लोकतंत्र के लिए खतरनाक पक्षपाती रवैया
राहुल गांधी ने बुधवार को लोकसभा में बोलते हुए छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए, जो सत्तापक्ष को इतने आपत्तिजनक लगे कि राहुल गांधी से माफी की मांग की जाने लगी।;
बुधवार को एक बार फिर संसद के दोनों सदनों में कार्रवाई बार-बार स्थगित हुई, क्योंकि विपक्षी सांसदों के बयान सत्तापक्ष को मंजूर नहीं थे। हंगामे के बीच पेपर लीक विरोधी विधेयक तो लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हो गया। किंतु लोकसभा में केवल सत्तापक्ष की ध्वनि के लिए जगह बची है, यह बात फिर स्थापित हो गई। 2024 में जब से राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बने हैं, भाजपा सरकार पहले से ज्यादा उद्वेलित और असहज दिखने लगी है। राहुल गांधी ने कहा ही था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में उनका सामना करने की हिम्मत नहीं है, इसलिए वे सदन में नहीं आते। अब शायद यही बात गृहमंत्री अमित शाह पर भी लागू हो जाएगी।
राहुल गांधी ने बुधवार को लोकसभा में बोलते हुए छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए, जो सत्तापक्ष को इतने आपत्तिजनक लगे कि राहुल गांधी से माफी की मांग की जाने लगी। उनका भाषण पूरा नहीं हो पाया, कई बार उन्हें टोका गया। जिस पर राहुल गांधी को यहां तक कहना पड़ा कि अगर इस सदन में केवल भाजपा को बोलने का अधिकार है, तो फिर मैं चुप बैठ जाता हूं। हमेशा की तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला फिर निष्पक्ष रवैया दिखाने में नाकाम रहे। वे भले ही माननीय नेता प्रतिपक्ष कहकर अपनी बात रख रहे हों, लेकिन प्रतिपक्ष के नेता के लिए मान उनके व्यवहार में नजर नहीं आया। यही बात सत्तापक्ष के सभी सांसदों पर लागू होती है। खासकर संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू पर, जिनका एकमात्र काम इस समय मोदी-शाह का बचाव करना नजर आ रहा है। राहुल गांधी ने पेपर लीक आंदोलन में उतरे छात्रों पर गोलियां चलाने के लिए अमित शाह को जिम्मेदार ठहराया। जिस पर सत्तापक्ष भड़क उठा। किरण रिजीजू ने कहा कि इस बात के सबूत दीजिए, अगर नहीं दे सकते तो फिर ऐसा कहना ठीक नहीं है, आप माफी मांगिए। रिजीजू ने यह भी कहा कि ऐसे तो मैं भी कह सकता हूं कि राहुल गांधी ने किसी का मर्डर किया है। क्या ऐसा कहना ठीक होगा।
बात सही है कि सदन में किसी का भी नाम लेकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन राहुल गांधी किसी की भी बात नहीं कर रहे थे, वे बाकायदा गृहमंत्री अमित शाह की बात कर रहे थे, जिनके अधीन पुलिस प्रशासन आता है, जिनके जिम्मे देश की आंतरिक सुरक्षा का दायित्व है। जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठी और आंसू गैस के गोले के अलावा पैलेट गन से वार किया गया, जिसमें कुछ लोगों को गंभीर चोटें लगने की खबरें हैं। एक छात्र को तो राहुल गांधी ने पत्रकारों के सामने दिखाया भी था, जिसकी आंख फूटने का खतरा बना हुआ है। एक पत्रकार को भी पैलेट गन से चोट लगी है। इसी तरह बिहार में पुलिसकर्मी अभिषेक पटेल के हाथों में एके 47 लेकर छात्रों की तरफ निशाना साधे दिखे हैं, उसके वीडियो सामने हैं, इसी आधार पर उन्हें निलंबित भी किया गया है। तो क्या यह सवाल अमित शाह से नहीं किया जाएगा कि क्या उन्होंने छात्रों के खिलाफ बंदूकें तानने के आदेश दिया, गोली चलाने के आदेश दिए। अगर नहीं दिए और फिर भी इन हथियारों का इस्तेमाल हुआ है, तो यह ज्यादा गंभीर बात है कि पुलिस गृहमंत्री को अंधेरे में रखकर काम कर रही है।
दोनों ही सूरतों में जवाब अमित शाह को देना पड़ेगा, तभी सच्चाई सामने आएगी। लेकिन इस समय भाजपा सरकार देश को अंधेरे में रखने का ही काम कर रही है। छात्रों पर पुलिसिया ज्यादती का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, क्या सरकार वहां जवाब नहीं देगी। अगर कानूनी अदालत में सरकार बोल सकती है, तो फिर जनता के चुने प्रतिनिधि जब यही सवाल उठा रहे हैं, तो जवाब देने से क्यों बच रही है। अगर अमित शाह संसद आते और राहुल गांधी को आमने-सामने जवाब देते तो हंगामा होता ही नहीं। लेकिन भाजपा की रणनीति यही है कि हंगामे की आड़ में जवाबदेही से बचा जाए।
संसद के बजट सत्र में भी राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया था, क्योंकि वे चीन से सीमा विवाद पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की किताब को उद्धृत करना चाहते थे। राहुल के भाषण में कई बार व्यवधान उत्पन्न किया गया और उन्हें आखिरकार पूरी बात कहने से रोका गया। इससे पहले शीतकालीन सत्र में एसआईआर पर इसी तरह विपक्ष की बात उठने नहीं दी गई। इस बार राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं तो उनकी सांसदी बनी हुई है। वर्ना पिछले कार्यकाल में तो नरेन्द्र मोदी की कोशिश यही थी कि राहुल गांधी सदन से ही बाहर हो जाएं। कुछ समय के लिए राहुल गांधी की सांसदी गई भी, उनसे घर भी वापस लिया गया था। लेकिन ये सारे पैंतरे उनकी आवाज को नहीं दबा पाए। फिर भी भाजपा इसी रणनीति पर अटकी हुई है कि किसी तरह राहुल गांधी की आवाज को दबाया जाए।
इसके बाद किस तरह से भाजपा यह दावा करती है कि वह लोकतंत्र का सम्मान करती है और संविधान के तहत ही सारे कार्य करती है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के खिलाफ तो अविश्वास प्रस्ताव ही लाना पड़ा। उधर साल भर पहले ऐसे ही मानसून सत्र के पहले दिन ही राज्यसभा में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शाम को अचानक इस्तीफे की घोषणा की थी, जिसे फौरन मंजूर भी कर लिया गया था, यह भी देश ने देखा है। अब उनकी जगह सी पी राधाकृष्णन राज्यसभा में आसंदी पर हैं, लेकिन वहां का नजारा बिल्कुल नहीं बदला है। वे भी विपक्ष को अपनी बात पूरी नहीं रखने देते या सत्तापक्ष की टोकाटाकी को रोकते नहीं हैं।
कुल मिलाकर संसद के दोनों सदनों में लोकतंत्र बेहाल नजर आ रहा है। विपक्ष के सांसदों को बोलने से रोकने की कोशिश में संसद का महत्वपूर्ण समय नष्ट हो जाता है। विपक्ष के सांसदों को मजबूरन बाहर आकर पत्रकारों से या फिर अलग से प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी बात पूरी करनी पड़ती है। भले ही वे बातें संसद की आधिकारिक कार्यवाही में दर्ज न हों, लेकिन जनता के दिमाग में तो दर्ज हो ही रही हैं, यह मोदी सरकार के लिए ही नुकसानदायक है।