मणिपुर में फिर हिंसा
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर कुछ वक्त की घोषित शांति के बाद एक बार फिर से सुलग उठा है। बीते सात अप्रैल को बिशनुपुर जिले के त्रोंगलाओबी गांव में हुए बम विस्फोट में एक बीएसएफ जवान के दो नाबालिग बच्चे मारे गए, जबकि उनकी मां घायल हो गईं;
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर कुछ वक्त की घोषित शांति के बाद एक बार फिर से सुलग उठा है। बीते सात अप्रैल को बिशनुपुर जिले के त्रोंगलाओबी गांव में हुए बम विस्फोट में एक बीएसएफ जवान के दो नाबालिग बच्चे मारे गए, जबकि उनकी मां घायल हो गईं। मृतकों में एक पांच महीने का नवजात शामिल था। मैतेई नागरिक समाज समूहों ने आरोप लगाया है कि चुड़ाचांदपुर के कुकी-ज़ो उग्रवादी समूह इस हमले के पीछे हैं और उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों को हटाने की मांग भी की है। इस घटना के बाद मैतेई समुदाय के लोगों ने भारी प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों के कैंप पर हमला बोल दिया। अफवाहों का सहारा लेकर कुछ लोग कैंप में घुसने और हथियार लूटने की कोशिश करने लगे। स्थिति नियंत्रण से बाहर होते देख सीआरपीएफ जवानों ने फायरिंग की, जिसमें तीन स्थानीय निवासी मारे गए। इस तरह पांच मौतें पिछले 10 दिनों में हो चुकी हैं।
राज्य में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, जिससे स्थानीय लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। मेइरा पाइबी समूहों ने घाटी क्षेत्रों में पांच दिन का बंद बुलाया है और 25 अप्रैल तक दोषियों की गिरफ्तारी की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और तेज होगा।
मुख्यमंत्री कार्यालय और गृह मंत्री ने शांति की अपील की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। स्थानीय लोग न्याय की मांग कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि सुरक्षा बल हमलावरों की पहचान करने में नाकाम रहे हैं। फिलहाल इंटरनेट सेवाएं कई जिलों में निलंबित हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है।
यह सब देखकर भी अगर केंद्र सरकार और मणिपुर की बीजेपी सरकार जागती नहीं है, तो यह देश के लिए बेहद दुखद होगा कि एक राज्य पिछले 3 सालों से लगातार हिंसा की आग में झुलस रहा है और सरकार इसी फिक्र में है कि उसकी सियासी रोटी वहां पकेगी या नहीं। गौरतलब है कि इससे पहले मई 2023 में जो हिंसा मणिपुर में शुरु हुई थी, उसमें अब तक कम से कम 260 लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं। यह हिंसा सबसे पहले मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुई थी और अब लगभग सभी समूह इसमें शामिल हो गए हैं। मणिपुर में मैतेई और कुकी पहले भी मिल-जुलकर नहीं रहते थे, मैतेई समुदाय मुख्य रूप से इंफाल घाटी के मैदानी इलाकों में रहते हैं, जबकि कुकी पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं। लेकिन तीन सालों की हिंसा के बाद अब मैतेई और कुकी न केवल अपने-अपने क्षेत्रों में सिमट गए हैं, बल्कि एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के इलाके में जाने का जोखिम भी नहीं उठाते। एक राज्य के भीतर ऐसा बंटवारा एक भारत-श्रेष्ठ भारत के अनुरूप तो बिल्कुल नहीं है, लेकिन मोदी सरकार यह सब देखकर भी आंख फेर रही है।
2023 में हिंसा इसलिए भडक़ी थी, क्योंकि मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति दर्जा की मांग पर मणिपुर हाईकोर्ट ने फैसला लिया था कि मैतेई समुदाय को एसटी सूची में शामिल किया जाए। 2012 से ही मैतेई समुदाय यह मांग कर रहा था ताकि उन्हें आरक्षण, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में लाभ मिले। लेकिन तब कुकी-जो समुदाय ने डर जताया कि एसटी दर्जा मिलने पर मैतेई पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन खरीद सकेंगे, उनकी राजनीतिक शक्ति बढ़ेगी जबकि आदिवासियों की जमीन, नौकरियाँ तथा संसाधन प्रभावित होंगे। इस फैसले का विरोध शुरु हुआ और 3 मई 2023 को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने पहाड़ी जिलों में ‘ट्राइबल सॉलिडैरिटी यानी आदिवासी एकता मार्च’ निकाला। इस मार्च के बाद इम्फाल घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों में हिंसा भडक़ उठी। और फिर उसकी आग कितनी फैल गई, ये सबने देखा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मणिपुर चर्चा में आ गया था, क्योंकि यहां दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर उनके साथ सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया था। तब भी तत्कालीन मुख्यमंत्री बीरेन सिंह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उम्मीद थी कि वे जल्द से जल्द हालात सामान्य करने के लिए कदम उठाएंगे। लेकिन बीरेन सिंह अपना इस्तीफा देने से बचते रहे और प्रधानमंत्री मणिपुर का नाम लेने से बचते रहे। संसद में इस विषय पर चर्चा टलती रही और नरेन्द्र मोदी का डर तो इतना बढ़ा कि उन्होंने मिजोरम में चुनाव प्रचार नहीं किया ताकि मणिपुर न जाना पड़े। पिछले साल फरवरी में एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा, सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर का दौरा किया और इस साल फरवरी में भाजपा के ही युम्नाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नयी सरकार बनी।
लेकिन चंद महीनों की शांति के बाद अब फिर हिंसा भडक़ी है तो कुछ सवाल भी नए सिरे से खड़े हो गए हैं। जैसे, क्या युम्नाम खेमचंद सिंह भी मणिपुर की नाजुक जातीय संरचना को संभाल कर काम नहीं कर पा रहे हैं। दूसरा सवाल कि क्या सुरक्षा बलों और जांच एजेंसियों में कहीं कोई बड़ी खामी है, जो वो हिंसा को भडक़ने और फैलने से रोक नहीं पा रहे हैं। तीसरा और सबसे अहम सवाल, क्या जिस वक्त देश ऊर्जा के गंभीर संकट में फंसा है, मोदी सरकार की नाकाम विदेश नीति की सच्चाई सबके सामने आ चुकी है, क्या ऐसे में मणिपुर में हिंसा की आड़ में कोई बड़ा खेल हो रहा है, जिस पर लोगों का ध्यान न जाए। ध्यान रहे कि मणिपुर हो या लद्दाख, ये प्राकृतिक संपदा के धनी क्षेत्र हैं और अब तक शांतिप्रिय ही रहे हैं। मगर अब वहां विघ्नसंतोषी ताकतें सिर उठा रही हैं।
मणिपुर में मौजूदा वक्त में चाहे जिस कारण से हिंसा भडक़ी हो, अब उस पर तत्काल काम करना होगा। सरकार को इस जिम्मेदारी को टालने नहीं दिया जाना चाहिए।