भारत के संकट में फिर साथ आया रूस
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रविवार की अपील के बाद पूरे देश में भाजपा नेताओं में होड़ मची है कि वे पेट्रोल-डीजल बचाने में खुद को पहले स्थान पर दिखाएं।;
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रविवार की अपील के बाद पूरे देश में भाजपा नेताओं में होड़ मची है कि वे पेट्रोल-डीजल बचाने में खुद को पहले स्थान पर दिखाएं। कहीं कोई मोटर साइकिल से काम पर आने का वीडियो बनवा रहा है, कोई मेट्रो में सफर कर रहा है, किसी ने दिखाया कि हमने अपने काफिले में अब केवल चार गाड़ियां रखी हैं, तो कोई बता रहा है कि साल भर तक विदेश यात्रा नहीं करेंगे। हालांकि अब तक किसी भाजपा नेता ने ये नहीं बताया है कि वो या उनके परिजन सोना न खरीदने की बात पर भी अमल करेंगे या नहीं। क्योंकि सोना न खरीदने की अपील और सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने के बाद भी सर्राफा बाजार में बीते दो दिन सोना जमकर बिका है। संपन्न उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग जानता है कि प्रधानमंत्री ने सेंत-मेंत में बचत करने का प्रवचन नहीं दिया है। इसके पीछे कोई बड़ा कारण है, जो अभी देश को नहीं बताया जा रहा।
इसलिए किसी भी आपात स्थिति की घोषणा से पहले ही अपना घर और तिजोरी भर ली जाए। इसलिए जिनके पास भी इतनी दौलत है कि वे बढ़ती महंगाई से बेपरवाह सोना-चांदी खरीद सकें, उन्होंने खरीद ली। इधर सरकार ने यह बता दिया है कि पिछले एक महीने में ही महंगाई दोगुनी से ज्यादा बढ़ गई है। ईंधन, बिजली और कच्चे पेट्रोलियम की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के चलते अप्रैल में थोक महंगाई दर बढ़कर 8.30प्रतिशत पहुंच गई। मार्च में यह 3.88प्रतिशत थी। अमूल और मदर डेयरी ने भी दूध में दो रूपए की बढ़ोतरी कर दी है। इस महंगाई का असर सीधे-सीधे रोज के भोजन-पानी पर पड़ने वाला है, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं। आम जनता हर दिन इस महंगाई से जूझ ही रही है।
अब न कोई रामदेव सामने आ रहे हैं जो बता सकें कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर कितना काला धन वापस आया और पेट्रोल-डीजल कितना सस्ता हुआ या रूपए की कीमत कितनी चढ़ी। क्योंकि 2014 से पहले रामदेव सरीखे जितने लोग ऐसे भ्रमित करने वाले बयान देते थे, उन सबके अपने हित सध चुके हैं। अब आम जनता की दुख-तकलीफ से किसी को कोई लेना-देना नहीं है। देश एक ऐसे कमजोर प्रधानमंत्री के शासन का खामियाजा भुगत रहा है, जो अपनी मर्जी से यह तय नहीं कर सकते कि हमें अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए कहां से तेल खरीदना है और कहां से नहीं।
पाठक जानते हैं कि अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने की पाबंदी लगा दी है और बात न मानने पर टैरिफ थोपने की धमकी दी है। ईरान पर युद्ध के बाद जब होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद हुआ और इस रास्ते से आने वाले तेल की आपूर्ति बाधित हुई तो अमेरिका ने सबसे पहले 5 मार्च को भारत के लिए एक विशेष छूट जारी की थी। इसके तहत भारतीय रिफाइनरों को जहाजों में लदे रूसी तेल को खरीदने की अनुमति दी गई थी। एक हफ्ते बाद अमेरिका की ओर से दी गई इस छूट का दायरा वैश्विक स्तर तक बढ़ा दिया गया। एक बार विस्तार मिलने के बाद अब यह छूट 16 मई को समाप्त होने वाली है। शनिवार यानी 16 मई के बाद अमेरिका की पाबंदियों में मिली छूट को अगर आगे नहीं बढ़ाया जाता है तो भारतीय तेल रिफाइनरों के लिए मुश्किल पैदा होगी। उन्हें रूसी कच्चे तेल का आयात कम करने पर मजबूर होना पड़ सकता है। अमेरिका से मिली छूट के कारण मई महीने में अब तक रूसी तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर यानी 23 लाख बैरल प्रतिदिन रहा है। लेकिन, मॉस्को से कच्चा तेल लेकर अगर कोई नया जहाज भारत की ओर आता हुआ नहीं दिखता है तो स्थिति बदलेगी। उस स्थिति में पूरे महीने का कुल आयात घटकर 19 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिर सकता है।
जुलाई 2024 तक भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 44.6 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी। हालांकि, अमेरिकी दबाव और टैरिफ नीतियों के कारण जनवरी 2026 तक यह घटकर 20.6प्रतिशत रह गई।
यह बात पढ़ने-सुनने में ही कितनी अपमानजनक लगती है कि अमेरिका ने हमें कुछ दिनों की मोहलत दी कि हम रूस से तेल आयात करें और अब हम फिर उसी मोहलत के मोहताज बने हैं। मानो हम अमेरिका के कोई उपनिवेश हैं या ट्रंप हमारा शासक है। नरेन्द्र मोदी को इस समय कायदे से अमेरिका को भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता का पाठ पढ़ा देना चाहिए कि हमारे देश को इस समय रूस से तेल खरीदने की जरूरत है और हम ऐसा ही करेंगे। बस इसके आगे किसी और घुड़की में नहीं आना चाहिए। इस समय मोदी के लिए यह कहना मुमकिन हो भी सकता है, क्योंकि अब रूस ने भी भारत का साथ दिया है। भारत में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शामिल होने से पहले रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि 'तेल की आपूर्ति में भारत के हितों को कोई नुक़सान नहीं होगा। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यह अनुचित खेल, अनुचित मुक़ाबला हमारे अनुबंधों को प्रभावित न करें।' अमेरिका के जापान, भारत समेत अन्य देशों पर रूसी तेल न ख़रीदने के दबाव को अनुचित बताते हुए लावरोव ने कहा, 'यह औपनिवेशक (कॉलोनियल) या नव-औपनिवेशक तरीके हैं, आप इसे कुछ भी कह सकते हैं लेकिन यह दूसरों के शोषण करने के तरीकों की बात कर रहे हैं।'
इसके अलावा लावरोन ने कहा कि भारत की आज़ादी के बाद लंबे समय तक कोई भी पश्चिमी देश भारत की सैन्य क्षमता विकसित करने में मदद करने के लिए तैयार नहीं था। रूस ने भारत को न सिफ़र् हथियार उपलब्ध कराए बल्कि कई तरह के हथियारों के उत्पादन के लिए तकनीक भी साझा की। रूसी विदेश मंत्री यहां न केवल भारत को रूस की दोस्ती याद दिला रहे हैं, बल्कि शायद नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक का दौर भी याद दिला रहे हैं, जब अमेरिका के आगे रुस को ही भारत ने तरजीह दी।
जानकारों का भी मानना है कि इस समय रूस से तेल खरीदना ही हमारे लिए फायदेमंद है, क्योंकि जिन भी देशों से हम तेल ख़रीदते हैं वह इतने बड़े नहीं हैं कि वह रूस के बराबर तेल दे सकें। हमें तुरंत रूस से अनुबंध करना चाहिए और अमेरिका के गुस्से की ज़रा भी परवाह नहीं करनी चाहिए।