाजी करते हुए कहा कि बढ़ती महंगाई के बीच वेतन संरचना में संशोधन आवश्यक है। चुनाव से पहले सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी ने अंतरिम सरकार के सामने एक और चुनौती खड़ी कर दी है।

धर्मनिरपेक्षता पर बीएनपी का बयान

अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के महासचिव मिर्चा फखरुल इस्लाम आलमगीर का बयान भी चर्चा में है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि “धर्मनिरपेक्षता” शब्द बांग्लादेश की राजनीति के लिए बहुत अनुकूल नहीं है और इसे संविधान से हटाए जाने के पक्ष में दलील दी। उन्होंने 1977 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान द्वारा संविधान से “धर्मनिरपेक्षता” शब्द हटाने के फैसले का बचाव किया और इसे पार्टी की विचारधारा के अनुरूप बताया। इस बयान के बाद संविधान से धर्मनिरपेक्षता हटाने की बहस फिर तेज हो गई है। भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पूछे गए सवाल के जवाब में आलमगीर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन पर शोक जताने के बाद दोनों देशों के संबंध बेहतर होने की उम्मीद है।

अमेरिकी विशेषज्ञों ने उठाए सवाल

चुनाव की वैधानिकता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठने लगे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के विद्वान माइकल रुबिन ने बांग्लादेश के चुनावों को “न तो स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष” बताया है। रुबिन ने कहा कि मुख्यधारा की पार्टियों को चुनाव से अलग रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है। उन्होंने अवामी लीग जैसी बड़ी पार्टी पर प्रतिबंध को राजनीतिक भय का संकेत बताया और दावा किया कि अंतरिम सरकार तथा जमात-ए-इस्लामी को आशंका है कि अवामी लीग चुनाव जीत सकती है। उन्होंने पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि छात्र आंदोलन को भड़काने में बाहरी ताकतों की भूमिका रही है। हालांकि, इन दावों पर बांग्लादेश सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

चुनावी माहौल में बढ़ती अनिश्चितता

चुनाव और जनमत संग्रह से ठीक पहले ढाका में हुई घटनाओं ने राजनीतिक वातावरण को और अधिक अस्थिर बना दिया है। एक ओर विपक्ष न्याय और पारदर्शिता की मांग कर रहा है, तो दूसरी ओर अंतरिम सरकार शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रही है। राजधानी में भारी सुरक्षा तैनाती जारी है और प्रशासन किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए तैयार होने का दावा कर रहा है। आने वाले छह दिन बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम साबित हो सकते हैं। 

वर्तमान हालात ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी प्रक्रिया केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ी राजनीतिक विश्वसनीयता, न्यायिक पारदर्शिता और सामाजिक स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अंतरिम सरकार इन चुनौतियों का सामना किस तरह करती है और चुनाव कितने शांतिपूर्ण व विश्वसनीय ढंग से संपन्न होते हैं।

Tags:    

Similar News