विश्व सम्मेलन में प्रधानमंत्री द्वारा विपक्ष के नेता का उपहास करना हास्यास्पद

राहुल गांधी, मोदी के शासन, सत्ता के केंद्रीकरण, आर्थिक असमानता और भाजपा के राजनीतिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं।;

By :  National
Update: 2026-10-25 21:30 GMT
  • डॉ. ज्ञान पाठक

राहुल गांधी, मोदी के शासन, सत्ता के केंद्रीकरण, आर्थिक असमानता और भाजपा के राजनीतिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं। वे मोदी सरकार द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि भारत के चुनाव आयोग सहित हर संवैधानिक संस्था को कमजोर किया गया है। देश की संपत्ति कुछ ही हाथों में सिमटती जा रही है, और लोग बढ़ती असमानता तथा बड़े पैमाने पर बेरोजगारी से जूझ रहे हैं।

प्रधानमंत्री को विपक्ष के नेता की जोरदार आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन पद की गरिमा कड़ी राजनीतिक आलोचना और व्यक्तिगत उपहास के बीच अंतर की मांग करती है। फिर भी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 अक्टूबर 2026 को एनडीटीवी द्वारा आयोजित एक विश्व सम्मेलन में अपने प्रतिद्वंद्वी लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का उपहास किया, जहां दर्शक मुख्य रूप से भारत की वैश्विक स्थिति में रुचि रखते थे और एक सामान्य भारतीय चुनावी रैली में भाग नहीं ले रहे थे। स्पष्ट रूप से, प्रधानमंत्री मोदी ने राजनेता के रूप में चूक की, जब उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को 'असफल उत्पादÓ कहकर व्यक्तिगत उपहास किया, 'अव्यवस्था का सपना देखने' का आरोप लगाया, अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल कांग्रेस को 'परजीवी' कहा और कहा कि उस पर 'दिमागी नक्सलियों' का प्रभुत्व है, जो भारत को बदनाम करने और नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा जिसे उनके पद की गरिमा और अवसर के आधार पर अनुचित कहा जायेगा।

यह आश्चर्य की बात थी कि एक विश्व सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने प्रतिद्वंद्वी नेता और राजनीतिक दल की आलोचना करते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के नेता के रूप में बात की और ऐसा लगा कि वह भूल गए थे कि वह भारत की सरकार के चुने हुए प्रमुख हैं और उन दर्शकों के सामने बोल रहे थे जो उन मुद्दों में रुचि रखते थे जिनका दुनिया आज सामना कर रही है, न कि भारत के अन्दर की उस राजनीति में जो घटिया स्तर की मानी जाती है।

किसी देश की प्रतिष्ठा के लिए खासकर विश्व सम्मेलन में प्रधानमंत्री की भाषा मायने रखती है। किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को 'विफल उत्पादÓ कहना उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ लक्षित एक प्रभावी राजनीतिक कटाक्ष हो सकता है, लेकिन यह नेतृत्व, नीति और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बारे में बहस को उपहास के रूप में बहुत ही छोटा कर देता है।

मोदी तर्क देते रहे हैं कि कांग्रेस वैश्विक दर्शकों के सामने विदेशों में भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती रही है। फिर भी, वह स्वयं वैश्विक दर्शकों के सामने अपने प्रतिद्वंद्वी की छवि खराब कर रहे थे, केवल इसलिए क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी उनकी सरकार के खिलाफ निर्मम आलोचना कर रहे हैं जो उनके लिए बहुत शर्मनाक है, जैसे कि चुनाव जीतने के लिए वोट की चोरी। लेकिन लोकतंत्र में किसी सरकार की आलोचना स्वत: ही देश की आलोचना नहीं होती। प्रधानमंत्री के पास एक बड़ा सार्वजनिक मंच और एक सामान्य सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता की तुलना में अधिक संस्थागत अधिकार होता है। यह एक उचित उम्मीद पैदा करता है कि वह राजनीतिक विरोधियों को किसी विश्व सम्मेलन में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सभा में ही दांव पर लगे मुद्दों के महत्व के प्रश्नों पर अनुपातिक तर्कों के साथ जवाब दें न कि किसी भी उल-जुलूल उपहास के शब्दों से।

