मोदी ने तोड़ा देश का भरम
इस बात में अब कोई किं तु-परंतु नहीं रह गया कि भारत की विदेश नीति को नरेन्द्र मोदी ने पूरी तरह बदल दिया है
इस बात में अब कोई किं तु-परंतु नहीं रह गया कि भारत की विदेश नीति को नरेन्द्र मोदी ने पूरी तरह बदल दिया है। मोदी सरकार ने नयी प्राथमिकताएं तय की हैं और अब उन्हीं के हिसाब से विदेश नीति, रक्षा नीति के फैसले लिए जा रहे हैं। रविवार तक थोड़ा भरम बना हुआ था कि शायद भारत के पुराने मित्र देशों के बारे में नरेन्द्र मोदी विचार करें। जिन देशों के लोगों और नेताओं ने भारत की मुश्किल घड़ी में साथ दिया है, नैतिक संबल दिया है या भारत के सिद्धांतों का सम्मान किया है, कम से कम मोदी सरकार उन्हें अपनी क्षुद्र राजनीति से परे रखेगी। लेकिन रविवार रात तक यह भरम भी चकनाचूर हो गया।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों पर नरेन्द्र मोदी चुप रहे। उनकी इजरायल यात्रा के दो दिन बाद ही यह हमले हुए हैं, जिसमें लाखों भारतीयों की जान पर भी बन आई है, क्या उन्होंने उनकी परवाह भी नहीं की, ऐसे सवालों को मोदी ने अपने ठेंगे पर रखा। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने इस मौके पर ईरान का साथ देते हुए बयान दिए। उसके सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या पर शोक भी जताया और नाराजगी भी प्रकट की। मगर मोदी चुप ही रहे। एक देश के सर्वोच्च नेता की हत्या पर संवेदना के दो बोल कहना तो दूर, उन्होंने इस युद्ध का किसी तरह विरोध भी नहीं किया। मानो मोदी की सहमति भी इसमें है। इसके बाद रविवार रात सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) की अध्यक्षता की, लेकिन इसमें युद्ध के बाद खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों के बड़े समुदाय की सुरक्षा, इस क्षेत्र से होकर गुजरने वाले भारतीय यात्रियों और निर्धारित परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों को हो रही कठिनाइयां और क्षेत्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक-वाणिज्यिक गतिविधियों पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों की समीक्षा की गई। इसमें भी कहीं ईरान के साथ हुए धोखे पर कोई चिंता नहीं जताई गई है।
जानकारी के लिए बता दें कि ईरान पर हमले से दो दिन पहले 26 फरवरी गुरुवार को अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच जिनेवा में तीसरे दौर की वार्ता हुई थी। इसमें ओमान ने मध्यस्थता की थी। इस बैठक का एक ही मकसद था कि मध्यपूर्व में जंग को टाला जाए। बताया जा रहा है कि इस बैठक में अमेरिका के प्रतिनिधि ने अपनी नई शर्तों की सूची ईरानी प्रतिनिधि को थमाई थी। इसमें पहली शर्त थी कि ईरान अपने तीनों एक्टिव परमाणु केंद्रों पर ताला लगा दे। दूसरी शर्त मिसाइल प्रोग्राम को भी बंद करे और तीसरी शर्त अमेरिका की थी कि ईरान हमास जैसे संगठनों को जो समर्थन कर रहा है, उसे भी बंद कर दे। ईरान ने जाहिर तौर पर ये शर्तें नहीं मानीं लेकिन आयातुल्ला अली खामेनेई के एक सलाहकार ने कहा भी था कि यदि जिनेवा वार्ता का विषय सिर्फ परमाणु हथियार न बनाने तक सीमित रहता है तो दोनों देशों के बीच तुरंत समझौता हो सकता है। वैसे भी ईरान हमेशा से परमाणु हथियारों से इनकार करता रहा है। उसका कहना है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद नहीं कर सकता, क्योंकि ऊर्जा जरूरतों को पूरी करने के लिए ये जरूरी हैं। इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अल बुसादी ने भी कहा था कि बैठक में सकारात्मक संदेश दिख रहे हैं। अगर सब कुछ सही रहा तो आगे चलकर सौदे की उम्मीद नजर आ रही है। उन्होंने अगले हफ्ते विएना में फिर से बातचीत का इशारा किया था। यानी अगर युद्ध न छिड़ता तो शायद अभी विएना में वार्ता को सफल बनाने की कोशिश होगी। जिनेवा बैठक के बाद ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी कहा था कि अब तक जितनी भी वार्ता हुईं, उनमें ये बातचीत सबसे गंभीर थी। लेकिन इसके बाद ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ मिलकर ईरान पर हमले शुरु किए जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी हैं।
