तमिलनाडु में राजनीति की नयी इबारत

लगभग 50 सालों से यहां द्रमुक और अन्नाद्रमुक की बारी-बारी से चली आ रही सत्ता की परंपरा टूटी है और गैर-द्रविड़ पार्टी टीवीके की सरकार बनी है।;

Update: 2026-05-10 21:37 GMT

तमिलनाडु की राजनीति में बड़े बदलाव रविवार, 10 मई 2026 से शुरु हुआ है। लगभग 50 सालों से यहां द्रमुक और अन्नाद्रमुक की बारी-बारी से चली आ रही सत्ता की परंपरा टूटी है और गैर-द्रविड़ पार्टी टीवीके की सरकार बनी है। 2024 में तमिला वेत्री कषगम यानी टीवीके को खड़ा करने वाले मशहूर अभिनेता और थलपति या दलपति के नाम से चर्चित जोसेफ विजय अब तमिलनाडु के नये मुख्यमंत्री बन चुके हैं। रविवार को कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की खास मौजूदगी और अपने अन्य सहयोगी दलों के नेताओं के बीच विजय ने चेन्नई में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान विजय की पोशाक भी चर्चा में रही। आमतौर पर तमिलनाडु में नेता सफेद कुर्ते, शर्ट और धोती में नजर आते हैं, लेकिन विजय ने सफेद शर्ट, ब्लेजर और काली पैंट पहनकर शपथ ली। नए मुख्यमंत्री विजय ने केवल पोशाक में बदलाव नहीं किया, बल्कि उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में एक नए बदलाव की बात भी कही। शपथ लेने के बाद अपने पहले भाषण में विजय ने कहा, 'यह एक नई शुरुआत है। अब असली धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय का एक नया दौर शुरू हो रहा है।' उन्होंने कहा, 'मैं किसी शाही परिवार में पैदा नहीं हुआ हूं; मैं आप ही के बेटे, आप ही के भाई जैसा हूं- मैं आपका 'थंबी' (छोटा भाई) हूं।' उन्होंने कहा, 'मैं जानता हंू कि गरीबी और भूख क्या होती है।' विजय ने यह भी कहा कि, 'मैं कोई फ़रिश्ता नहीं, बल्कि एक आम इंसान हूं।'

खुद को फरिश्ता न मानना संभवत: नरेन्द्र मोदी के खुद को नॉन बायलॉजिकल कहने का जवाब हो। वहीं गरीबी और भूख से अपना पुराना नाता बताकर विजय ने नरेन्द्र मोदी के गरीब मां का बेटा और चायवाला होने के पैंतरे का भी जवाब दे दिया है। दक्षिण भारत में भाजपा की हालत यूं भी कुछ खास अच्छी नहीं है। आंध्रप्रदेश में भाजपा को तेलुगूदेसम पार्टी (टीडीपी) का आसरा है और पुड्डूचेरी में अपनी सरकार है। इसके अलावा केरल में उसे कांग्रेस से मात मिली है। तेलंगाना और कर्नाटक में भी कांग्रेस की सरकार है। तमिलनाडु से ही भाजपा को उम्मीदें थीं कि यहां उसे भले एक सीट मिली है, लेकिन किसी भी दल को पूर्ण बहुमत न होने का लाभ आखिर में उसे ही मिलेगा और वह अन्नाद्रमुक के सहारे सत्ता पर पकड़ बनाएगी। लेकिन राहुल गांधी ने भाजपा की चालाकी तमिलनाडु में चलने नहीं दी। 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी टीवीके को कांग्रेस ने तुरंत ही अपना समर्थन दे दिया था कि वह सरकार बनाने का दावा पेश कर दे। लेकिन राज्यपाल राजेन्द्र अर्लेकर इसी बात पर अड़े रहे कि टीवीके बहुमत के आंकड़े यानी 118 विधायकों के हस्ताक्षर लेकर आए, तभी सरकार बनाने का दावा मंजूर होगा। कम से कम तीन बार विजय को राजभवन से खाली हाथ लौटाया गया। लेकिन शनिवार शाम तक परिस्थितियां पूरी तरह विजय के पक्ष में बन गईं। कांग्रेस के अलावा माकपा, भाकपा, वीसीके और आईयूएमएल इन सबने भी टीवीके के लिए समर्थन पत्र सौंप दिया और तय हो गया कि अब विजय मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसके बाद बिना समय गंवाए रविवार सुबह शपथग्रहण हो भी गया। यह जल्दीबाजी करना लाजिमी भी था, क्योंकि भाजपा का कुख्यात इतिहास रहा है कि वह सत्ता हथियाने के लिए विधायक तोड़कर सुबह चार बजे भी शपथ ग्रहण करवा सकती है।

