तमिलनाडु में सत्ता का बेवजह विवाद
वाकई देश में एक अजब मुकाम पर आ पहुंचा है कि जहां चुनाव से पहले ही ऐलान हो जाता है कि आएगा तो मोदी ही और इस घोर अलोकतांत्रिक रवैये पर अब जनता ने सवाल उठाना भी छोड़ दिया है।;
हाल में संपन्न चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत के बाद एक जबरदस्त कटाक्ष सोशल मीडिया पर पढ़ने मिला कि ये तो मोदीजी का बड़प्पन है कि चुनाव करवाने के बाद भाजपा को विजेता दिखाते हैं। वाकई देश में एक अजब मुकाम पर आ पहुंचा है कि जहां चुनाव से पहले ही ऐलान हो जाता है कि आएगा तो मोदी ही और इस घोर अलोकतांत्रिक रवैये पर अब जनता ने सवाल उठाना भी छोड़ दिया है। जब पहले से तय है कि आएगा तो मोदी ही, तो उसके बाद भी चुनाव की लंबी-चौड़ी, खर्चीली प्रक्रिया की औपचारिकता निभाना वाकई बड़प्पन ही है। कम से कम लोकतांत्रिक, निष्पक्ष चुनाव का भरम तो बना ही हुआ है। इसी भरम के सहारे भाजपा या चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वालों को जवाब भी मिलता है कि अगर निष्पक्ष चुनाव नहीं होते तो कहीं-कहीं कांग्रेस या दूसरे दलों को जीत कैसे मिलती है। यानी एकाध जगह अगर भाजपा के खिलाफ कोई जीत गया तो उसे ही चुनाव आयोग और भाजपा की निष्पक्षता के सबूत के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन विपक्ष के जीते हुए राज्यों में भी भाजपा किस तरह खेल करती है, इसका ताजा उदाहरण तमिलनाडु से सामने आ रहा है।
इस बार तमिलनाडु में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। 243 सीटों की विधानसभा के चुनाव में टीवीके ने कुल 108 सीटें हासिल की है, जबकि बहुमत का आंकड़ा 118 का है। कांग्रेस ने 5 सीटों के साथ टीवीके को समर्थन का ऐलान कर दिया है, फिर भी बहुमत के लिए जरा सी कसर बाकी है। ऐसा नहीं है कि इस तरह की नौबत पहली बार किसी राज्य में हुई हो, जिस पर फैसला लेने में वक्त लग रहा हो। त्रिशंकु विधानसभा या लोकसभा की स्थिति कई बार बनी है। लेकिन आम तौर पर इसमें सबसे बड़ा दल ही सरकार बनाने का दावा पेश करता है और राज्यपाल उसे स्वीकार भी कर लेते हैं। तमिलनाडु में भी टीवीके नेता विजय ने बुधवार को तमिलनाडु के कार्यवाहक राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से मुलाकात की और सरकार बनाने का दावा पेश किया। लेकिन तब राज्यपाल ने विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया और कहा कि स्थिर सरकार के लिए जरूरी है कि आप बहुमत दिखाने के लिए साथ देने वाले विधायकों के हस्ताक्षर लेकर आएं।
अब इतनी जल्दी तो हस्ताक्षर जुटाए नहीं जा सकते, लिहाजा विजय गुरुवार को भी राज्यपाल के पास पहुंचे और करीब 45 मिनट की मुलाकात में फिर सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए भरोसा दिलाया कि वे बहुमत साबित कर लेंगे। लेकिन उन्हें दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तरह राज्यपाल श्री अर्लेकर ने कहा कि पहले विधायकों के साइन लेकर आओ। जबकि यह राज्यपाल का काम नहीं है कि वह सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी से बहुमत साबित करने कहे, यह काम विधानसभा फ्लोर टेस्ट में होता है। अगर विजय मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बहुमत साबित नहीं कर पाते, तब तो उन्हें सत्ता पर बैठने का हक नहीं है। लेकिन उससे पहले ही उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न करके एक गलत मिसाल पेश की जा रही है।
