ओमान की बैठक हुई फेल तो जल उठेगा मिडिल ईस्ट! आर-पार की तैयारी में अमेरिका और ईरान

वार्ता से पहले ही दोनों देशों के रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्य चुनौती बातचीत की विषय-वस्तु को लेकर ही होगी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिया है कि यदि बातचीत सार्थक होनी है तो उसमें ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों जैसे मुद्दों को शामिल करना होगा।

Update: 2026-02-05 23:10 GMT

वाशिंगटन : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान ने शुक्रवार को ओमान की राजधानी मस्कट में वार्ता करने पर सहमति जता दी है। हालांकि बातचीत के एजेंडे को लेकर दोनों देशों के बीच अब भी गहरे मतभेद बने हुए हैं। जहां अमेरिकी पक्ष चाहता है कि चर्चा केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित न रहे, बल्कि उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को समर्थन और कुछ आंतरिक नीतिगत मुद्दों को भी शामिल किया जाए, वहीं तेहरान स्पष्ट कर चुका है कि वह वार्ता को केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रखना चाहता है।

यह पहल ऐसे समय में हो रही है जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हुई हैं और कई देश आशंकित हैं कि किसी भी तरह की चूक व्यापक संघर्ष का रूप ले सकती है। ऐसे माहौल में मस्कट वार्ता को तनाव कम करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

एजेंडे पर टकराव


वार्ता से पहले ही दोनों देशों के रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि मुख्य चुनौती बातचीत की विषय-वस्तु को लेकर ही होगी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिया है कि यदि बातचीत सार्थक होनी है तो उसमें ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों जैसे मुद्दों को शामिल करना होगा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि केवल परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा से दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। दूसरी ओर, ईरान के अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा है कि उनका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है और यह किसी भी वार्ता का हिस्सा नहीं होगा। तेहरान का तर्क है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम रक्षात्मक प्रकृति का है और इसे परमाणु मुद्दे से जोड़ना उचित नहीं है। ईरान का यह भी कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के नियमों के तहत काम कर रहा है।

परमाणु विवाद की पृष्ठभूमि

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। 2015 में हुए संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (JCPOA) समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई प्रतिबंध स्वीकार किए थे, जिसके बदले उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में ढील दी गई थी। हालांकि बाद में अमेरिका के समझौते से हटने और प्रतिबंधों को फिर से लागू करने के बाद स्थिति जटिल हो गई।

तब से दोनों देशों के बीच अविश्वास गहराता गया है। अमेरिका और इजराइल समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश कर रहा है, जबकि तेहरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है। वर्तमान वार्ता को उसी विवाद को नियंत्रित करने की दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

मस्कट क्यों बना पसंदीदा स्थान

हाल के दिनों में वार्ता के संभावित स्थान को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई थी। पहले इस्तांबुल का नाम सामने आया था, लेकिन अंततः दोनों पक्षों ने ओमान की राजधानी मस्कट को चुना। ओमान लंबे समय से क्षेत्रीय कूटनीति में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है और ईरान तथा पश्चिमी देशों के बीच कई संवेदनशील वार्ताओं की मेजबानी कर चुका है।

सूत्रों के अनुसार, अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकाफ और ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची वार्ता में भाग ले सकते हैं। ओमान को इसलिए भी प्राथमिकता दी गई क्योंकि यहां पहले भी परमाणु मुद्दों पर सीमित दायरे में गोपनीय और तकनीकी स्तर की बातचीत होती रही है।

बढ़ता क्षेत्रीय तनाव

वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां तेज हैं। हाल के हफ्तों में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी में वृद्धि, ड्रोन से जुड़े घटनाक्रम, नौसैनिक गतिविधियों में इजाफा और परस्पर चेतावनियों ने तनाव को और बढ़ा दिया है। खाड़ी क्षेत्र के देशों को डर है कि यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो इसका असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत से कम से कम संचार की एक लाइन खुली रहेगी, जिससे गलतफहमी के कारण किसी बड़े संघर्ष की आशंका कम हो सकती है। हालांकि एजेंडे पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में वार्ता के विफल होने का खतरा भी बना रहेगा।

वैश्विक असर और तेल बाजार

अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में किसी भी बदलाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। संभावित समझौते की उम्मीद से हाल के दिनों में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। यदि वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है और प्रतिबंधों में ढील की संभावना बनती है, तो वैश्विक बाजार में ईरानी तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है। इसके विपरीत, बातचीत विफल होने की स्थिति में तनाव और बढ़ सकता है, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है।

क्या निकल पाएगा समाधान?


विशेषज्ञों का आकलन है कि इस दौर की वार्ता से तत्काल कोई बड़ा समझौता निकलना मुश्किल हो सकता है, लेकिन संवाद की प्रक्रिया शुरू होना ही एक सकारात्मक संकेत है। यदि दोनों पक्ष शुरुआती स्तर पर भरोसे का माहौल बना पाते हैं, तो आगे के दौर में जटिल मुद्दों पर भी चर्चा की जमीन तैयार हो सकती है।

फिलहाल दोनों देश अपने-अपने रुख पर कायम हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि वे बातचीत का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते। मस्कट में होने वाली बैठक इस बात की परीक्षा होगी कि क्या कूटनीति, बढ़ते सैन्य तनाव और अविश्वास के माहौल के बीच भी कोई साझा रास्ता निकाल सकती है या नहीं।

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