सोनम वांगचुक की रिहाई के मायने

क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा भी अब भाजपा की सुविधा के अनुसार तय होगी, यह गंभीर सवाल पर्यावरण कार्यकर्ता और मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक की रिहाई के फैसले के बाद उठा है

By :  Deshbandhu
Update: 2026-03-16 02:29 GMT

क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा भी अब भाजपा की सुविधा के अनुसार तय होगी, यह गंभीर सवाल पर्यावरण कार्यकर्ता और मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक की रिहाई के फैसले के बाद उठा है। 26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को हिरासत में लिया गया था। पहले तो यह सरकार यह बताने ही तैयार नहीं थी कि वे किस जेल में रखे गए हैं। फिर बताया गया कि वे जोधपुर जेल में हैं। सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) लगाया था। लेकिन शनिवार को अचानक मोदी सरकार को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि अब वांगचुक देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं हैं और उनकी रिहाई का आदेश दिया गया।

पहले तो यह बात समझ से परे थी कि अपने राज्य के हक की बात करने में देश की सुरक्षा को कैसे खतरा हो सकता है। बता दें कि 2019 में जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग करने और उसे केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला मोदी सरकार ने लिया था। तब वहां की जनता को भरोसा दिलाया गया था कि अब उन्हें अच्छे से हक मिलेंगे और उनके राज्य की तरक्की होगी। लेकिन लद्दाखी जनता से किए वादे केंद्र सरकार ने पूरे नहीं किए और न ही उनकी मांगों का अब तक कोई समाधान निकाला गया।

लद्दाख के लोगों की कुछ प्रमुख मांगें हैं, जैसे-लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले। संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, ताकि आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा मिले। लेह और करगिल दोनों के लिए अलग-अलग परिषद हों और सरकारी नौकरियों की खाली जगहें भरी जाएं।

इन्हीं मांगों को लेकर सोनम वांगचुक बीते साल से अलग-अलग मौक़ों पर आमरण अनशन और दिल्ली तक मार्च कर चुके हैं। अक्तूबर 2024 में उन्होंने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और इसे छठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाला था। हालांकि दिल्ली पुलिस ने सिंधु बॉर्डर से उन्हें हिरासत में ले लिया था। साल 2025 में इसी मांग को लेकर 35 दिन की उनकी भूख हड़ताल के 15वें दिन 24 सितंबर को लेह में आंदोलन हिंसक हो गया जिसमें 4 लोगों की मौत हो गई थी और तक़रीबन 50 लोग घायल हुए थे। इसके लिए सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराते हुए और उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए हिरासत में लिया गया।

उनकी हिरासत पर सवाल उठाते हुए उनकी पत्नी गीतांजलि जे एंग्मो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन इस पर सरकार बार-बार टालमटोल कर रही थी। आखिरकार न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ ने कह दिया था कि वे 17 मार्च को इस पर अंतिम सुनवाई करेंगे। पीठ ने यह भी कहा था कि सोनम वांगचुक के भाषणों के वीडियो इस बृहस्पतिवार को देखेंगे और उन्होंने रजिस्ट्रार से स्क्रीनिंग की व्यवस्था करने को कहा था। हालांकि केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख प्रशासन की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने कहा था कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अस्वस्थ हैं और उन्होंने मामले में सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया है। लेकिन वांगचुक की पत्नी एंग्मो की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि मामले में बार-बार स्थगन से देश में 'गलत संदेश' जा रहा है। इसके बाद न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने कहा, 'हम यह बिल्कुल स्पष्ट कर रहे हैं कि चाहे कुछ भी हो, हम अंतिम सुनवाई के बाद अगले मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रखेंगे। हम किसी भी नये बिंदु पर बहस की अनुमति नहीं देंगे और सॉलिसिटर जनरल, केवल कपिल सिब्बल द्वारा अपने जवाबी तर्क में उठाए गए नये बिंदुओं पर बहस कर सकते हैं।'

बता दें कि सोनम वांगचुक के भाषणों में ही केंद्र सरकार को देशविरोधी साजिश नजर आ रही थी। लेकिन इससे पहले कि अदालत इन्हें सुनकर कोई राय बनाती, सरकार ने पहले ही वांगचुक की रिहाई का आदेश दे दिया।

कानूनी तौर पर यह उनकी पत्नी और समर्थकों के लिए बड़ी जीत है। लेकिन यहां चिंता की एक बड़ी बात यह है कि आखिर भाजपा अपनी सुविधानुसार कब तक लोगों के अधिकारों के साथ ऐसा खेल करेगी। मोदी सरकार को सोनम वांगचुक के भाषण पसंद नहीं आए तो उन्हें जेल में डाल दिया, फिर लगा होगा कि एक साथ विरोध के कई मोर्चे खुल गए हैं। एक तरफ ईरान जंग के कारण देश में ईंधन का संकट है, दूसरी तरफ एपस्टीन फाइल्स पर विपक्ष के सवाल हैं, इनके बीच पांच राज्यों के चुनाव भी हैं, तो वांगचुक की रिहाई कर अपने लिए थोड़ी आसानी शायद भाजपा ने बनाई है। इसी तरह पंजाब चुनाव के फायदे को ध्यान में रखकर अरविंद केजरीवाल पर लगे सारे आरोप भी खारिज हो गए। इसमें फैसला भले अदालत ने दिया, लेकिन आबकारी घोटाले में सबूत पेश करने का काम जांच एजेंसी का था, जो उसने नहीं दिए। अब शायद किसी दिन उमर खालिद की रिहाई भी संभव हो जाए, क्योंकि उन्हें भी पांच सालों से कैद रखा गया है और बार-बार जमानत टलवाई जा रही है।

वैसे वांगचुक की रिहाई के लिए सरकार ने काफी सोच समझ कर कारण सामने रखा है, सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है, 'सरकार लद्दाख में विभिन्न हितधारकों और समाज के नेताओं के साथ सक्रिय रूप से संवाद कर रही है ताकि क्षेत्र के लोगों की आकांक्षाओं और चिंताओं का समाधान किया जा सके। सरकार लद्दाख में शांति, स्थिरता और आपसी विश्वास का वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि सभी हितधारकों के साथ रचनात्मक और सार्थक संवाद को सुगम बनाया जा सके। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए सोनम वांगचुक की हिरासत तत्काल प्रभाव से रद्द करने का निर्णय लिया है।'

अब सोचने वाली बात ये है कि रचनात्मक संवाद का यही तरीका शुरु से क्यों नहीं अपनाया गया। क्यों लोगों को बार-बार छले जाने का अहसास होता है और वे सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं। अभी सोमवार 16 मार्च को भी केंद्र सरकार से लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन करने वाले हैं। लद्दाख की लेह एपेक्स बॉडी यानी एलएबी और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस यानी केडीए का कहना है कि सोनम वांगचुक की रिहाई एक मुद्दा था, लेकिन मुख्य मांगें अभी पूरी नहीं हुई हैं। लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और विकास की मांगें अभी बाक़ी हैं। दो अन्य एक्टिविस्ट सितंबर 2025 से जेल में हैं। इसलिए प्रदर्शन 16 मार्च को होगा।'

यानी लोगों का और विरोध सहने के लिए भाजपा को तैयार रहना चाहिए।

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