नरेन्द्र मोदी चाहते तो इस पर भी भारत की तरफ से राय दे सकते थे कि वार्ता की कोशिश से मुद्दे सुलझाना चाहिए, युद्ध किसी बात का समाधान नहीं है। लेकिन विडंबना यही है कि मोदी अब इस युद्ध के समर्थन में खड़े हैं। उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की, और अंग्रेजी के साथ-साथ हिब्रू में पोस्ट लिखकर बता दिया कि मोदी नेतन्याहू से दोस्ती निभाते रहेंगे। सवाल ये है कि जिस नेतन्याहू से इस हमले के बाद ट्रंप को छोड़ किसी अन्य देश के मुखिया ने बात करना जरूरी नहीं समझा, वहां मोदी की कौन सी मजबूरी थी। इजरायल जाकर गज़ा में मारे गए लोगों के लिए मोदी ने कुछ नहीं कहा था और अब ईरान में मारे गए लोगों के लिए भी चुप हैं। बेंजामिन नेतन्याहू को तो अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक ने युद्ध अपराधी घोषित किया हुआ है और कई देशों में उन पर इसी वजह से प्रतिबंध लगे हैं। नेतन्याहू इजरायल से बाहर निकलते ही गिरफ्तार किए जा सकते हैं। मगर ऐसे अपराधी का साथ देकर मोदी गदगद हैं। अमेरिका की कठपुतली बनना काफी नहीं था, जो अब इजरायल के इशारों पर नाचने की सहमति बन गई है।
मोदी ने यूनाइटेड अरब अमीरात के प्रेसिडेंट शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से भी फोन पर बात की, और वहां हुए हमलों की निंदा की। जबकि मोदी अच्छे से जानते हैं कि ये हमले ईरान की जवाबी कार्रवाई में हुए। यानी मोदी अब खुलकर ईरान के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। इसका अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत को कितना नुकसान होगा, यह तो वक्त बता ही देगा। फिलहाल आर्थिक नुकसान की खाई में भी देश को धकेल दिया गया है। रविवार के बाद यह तय हो गया है कि नरेन्द्र मोदी की बातों पर रत्ती भर का यकीन नहीं किया जा सकता।
हर साल दो करोड़ रोजगार, सबके खाते में 15-15 लाख, काले धन की वापसी, आतंकवाद का खात्मा जैसे चुनावी वादों को तो छोड़िए, अपने शपथग्रहण में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके मोदी ने जो शांति और एकजुटता का गुब्बारा फुलाया था या नवाज शरीफ के घर अचानक पहुंचकर दावत में शामिल होकर दोस्ती का पैगाम दिया था, वो सब भी कितना खोखला था, यह दिख रहा है। पाकिस्तान से संबंध तो बिगड़े हुए हैं ही, बांग्लादेश में भारत विरोधी माहौल बन चुका है, नेपाल के साथ भी विवाद होने लगे हैं और श्रीलंका के साथ भी पूरी तरह विश्वसनीय संबंध नहीं हैं। चीन के सामने तो मोदी पहले ही समर्पण कर चुके हैं। अपने निकट पड़ोसियों के साथ संबंधों को मोदी बरकरार नहीं रख पा रहे और अमेरिका इसका फायदा उठाएगा यह तय है।
अभी मोदी ने अमेरिका के दबाव में रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, ट्रंप की मर्जी से देश में कारोबारी नीतियां बनेंगी यह भी दिख रहा है। लेकिन जैसे ईरान से बातचीत का मान ट्रंप ने नहीं रखा और उस पर हमला कर दिया, कल को भारत से वह किसी बात पर नाराज होकर ऐसी ही घुड़की दे, पाकिस्तान के जरिए या सीधे ही हमला करे तो भारत की मदद के लिए कौन आगे आएगा, क्या इस पर मोदी ने विचार किया है। या तब वो झोला उठाकर निकल जाएंगे, ये चिंता देश को करनी चाहिए।