बहरहाल, अब तमिलनाडु भाजपा के इस खेल के खतरे से सुरक्षित है। लेकिन भविष्य में विजय को काफी सावधानी बरतनी होगी। चुनाव बाद बने इस गठबंधन के तमाम घटक दल विजय के साथ इसी नाम पर आगे आए हैं, क्योंकि उन्हें भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति से तमिलनाडु को बचाना है। ये दल नहीं चाहते थे कि राज्य में राष्ट्रपति शासन या दोबारा चुनाव की नौबत आए। अब विजय के ऊपर यह जिम्मेदारी है कि वे जनता के साथ-साथ सहयोगी दलों के भरोसे को भी बनाए रखें। यहां फिल्मों जैसा हाल नहीं चल पाएगा, जहां नायक अकेले अपने दम पर दुश्मनों से दो-दो हाथ करता है। सरकार में विजय अकेले नहीं रहेंगे, घटक दलों का दबाव उन पर लगातार बना रहेगा, इसके साथ ही उन्हें आगे बढ़ना होगा। इसके अलावा केंद्र सरकार से टकराव की भी प्रबल संभावनाएं हैं। तमिलनाडु में विजय की सरकार बनने और राहुल गांधी के साथ आने पर नरेन्द्र मोदी कितना चिढ़ चुके हैं, इसकी झलक उनके एक भाषण में मिली, जब उन्होंने कांग्रेस को सत्ता का भूखा, पीठ में छुरा घोंपने वाली और परजीवी पार्टी बताया। श्री मोदी ने कहा कि, '2014 से पहले 10 सालों तक जिस सरकार का नेतृत्व कांग्रेस ने किया, वह काफी हद तक डीएमके की वजह से ही चल पाई। इसके बाद भी, उसे उस पल धोखा दे दिया गया, जब राजनीतिक हवा का रुख बदला।' तमिलनाडु में नयी सरकार बनने से तिलमिलाए नरेन्द्र मोदी कांग्रेस को सरकार में शामिल होने से नहीं रोक पाए, तो अब कांग्रेस और डीएमके की दोस्ती याद दिला रहे हैं। हालांकि जब उन्होंने शिवसेना को तोड़ा, अकाली दल और बीजू जनता दल को अलग किया, रामविलास पासवान की मौत के बाद उनका अपमान किया और फिर चिराग पासवान को साथ ले लिया, पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनायी और फिर उसका विरोध भी किया, तब उन्हें इस बात की फिक्र नहीं रही कि वो सत्ता में बने रहने के लिए किन लोगों को धोखा दे रहे हैं।

खैर, भाजपा के हमलों से बेपरवाह राहुल गांधी ने तमिलनाडु में सत्ता का नया व्याकरण लिखने वाले विजय के साथ दक्षिण की राजनीति की नयी इबारत लिखना शुरु कर दिया है। 2029 के चुनाव में इसका असर स्पष्ट तौर पर दिखाई देगा, जब यहां कि कुल 131 सीटों, तमिलनाडु: 39, कर्नाटक: 28, आंध्र प्रदेश: 25, केरल: 20, तेलंगाना: 17, पुडुचेरी: 1, लक्षद्वीप: 1 पर बढ़त बनाने में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल कामयाब रहेंगे। अगर परिसीमन का खिलवाड़ न हुआ तो भाजपा को फिर दक्षिण भारत से निराशा हाथ लगेगी।

बहरहाल फिलहाल देखना होगा कि पूर्ववर्ती स्टालिन सरकार के साथ केंद्र का जो नकारात्मक रवैया रहा, क्या वही सिलसिला आगे बढ़ेगा। देखना यह भी होगा कि जिस तरह हिंदी की अनिवार्यता या परिसीमन आदि पर स्टालिन ने केंद्र के सामने तलवारें खींची रखीं क्या विजय भी वैसा ही कड़ा रवैया दिखाएंगे। और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की मुहिम को विजय कितना और कैसे आगे बढ़ाएंगे, क्योंकि 2029 के चुनाव में यही मुद्दे अहम रहेंगे।

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