विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने से क्यों रोका जाए?
एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) ने प्रेस विज्ञप्ति में विद्यार्थियों से कहा है कि वे पढ़ाई पर ध्यान दें और परीक्षा-व्यवस्था के विरुद्ध चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से दूर रहें।;
- डा. सुदर्शन आयंगार
बार-बार होने वाले राष्ट्रीय परीक्षा-संकट अत्यधिक केंद्रीकरण पर भी पुनर्विचार की मांग करते हैं। जब एक ही व्यवस्था करोड़ों युवाओं के भविष्य को नियंत्रित करती है तब एक प्रशासनिक गलती पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है। गांधीजी का विश्वास विकेंद्रीकरण, स्थानीय जिम्मेदारी और लोगों के निकट निर्णय लेने में था। शिक्षा में भी विविधता, संस्थागत स्वायत्तता और स्थानीय जवाबदेही आवश्यक हैं।
एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) ने प्रेस विज्ञप्ति में विद्यार्थियों से कहा है कि वे पढ़ाई पर ध्यान दें और परीक्षा-व्यवस्था के विरुद्ध चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से दूर रहें। पहली नज़र में यह सलाह बिल्कुल उचित लगती है। विद्यार्थी पढ़ेंगे नहीं, परीक्षाओं की तैयारी नहीं करेंगे तो उनका भविष्य कैसे बनेगा? सवाल यह है कि क्या पढ़ाई और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना एक-दूसरे के विरोधी हैं? क्या एक विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी करते हुए अपनी परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठा सकता? क्या डिग्री हासिल करने की चिंता उसे अपने भविष्य से जुड़े अन्याय के प्रति चुप रहने के लिए बाध्य कर देती है? यहीं से शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य का प्रश्न सामने आता है।
क्या शिक्षा केवल कक्षाओं में उपस्थित होने, परीक्षाएं देने और डिग्रियां प्राप्त करने का नाम है? या शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना भी है जो सत्य और असत्य में अंतर कर सकें, अन्याय को पहचान सकें और उसके विरुद्ध खड़े होने का साहस रख सकें?
महात्मा गांधी के लिए शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं थी। शिक्षा का संबंध चरित्र, विवेक, साहस और सामाजिक जिम्मेदारी से था। उनके लिए शिक्षित व्यक्ति वह नहीं था जो केवल बहुत कुछ जानता हो बल्कि वह था जो सत्य के पक्ष में खड़े होने और अन्याय का प्रतिरोध करने का नैतिक साहस रखता हो।
भारतीय शिक्षा के इतिहास में इसके अनेक उदाहरण हैं। 1920 में गांधीजी ने गुजरात विद्यापीठ की स्थापना केवल एक और विश्वविद्यालय बनाने के लिए नहीं की थी। वह औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वराज्य के व्यापक संघर्ष का हिस्सा था। असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के दौरान शिक्षण संस्थानों से यह नहीं कहा गया कि वे देश में हो रहे संघर्ष से अलग रहें और विद्यार्थियों का एकमात्र कर्तव्य कक्षाओं और परीक्षाओं तक सीमित है। दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में भी शिक्षा को सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी से अलग नहीं किया गया। प्रश्न यह था, कि क्या शिक्षा आज्ञाकारी प्रजा बनाएगी या जिम्मेदार नागरिक? विश्वविद्यालय केवल डिग्रियां बांटने वाली संस्थाएं नहीं हैं। वे समाज की नैतिक चेतना के निर्माण की जिम्मेदारी भी निभाती हैं।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर विरोध उचित है या विद्यार्थियों को हर मुद्दे पर सड़कों पर उतर जाना चाहिए। विरोध कोई फैशन नहीं है और न ही स्वयं में कोई लक्ष्य। विद्यार्थियों को हिंसा, उन्माद और भीड़तंत्र से दूर रहना चाहिए। किसी आंदोलन का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह किस उद्देश्य के लिए है, उसकी पद्धति क्या है और वह किस प्रकार का परिवर्तन लाना चाहता है। दुष्यंत के इस शेर को न भुला दें: 'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं है, मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।Ó 1974-75 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हमारा प्रयास यही था कि व्यवस्था में परिवर्तन की मांग को नैतिकता, अनुशासन और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से जोड़ा जाए।
आज विद्यार्थियों द्वारा परीक्षा-व्यवस्था को लेकर उठाए जा रहे प्रश्नों को केवल 'पढ़ाई से ध्यान भटकाने वाला मुद्दाÓ कहना वास्तविकता से आंखें मूंदना है। परीक्षा की विश्वसनीयता सीधे विद्यार्थी के भविष्य से जुड़ी है। प्रश्नपत्र लीक हों, परीक्षाओं में अनियमितताएं हों, प्रशासनिक लापरवाही हो या अलग-अलग विद्यार्थियों के साथ असमान व्यवहार किया जाए, तो इसका प्रभाव केवल किसी एक छात्र पर नहीं पड़ता। लाखों युवाओं के जीवन, समय, धन और भविष्य पर इसका असर पड़ सकता है। इसलिए प्रश्न उठाना विद्यार्थियों का अधिकार ही नहीं, उनकी जिम्मेदारी भी है।