राहुल गांधी भी विशेष रूप से 2024 के बाद से आक्रामक रहे हैं और आरोप लगाते रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के साथ मिले हुए हैं और वोट चोरी से चुनाव जीत रहे हैं। 2 अक्टूबर 2026 से, राहुल गांधी ने सरकार के प्रति अपना विरोध तेज कर दिया है और सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने और 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने वाले एसआईआर को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री मोदी ने बदलती विश्व व्यवस्था को समर्पित एक विश्व सम्मेलन में राहुल गांधी और कांग्रेस का मजाक उड़ाते हुए उन्हें भारत का दुश्मन बताया है। प्रधानमंत्री द्वारा अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी विपक्ष के नेता का उपहास भारत की राजनीतिक परिपक्वता को प्रदर्शित नहीं करता है, और इसलिए उन्होंने खुद को हास्यास्पद बना लिया।

अंतत:, एक प्रधानमंत्री का कद इस बात से नहीं मापा जाता है कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी का कितने प्रभावी ढंग से उपहास करता है, बल्कि इससे मापा जाता है कि वह अपने पद की गरिमा के प्रति सचेत रहते हुए उस प्रतिद्वंद्वी के तर्कों और प्रश्नों का कितनी दृढ़ता और सटीकता से जवाब देता है।

अपनी आलोचना में प्रधानमंत्री मोदी आम तौर पर अपनी सरकार के रिकॉर्ड का बचाव करते हैं, कांग्रेस की विश्वसनीयता को चुनौती देते हैं, भाजपा को राष्ट्रीय विकास, स्थिरता और हिंदू सांस्कृतिक पहचान की पार्टी के रूप में पेश करते हैं। वह और उनकी पार्टी राहुल गांधी का उपहास भी उड़ाते रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी के सवालों का जवाब देने से बचते रहे हैं जबकि विपक्ष के नेता लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी ने अपनी आलोचनाओं में अक्सर ऐसे मुद्दे उठाए हैं जो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए काफी शर्मिंदगी का कारण बने हैं। वे आमतौर पर सरकार के कामकाज की समीक्षा करते हैं, आर्थिक लाभों के वितरण पर सवाल उठाते हैं, और भाजपा के सांप्रदायिक एजंडे, संवैधानिक सुरक्षा उपायों, सामाजिक असमानता और संस्थागत जवाबदेही जैसे मुद्दों को उजागर करते हैं। विपक्ष के नेता के रूप में, वे सरकार के कामकाज के रिकॉर्ड को चुनौती देते हैं और जवाबदेही की मांग करते हैं।

राहुल गांधी, मोदी के शासन, सत्ता के केंद्रीकरण, आर्थिक असमानता और भाजपा के राजनीतिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं। वे मोदी सरकार द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि भारत के चुनाव आयोग सहित हर संवैधानिक संस्था को कमजोर किया गया है। देश की संपत्ति कुछ ही हाथों में सिमटती जा रही है, और लोग बढ़ती असमानता तथा बड़े पैमाने पर बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। वे किसानों और मजदूरों से जुड़े मुद्दे भी उठाते हैं। वे अक्सर अपनी आलोचना को संवैधानिक बहुलवाद, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सरकार तथा राष्ट्र के बीच के अंतर से जोड़ते हैं।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी अक्सर राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने से बचते हैं। इसके बजाय, वे राहुल गांधी की आलोचना करते हैं, वंशवादी राजनीति और उनके नेतृत्व की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं, और कई बार उनका मजाक भी उड़ाते हैं। वे नेहरू-गांधी राजनीतिक परिवार और कांग्रेस पर देश को बर्बाद करने का आरोप लगाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा उठाए गए हर सवाल का जवाब देना चाहिए। केवल उनका मजाक उड़ाना ही अपने आप में एक बेतुकी बात है।

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