इस बीच कई किस्म के कयास लगने शुरु गए, जैसे एआईएडीएमके और डीएमके मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर देंगे, या विजय को एआईएडीएमके के कुछ विधायक भी समर्थन दे सकते हैं, आदि, आदि। दरअसल एआईएडीएमके के कई विधायकों को पुडुचेरी के एक निजी होटल में ठहराया गया है। खबरों के मुताबिक एआईएडीएम के एक गुट का मानना है कि पार्टी को टीवीके का समर्थन करना चाहिए, जबकि दूसरा गुट इसके $िखलाफ़ है। इस मुद्दे पर पार्टी के महासचिव ईके पलानीस्वामी की अध्यक्षता में बुधवार को एक बैठक हुई। हालांकि, एआईएडीएमके के पूर्व मंत्री केपी मुनुस्वामी ने कहा है कि टीवीके को एआईएडीएमके का समर्थन मिलने की ख़बर झूठी है।
वहीं डीएमके ने भी कहा है कि वह सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने साफ शब्दों में कहा है कि विजय को सरकार बनाने दी जाए। स्टालिन ने कहा कि डीएमके अगले छह महीने तक बिना किसी हस्तक्षेप के नयी सरकार को देखेगी और उसके बाद कोई फैसला लेगी। स्टालिन ने संकेत दिया कि फिलहाल डीएमके राज्य में ना तो संवैधानिक संकट चाहती है और ना ही जल्द दोबारा चुनाव। उन्होंने कहा कि नई सरकार को उनकी सरकार की शुरू की गई योजनाओं को जारी रखना चाहिए और टीवीके के चुनावी वादों को भी पूरा करना चाहिए। एम के स्टालिन ने विजय को मुख्यमंत्री बनाने की बात कह कर एक नैतिक साहस दिखाया है। जो संघ से दीक्षित राज्यपाल अर्लेकर नहीं दिखा पा रहे हैं। दरअसल उन्हें केवल संविधान के अनुसार चलना है, लेकिन भाजपा के विरोधी दलों को सत्ता से दूर रखने के लिए वे यह भी नहीं कर पा रहे हैं।
इस मामले पर अब तमिलनाडु में सियासत तेज हो गई है। डीएमके के साथ गठबंधन में रही कांग्रेस ने टीवीके का साथ तो दिया ही है, बाकी दल भी जो टीवीके के साथ नहीं हैं, वे भी राज्यपाल पर सवाल उठा रहे हैं। माकपा महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा है कि 'टीवीके को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में चुना गया है। तमिलनाडु के राज्यपाल विजय को अपना दावा पेश करने के लिए क्यों नहीं बुला रहे हैं? इससे काफी संदेह पैदा होता है। तमिलनाडु के राज्यपाल को लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करना चाहिए।Ó वहीं वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने कहा कि मैं राज्यपाल से अनुरोध करता हूं वे टीवीके अध्यक्ष जोसेफ विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें, क्योंकि यह जनता का जनादेश और उनका संवैधानिक अधिकार दोनों है।
इधर कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा- 'राज्यपाल, जो संवैधानिक ज्ञान के भंडार माने जाते हैं, उनके पास तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है। वास्तव में, कानून, परंपरा, संवैधानिक संस्कृति और संवैधानिक स्वरूप के अनुसार, ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। किसी अन्य दल ने तो दावा भी नहीं किया है। सीटों की कमी केवल 7-8 सीटों की है, और राज्यपाल हमेशा यही कहते रहेंगे कि सदन में 10-12 दिनों में बहुमत साबित हो जाएगा। तो फिर समस्या क्या है? संवैधानिक मानदंडों और परंपराओं का इस तरह से उल्लंघन या उन्हें कमजोर करना बेहद निंदनीय है, और मैं यह बात बड़े खेद के साथ कह रहा हूं। यह बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था...।'
तमिलनाडु के इस पूरे सियासी खेल में भाजपा परिदृश्य में कहीं नहीं है, लेकिन माना यही जा रहा है कि यह सारा खेल उसके इशारों पर ही हो रहा है। क्योंकि एआईएडीएमके के जरिए वह किसी न किसी तरह सत्ता पर आने की कोशिश में लगी हुई है।