ललित सुरजन की कलम से नेता क्यों पढ़ें?
'मंदिर के बाहर कतार से दुकानें सजती हैं उनमें पूजा सामग्री, माला, मनके, देवी-देवताओं के चित्र, कलश, कमंडल इत्यादि मिल जाएंगे, लेकिन किताबें शायद ही मिलेंगी।;
'मंदिर के बाहर कतार से दुकानें सजती हैं उनमें पूजा सामग्री, माला, मनके, देवी-देवताओं के चित्र, कलश, कमंडल इत्यादि मिल जाएंगे, लेकिन किताबें शायद ही मिलेंगी। रामचरित मानस का गुटका या हनुमान चालीसा भले ही मिल जाए, लेकिन यदि उस स्थान विशेष के बारे में प्रामाणिक जानकारी देने वाली कोई संदर्भ पुस्तिका आप ढूंढना चाहें तो निराशा ही हाथ लगेगी।
ज्ञानार्जन के प्रति अवज्ञा का जो भाव समाज में है शायद यह उसी का प्रतिफल है। इसका अपवाद अगर देखना है तो आधुनिक समय में तथाकथित संत महात्माओं के जो आश्रम स्थापित हुए हैं वहीं देखने मिलेगा। इन स्थानों पर आकर्षक तरीके से सजी दुकानों में उतने ही आकर्षक ढंग से छपी पुस्तकें उपलब्ध हो जाती हैं।
कह सकते हैं कि पुराने तीर्थों की बजाय नए आस्था केन्द्रों का प्रचारतंत्र बेहतर है और ये अपनी मार्केटिंग के लिए पुस्तकों का भी बखूबी इस्तेमाल कर लेते हैं।'
(देशबन्धु में 03 जुलाई 2014 प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/07/blog-post.html