संसद के दूसरे चरण में सरकार की मुश्किल
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार 9 मार्च से शुरु हुआ और पहले दिन ही मोदी सरकार विपक्ष के सवालों से बुरी तरह घिर गई
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण सोमवार 9 मार्च से शुरु हुआ और पहले दिन ही मोदी सरकार विपक्ष के सवालों से बुरी तरह घिर गई। इस बात का अनुमान पहले से था कि सत्र के पहले चरण की तरह दूसरे चरण में भी सरकार को कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा और यह अंदाज भी था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फिर खुद सामने न आकर अपने मंत्रियों को आगे करेंगे। ऐसा ही हुआ भी। सोमवार को संसद के दोनों सदनों में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान में चल रहे युद्ध और इस वजह से मध्यपूर्व में आए अभूतपूर्व संकट पर बयान दिए। लेकिन इस बयान में एक चयनित रूझान दिखा। सरकार ने केवल उन्हीं मुद्दों पर अपनी बात रखी, जिसमें उसे सुविधा हो, और असुविधाजनक बातों को बड़ी चतुराई से किनारे कर दिया गया। जैसे हजारों बरसों से जिस ईरान के साथ भारत के संबंध रहे हैं, उसके सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर संवेदना का एक लफ्ज़ सरकार ने सदन में नहीं कहा, हालांकि खामेनेई की मौत के छह दिन बाद जाकर विदेश सचिव ने ईरानी दूतावास में शोक संदेश लिखा। ईरान पर हमले की निंदा भारत सरकार ने नहीं की। हिंद महासागर में जिस ईरानी युद्धपोत पर हमला कर अमेरिका ने सौ से ज्यादा नौसैनिकों की जान ले ली, उस पर भी भारत सरकार ने ऐतराज नहीं जताया, जबकि ये नौसैनिक भारत के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास से लौट रहे थे। अमेरिका और इजरायल ने भारतीय मेहमानों की जान ली और मोदी सरकार इस पर भी चुप रही, इससे ज्यादा शर्मनाक बात नहीं हो सकती।
कायदे से सरकार को ईरान युद्ध और उसके प्रभाव की पूरी तस्वीर संसद में पेश करनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने आधी-अधूरी बात की और उस पर तुर्रा यह कि विपक्ष सवाल पूछे तो उसे गैरजिम्मेदाराना कहा जाए। बता दें कि विपक्ष ने सोमवार को संसद के दोनों सदनों में युद्ध और उसके समेकित प्रभाव से जुड़े सवाल सरकार से पूछने की मांग की, मगर इस मांग को लगातार नकारा गया, नतीजा यह हुआ कि राज्यसभा से विपक्ष ने बहिर्गमन किया। इसके लिए भी सरकार ने विपक्ष को ही दोषी ठहराया। इससे पहले जब राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपनी बात रखी तो सत्ता पक्ष की तरफ से लगातार हल्ला किया गया। हालांकि फिर भी खड़गे जी ने मांग रखी कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर उभरती चुनौतियों पर अल्पकालिक चर्चा हो। उन्होंने कहा, 'यह संघर्ष केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है; इसने अब भारत की ऊर्जा सुरक्षा और देश की छवि को प्रभावित किया है। इस संघर्ष के परिणाम हमारी आर्थिक स्थिरता पर भी असर डालेंगे।' उन्होंने खाना बनाने के गैस की कीमतों में वृद्धि, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रभाव का जिक्र किया।
यही बातें लोकसभा में भी विपक्ष उठाना चाह रहा था लेकिन उसे अनुमति नहीं मिली। जबकि यह हकीकत है कि ईरान पर इजरायल और अमेरिका का हमला और उस पर ईरान के पलटवार का खामियाजा केवल खाड़ी देश ही नहीं भारत भी उठा रहा है। इस इलाके में कम से कम एक करोड़ भारतीय रहते हैं, जिसमें अभी 67 हजार ही वापस आए हैं। बेशक भारत सरकार ने इनके लिए एडवायज़री जारी की है और इन्हें सुरक्षित मार्ग से वापस लाने पर मंथन हो रहा है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि उन्हें पहले से क्यों नहीं निकाला जा सका। क्यों हमारी खुफिया एजेंसियों को यह भनक नहीं लगी कि इजरायल और अमेरिका ऐसा कोई हमला बोलने जा रहे हैं। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि ईरान पर हमले से केवल दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री मोदी इजरायल में थे। ऐसे में खुफिया एजेंसियों को और सतर्क होकर काम करना चाहिए था। लेकिन पुलवामा और पहलगाम की तरह यह भी बड़ी खुफिया नाकामी है।
भारत के लिए परेशानी की बात यह भी है कि ईरान युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर ईंधन का जो संकट खड़ा हुआ है, उससे सरकार कैसे निपटेगी, इसका जवाब भी नहीं दिया जा रहा है। सोमवार को ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें एक ही दिन में 25 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 115-118 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। इसे हाल के वर्षों में सबसे बड़ी दैनिक बढ़ोतरी में से एक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध लंबा चला तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं। इस बीच डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी कमजोर होकर करीब 92 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक फिसल गया है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 1.5 से 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर देश के व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों में तेज़ उछाल और वैश्विक अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखा गया। निवेशकों की चिंता के कारण बाजार में तेज़ बिकवाली हुई और प्रमुख सूचकांकों में भारी गिरावट दर्ज की गई। विशेष रूप से एयरलाइन, परिवहन, केमिकल और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के शेयरों पर अधिक दबाव देखा गया, क्योंकि इन क्षेत्रों की लागत का बड़ा हिस्सा ईंधन पर निर्भर होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य-पूर्व का संकट लंबे समय तक बना रहता है तो भारत सरकार को महंगाई और रुपये को स्थिर रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसमें रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग, सस्ते स्रोतों से आयात बढ़ाना और आर्थिक नीतिगत हस्तक्षेप शामिल हो सकते हैं।
सरकार इनमें से कौन सा कदम उठाएगी, यह पता नहीं। एक बड़ी समस्या यह भी है कि महंगाई के साथ-साथ बेरोजगारी भी बढ़ने की आशंका है। युद्ध लंबा चला और खाड़ी देशों से भारतीय वापस लौटे तो यहां उनके रोजगार की व्यवस्था कैसे होगी।
ऐसे कई वास्तविक सवाल हैं, जिनकी चर्चा सदन में शांति से होती तो जनता को भी आश्वस्ति मिलती। लेकिन प्रधानमंत्री सदन में आए नहीं और विदेश मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री हालात पर करीब से नजर रख रहे हैं। अगर ऐसा है तो कम से कम यही बता देते कि करीब की नजर में उन्हें क्या दिखा और क्या वो इसके बाद दूरदृष्टिपूर्ण फैसला लेंगे। लेकिन मोदीजी तो चुप हैं।