सवालों से बचते प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी छवि चमकाने के लिए चाहे कई करोड़ रूपए खर्च कर दें या प्रचार के नए तरीकों का सहारा लें, दुनिया उन्हें अब एक ऐसे कमजोर नेता के तौर पर देख रही है,;

Update: 2026-05-19 21:30 GMT

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी छवि चमकाने के लिए चाहे कई करोड़ रूपए खर्च कर दें या प्रचार के नए तरीकों का सहारा लें, दुनिया उन्हें अब एक ऐसे कमजोर नेता के तौर पर देख रही है, जिसे सवालों से डर लगता है, जो सवाल सुनते ही मंच से चला जाता है। नॉर्वे में प्रधानमंत्री मोदी और नार्वेजियन प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त प्रेस बयान जारी किया, जिसके बाद वहां मौजूद पत्रकार हेले लिंग ने कहा कि 'प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया के सबसे आजाद प्रेस से कु छ सवाल क्यों नहीं ले रहे हैं?' लेकिन मोदी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया और मंच से चले गए। पत्रकार लिंग ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा कि उन्हें इसकी उम्मीद थी। उन्होंने नॉर्वे को विश्व प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में नंबर 1 और भारत के 157वें स्थान पर होने का जिक्र भी किया। लिंग के इस पोस्ट पर ढेर सारी टिप्पणियां आईं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपनी राय व्यक्त की थी कि जब कुछ छिपाने को नहीं है, तो डर कैसा। उन्होंने कहा कि इससे भारत की छवि पर असर पड़ता है।

राहुल गांधी ने कुछ गलत नहीं कहा, क्योंकि मोदी मंच से उतरने की जगह रुकते और कहते कि पूछिए क्या सवाल हैं आपके, तो शायद उनकी मजबूत छवि नजर आती। लेकिन मंच से सिर झुका कर उतरते प्रधानमंत्री लाचार दिखे। ऐसे ही अमेरिका में पिछले साल राष्ट्रपति ट्रंप के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में नरेन्द्र मोदी से अडानी मसले पर सवाल पूछा गया था तो उन्होंने हाथ हिला-हिला कर भारत की वसुधैव कुटुंबकम परंपरा, लोकतंत्र आदि की बातें कर अपनी असहजता को ढंकने की असफल कोशिश की थी। अब लगातार दूसरे साल वैश्विक स्तर पर मोदी सवाल से बचते नजर आए।

लेकिन यह मामला यहीं नहीं थमा। मोदी की छवि बचाने के फेर में विदेश मंत्रालय ने भी वही तरीका अपनाया जो मोदी ने अमेरिका में अपनाया था। दरअसल दोनों प्रधानमंत्रियों के संयुक्त प्रेस बयान के बाद विदेश मंत्रालय की प्रेस वार्ता हुई, जिसमें हेले लिंग ने विदेश मंत्रालय के सचिन सिबी जॉर्ज से पूछा कि दुनिया भारत पर भरोसा क्यों करे और क्या भारत में मानवाधिकार उल्लंघन बंद होंगे। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय मीडिया के कठिन सवालों का जवाब देना शुरू करेंगे। जिसके जवाब में सिबी जॉर्ज ने कहा कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि पांच हजार साल पुरानी निरंतर सभ्यता है। भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है और कोरोना महामारी के समय भारत ने खुद को दुनिया से अलग नहीं किया, बल्कि जरूरतमंद देशों की मदद के लिए आगे आया। यही भरोसा दुनिया को भारत पर विश्वास दिलाता है। लेकिन जॉर्ज के जवाब देने के बीच में पत्रकार ने प्रतिप्रश्न करना चाहा तो सिबी जॉर्ज नाराज हो गए और कहा, कृपया मुझे बीच में मत टोकिए। सवाल पूछने वाला यह तय नहीं कर सकता कि जवाब किस तरीके से दिया जाए। इसके बाद सिबी जॉर्ज ने कहा कि भारत दुनिया की कुल आबादी का लगभग छठा हिस्सा है, लेकिन दुनिया की समस्याओं का छठा हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान लोगों को मौलिक अधिकार देता है और देश में महिलाओं को बराबरी का अधिकार आजादी के वक्त से मिला हुआ है। जबकि कई देशों में महिलाओं को यह अधिकार दशकों बाद मिला। सिबी जॉर्ज ने कहा, 'हम समानता में विश्वास करते हैं, हम मानवाधिकारों में विश्वास करते हैं। अगर किसी के अधिकारों का उल्लंघन होता है तो उसे अदालत जाने का अधिकार है। हमें अपने लोकतंत्र पर गर्व है।' सिबी जॉर्ज ने यह भी कहा कि कई लोग भारत की मीडिया का दायरा समझे बिना टिप्पणी कर देते हैं। दिल्ली में ही सैकड़ों समाचार चैनल हैं, जो अलग-अलग भाषाओं में लगातार खबरें दिखाते हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्ट पढ़कर लोग भारत पर सवाल उठाने लगते हैं, जबकि उन्हें भारत की वास्तविकता और उसके पैमाने की समझ नहीं है।