(एआईयू) ने विद्यार्थियों को अफवाहों और अटकलों से सावधान किया है। यह सलाह उचित है। लोकतांत्रिक समाज में अफवाहें निर्णय का आधार नहीं बन सकतीं लेकिन लोकतंत्र में सरकारी आश्वासन भी अपने आप में पर्याप्त नहीं होते। विश्वास पारदर्शिता से पैदा होता है, स्वतंत्र जांच से मजबूत होता है और जवाबदेही से कायम रहता है।
नीट यूजी परीक्षा से जुड़े 2024 के विवादों ने देश में परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए। यदि किसी व्यक्ति पर किसी मामले में कथित रूप से मुख्य भूमिका निभाने का आरोप लगे और बाद में जांच एजेंसी यह कहे कि उस विशेष मामले में उसके जुड़े होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला तथा वह बेदाग रिहा हो जाता है, तो विद्यार्थियों को यह पूछने का अधिकार है कि जांच और जवाबदेही की प्रक्रिया आखिर कैसे काम करती है। उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे केवल यह सुनकर संतुष्ट हो जाएं कि भविष्य में सब कुछ ठीक रहेगा।
यह अच्छी बात है कि भविष्य की परीक्षाएं सुरक्षित होंगी लेकिन जिन परीक्षाओं पर पहले ही प्रश्न उठ चुके हैं, उनका क्या? जिन विद्यार्थियों का समय, अवसर और भविष्य प्रभावित हुआ है उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? कुछ प्रश्न तो व्यवस्था की बुनियाद से जुड़े हैं। यदि परीक्षा के प्रश्नपत्रों को सैन्य विमानों से ले जाना पड़े तो क्या यह परीक्षा-प्रबंधन की सफलता का प्रमाण है या संस्थागत विफलता का? क्या देश के सशस्त्र बलों को परीक्षा-व्यवस्था का बोझ उठाना चाहिए? यदि विश्वविद्यालय अपने ही शिक्षकों और कर्मचारियों पर भरोसा नहीं कर सकता तो फिर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और संस्थागत क्षमता का क्या अर्थ रह जाता है?
विश्वविद्यालयों को भी आत्ममंथन करना होगा। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता अनेक संस्थानों में लगातार गिरती गई है। कुछ जगहों पर फीस और अन्य शुल्क देकर बिना वास्तविक उपस्थिति और गंभीर शैक्षणिक सहभागिता के डिग्री हासिल करना संभव हो गया है। ऐसे में यदि विद्यार्थी शिक्षा की गुणवत्ता और परीक्षा-व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं तो उन्हें चुप रहने की सलाह देना समस्या का समाधान नहीं है।
विश्वविद्यालय समुदाय उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, स्वायत्तता और नीति-निर्माण से जुड़े प्रश्नों पर उतना प्रभाव नहीं डाल सका जितना उसे डालना चाहिए था। जब विश्वविद्यालय समुदाय स्वयं कई गंभीर समस्याओं का समाधान नहीं कर पाया है तब विद्यार्थियों से यह कहना कि वे चुप रहें और व्यवस्था पर भरोसा करें—नैतिक रूप से कठिन प्रश्न खड़ा करता है।
बार-बार होने वाले राष्ट्रीय परीक्षा-संकट अत्यधिक केंद्रीकरण पर भी पुनर्विचार की मांग करते हैं। जब एक ही व्यवस्था करोड़ों युवाओं के भविष्य को नियंत्रित करती है तब एक प्रशासनिक गलती पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है। गांधीजी का विश्वास विकेंद्रीकरण, स्थानीय जिम्मेदारी और लोगों के निकट निर्णय लेने में था। शिक्षा में भी विविधता, संस्थागत स्वायत्तता और स्थानीय जवाबदेही आवश्यक हैं।
एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। हिंसा, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का कोई औचित्य नहीं है। विद्यार्थी आंदोलन शांतिपूर्ण होना चाहिए। असहमति के बावजूद विरोधियों के प्रति सम्मान बना रहना चाहिए लेकिन अहिंसा का अर्थ अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है। गांधीवादी सत्याग्रह सत्य के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होने का नाम है। यह अनुशासित प्रतिरोध है, अराजकता नहीं; साहस है, क्रोध नहीं; जिम्मेदारी है, लापरवाही नहीं। इसलिए विश्वविद्यालयों और कुलपतियों से अपील है कि विद्यार्थियों को केवल चुप रहने की सलाह न दें। उनकी बात सुनें।
विद्यार्थियों से भी अपील है- पढ़ाई मत छोड़िए, लेकिन अन्याय को अनदेखा भी मत कीजिए! परीक्षा की तैयारी कीजिए पर अपने भविष्य से जुड़े प्रश्न पूछना बंद न करें। शांतिपूर्ण रहिए लेकिन अन्याय के सामने समर्पण मत कीजिए। सरकारी आश्वासनों का सम्मान हो लेकिन पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और जवाबदेही की मांग भी जारी रहे।
सत्य, न्याय और जवाबदेही के लिए शांतिपूर्ण विद्यार्थी आंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है। वह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र अभी जीवित है।
(लेखक गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद के पूर्व कुलपति हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)