नए ऐतिहासिक मोड़ पर न्यायपालिका
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के बीच हुआ संवाद न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।;
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के बीच हुआ संवाद न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। कथित आबकारी घोटाला मामले में 21 मार्च 2024 को प्रवर्तन निदेशालय ने अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया था। मई से सितंबर 2024 के बीच उन्हें अंतरिम जमानत मिली और अंतत: रिहाई हुई। लगभग दो साल बाद फरवरी 2026 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण अरविंद केजरीवाल को तमाम आरोपों से बरी कर दिया। लेकिन प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई इस फैसले से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि अदालत ने सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया, इसलिए उन्होंने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। लेकिन हाईकोर्ट में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के समक्ष मामला जाने से श्री केजरीवाल ने असंतोष दिखाया। अरविंद केजरीवाल अपनी पैरवी खुद कर रहे हैं और इस सोमवार उन्होंने जस्टिस शर्मा के सामने ही यह मांग रखी कि वे खुद को इस मुकदमे अलग करें।
अदालत में अरविंद केजरीवाल ने तर्क दिया कि जस्टिस शर्मा ने ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है जो भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों द्वारा आयोजित किए गए थे, जिससे उनके मन में न्याय मिलने को लेकर आशंका पैदा होती है कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलने का डर है। श्री केजरीवाल ने कहा कि कानून के अनुसार केवल 'पूर्वाग्रह की उचित आशंका' ही किसी जज के केस से हटने के लिए पर्याप्त आधार है। उन्होंने जज के 'रिक्यूज़ल' यानी खुद को मामले से अलग करने के सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले का ज़िक्र किया जिसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह ज़रूरी नहीं है कि कोई जज पक्षपाती हो, लेकिन अगर पार्टियों के मन में कोई वाजिब शक है तो यह रिक्यूज़ल का मामला बनता है।
इस बारे में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायाधीश स्वर्णकांता शर्मा ने फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा, 'मैंने खुद को सुनवाई से अलग रखने यानी रिक्यूज़ल से जुड़े कानून के बारे में बहुत कुछ सीखा। मेरी जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझसे खुद को सुनवाई से अलग रखने के लिए कहा है। लेकिन मैंने इसके बारे में बहुत कुछ सीखा। मुझे उम्मीद है कि मैं एक अच्छा फैसला दे पाऊंगी।'
अब गुरुवार को अरविंद केजरीवाल ने एक और नया हलफनामा अदालत में दाखिल किया है, जिसमें साफ कहा गया है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे केंद्रीय सरकारी पैनलों में हैं, यानी वरिष्ठ अधिवक्ता और मोदी सरकार के सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता के अधीन काम कर रहे हैं। तुषार मेहता उन्हें मामले सौंपते हैं। ऐसी स्थिति में माननीय जज के लिए तुषार मेहता के खिलाफ कोई आदेश पारित करना कठिन होगा। इसलिए अन्य कारणों के साथ-साथ, माननीय न्यायाधीश को इस मामले से स्वयं को अलग कर लेना चाहिए। हलफनामे में दावा किया गया है कि चूंकि केंद्र सरकार इस मामले में एक पक्ष है, इसलिए इससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। याचिका में कहा गया है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। जब जज साहिबा के करीबी सदस्य उस पक्ष (केंद्र सरकार) के साथ पेशेवर रूप से जुड़े हों जिससे संबंधित मामला सुना जा रहा है, तो यह 'उचित निष्पक्षता' के सिद्धांत के खिलाफ है।
अब इस मामले में आगे क्या होता है और किस तरह दिल्ली हाईकोर्ट में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ सुनवाई होती है, क्या जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इस मामले की सुनवाई करेंगी या श्री केजरीवाल की मांग सुनते हुए अलग हो जाएंगी, यह देखना दिलचस्प होगा। मगर इतना तय है कि अब यह मामला कानूनी और राजनैतिक पहलू से बढ़कर भारतीय लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुका है। इस मामले ने न्यायपालिका, कार्यपालिका के बीच शक्ति-संतुलन, जांच एजेंसियों के राजनैतिक इस्तेमाल और विधिक प्रक्रिया की शुचिता और सक्रियता से जुड़े गंभीर प्रश्नों को जन्म दिया है। इस मामले का अंतिम परिणाम चाहे जो भी हो, इतना तय है कि यह आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक बहसों को दिशा देगा और भावी सुनवाइयों के लिए मिसाल भी बनेगा। दरअसल स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान केवल चुनावों या सरकारों तक सीमित नहीं होती है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत पारदर्शिता के पैमाने पर भी लोकतंत्र को परखा जाता है। भारतीय न्याय व्यवस्था में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनसे राजनैतिक, संवैधानिक और संस्थागत संतुलन की परिभाषा नए सिरे से तय हुई है। साथ ही न्यायपालिका किस तरह हरेक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षक है, इसकी भी मिसालें सामने आई हैं।
1980 के दशक की शुरुआत में, सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस पी.एन. भगवती ने पहली बार एक पोस्टकार्ड या साधारण पत्र को रिट याचिका के रूप में स्वीकार किया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गरीब, अशिक्षित या वंचित लोग, जो अदालत तक नहीं पहुंच सकते, वे सिर्फ एक पोस्टकार्ड लिखकर अपनी समस्याओं या अन्याय को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा सकें और उन्हें न्याय मिल सके। इस प्रक्रिया ने न्यायपालिका के दरवाजे आम आदमी के लिए खोल दिए, जिसे बाद में 'एपिस्टोलरी जूरिस्डिक्शन' कहा गया। 'एपिस्टोलरी जूरिस्डिक्शन' भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय की वह शक्ति है, जिसके तहत न्यायालय किसी पीड़ित या जनहितैषी व्यक्ति द्वारा लिखे गए एक साधारण पत्र, टेलीग्राम या पोस्टकार्ड को 'रिट याचिका' के रूप में स्वीकार कर कार्यवाही शुरू कर सकता है।
जस्टिस भगवती के इस फैसले ने यह साबित किया कि न्याय प्रक्रिया केवल कानून की किताबों में दर्ज परिभाषाओं और सिद्धांतों से बंधी नहीं होती है, समय और परिस्थितियों के अनुरूप कभी ऐसे फैसले भी लेने पड़ते हैं, जो आज से पहले कभी नहीं हुए। क्योंकि न्यायपालिका का अंतिम मकसद न्याय करना और न्याय होते हुए दिखाना भी है। अगर जरा भी पक्षपात का संदेह रहे, किसी विशेष विचारधारा के प्रभाव में आकर न्यायाधीश फैसला कर रहे हैं, ऐसा शुबहा रहे, तो उसे दूर करना भी न्यायपालिका की ही जिम्मेदारी बनती है। केजरीवाल प्रकरण ने न्यायपालिका में एक ऐसा मोड़ ला दिया है, जिसके आगे शायद नया इतिहास लिखा जाएगा।