प्रधानमंत्री का सवालों से बचना, मानवाधिकार उल्लंघन और भारत की साख पर किए गए सवालों के सीधे जवाब देने की जगह पांच हजार साल पुरानी सभ्यता, लोकतंत्र की प्राचीन जड़ें, महिलाओं के अधिकार, अदालत जाने का हक और मीडिया का दायरा जैसी अनावश्यक लफ्फाजी के बावजूद विदेश मंत्रालय मोदी की साख बचाने के उद्देश्य में नाकामयाब रहा और क्योंकि इस प्रकरण पर अब वैश्विक स्तर पर चर्चा हो रही है। मोदी समर्थक भले ही हेले लिंग को सोशल मीडिया पर ट्रोल कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि वे केवल सवाल पूछने के पत्रकारिता के अधिकार और धर्म को ही निभा रही थीं, इसके अलावा उनका कोई और एजेंडा नहीं है।

मोदी सवालों से बचे तो लोग अब इंदिरा गांधी और पं.नेहरू के पुराने साक्षात्कार निकाल कर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, जिसमें वे विदेशी पत्रकारों के खुले सवालों का सामना शांति और गरिमा से कर रहे हैं। यह बात भी मोदी के खिलाफ ही जाएगी, क्योंकि फिर तुलना की जाएगी कि असली हिम्मतवाला नेतृत्व कौन सा है और दिखावे वाला कौन सा है। वैसे नॉर्वे से पहले नीदरलैंड्स में भी भारत के हालात पर टिप्पणी हुई, तब भी विदेश मंत्रालय ने ऐसा ही जवाब दिया था।

पांच देशों की यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड और स्वीडन के बाद नॉर्वे पहुंचे और दौरे का आखिरी पड़ाव इटली होगा। नीदरलैंड्स में जब मोदी पहुंचने वाले थे, उससे पहले वहां के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन ने कहा कि 'डच सरकार भारत में हो रहे घटनाक्रमों को लेकर चिंतित है और यह चिंता पूरे यूरोप में है।' इस पर रविवार को भारत के विदेश मंत्रालय की ब्रीफ़िंग में जब नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर एक डच पत्रकार की ओर से सवाल किए गए तो भारत ने कहा कि ये दिखाता है कि भारत के बारे में लोगों में जानकारी की कमी है।

यानी कोई आपकी कमी दिखाए तो आप कह दें कि आप हमें जानते नहीं हैं। मान लें विदेश मंत्रालय का ऐसा जवाब देना उचित है, तो फिर भी सवाल उठता है कि अगर भारत के बारे में लोग जानते नहीं हैं, तो फिर यह जानकारी देना भी तो विदेश मंत्रालय और उसके अधीन आने वाले दूतावासों का काम है। 12 सालों में सैकड़ों विदेश यात्राएं कर चुके नरेन्द्र मोदी दुनिया को भारत का सच क्यों नहीं दिखा पाए, यही तो आज का ज्वलंत सवाल है। 

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