अमेरिका-ईरान समझौता: शांति या अस्थायी विराम?

इस समझौते को संकट का अंत नहीं, बल्कि एक लंबी और जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए।;

By :  DB Desk
Update: 2026-06-17 21:30 GMT
  • असद मिर्जा

इस समझौते को संकट का अंत नहीं, बल्कि एक लंबी और जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए। इसकी सफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति, भरोसेमंद सत्यापन व्यवस्था, परस्पर प्रतिबद्धताओं के पालन और क्षेत्रीय तनावों के प्रबंधन पर निर्भर करेगी। इसने युद्ध के तत्काल खतरे को कम किया है और क्षेत्रीय स्थिरता की उम्मीद जगाई है।

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ प्रारूप शांति समझौता पश्चिम एशिया में व्यापक युद्ध के तत्काल खतरे को कम करने में सफल रहा है। कई महीनों तक चले सैन्य टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित किया, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को खतरे में डाला और पूरे क्षेत्र में बड़े संघर्ष की आशंकाएं पैदा कर दी थीं। ऐसे माहौल में वाशिंगटन और तेहरान का बातचीत का रास्ता चुनना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन इतिहास बताता है कि शांति समझौते पर हस्ताक्षर करना और उसे लंबे समय तक कायम रखना दो अलग बातें हैं।

यह समझौता फिलहाल किसी व्यापक शांति संधि से अधिक एक राजनीतिक समझ है, जिसका उद्देश्य संघर्ष रोकना और आगे की बातचीत के लिए रास्ता बनाना है। इसकी सफलता केवल अमेरिका और ईरान की प्रतिबद्धताओं पर नहीं, बल्कि इजराइल के रुख, घरेलू राजनीतिक विरोध और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों पर भी निर्भर करेगी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अपनी कूटनीतिक और सैन्य रणनीति की सफलता बताया है। उनका कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भरोसा लौटेगा। तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन को लेकर चिंताएं पहले ही कम हुई हैं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस समझौते का स्वागत करते हुए पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता लौटने की उम्मीद जताई है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वहां रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह क्षेत्र विशेष महत्व रखता है।

अमेरिकी नीति में भी एक बदलाव दिखाई देता है। पहले वाशिंगटन की मांग थी कि ईरान अपनी परमाणु क्षमताओं को पूरी तरह समाप्त करे, तभी प्रतिबंधों में राहत संभव होगी। मौजूदा समझौते में पहले सैन्य टकराव रोकने और बाद में परमाणु सत्यापन, प्रतिबंधों तथा क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत जारी रखने का रास्ता अपनाया गया है। हालिया संघर्ष ने यह भी दिखाया कि लंबे क्षेत्रीय युद्ध की आर्थिक और राजनीतिक कीमत काफी अधिक होती है।

अमेरिका में इस समझौते को लेकर पूरी सहमति नहीं है। कुछ रिपब्लिकन नेताओं का मानना है कि प्रतिबंधों में राहत मिलने से ईरान अपनी सैन्य क्षमताओं को फिर मजबूत कर सकता है। वहीं ईरान भी इसे अपनी जीत के रूप में पेश कर रहा है। तेहरान का कहना है कि उसने अमेरिकी और इजराइली दबाव का सामना किया, लेकिन अपने मूल रणनीतिक उद्देश्यों से पीछे नहीं हटा। समझौते में ईरान के परमाणु ढांचे को तत्काल समाप्त करने की शर्त नहीं रखी गई है और यूरेनियम संवर्धन से जुड़े मुद्दे आगे की बातचीत के लिए छोड़े गए हैं।

ईरान के भीतर भी अमेरिका को लेकर गहरा अविश्वास मौजूद है। 2015 के परमाणु समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने को वहां आज भी एक बड़ी वजह माना जाता है। यही कारण है कि तेहरान भविष्य की किसी भी व्यवस्था में अधिक ठोस गारंटी चाहता है।

अमेरिका और ईरान के संबंधों पर इतिहास की गहरी छाप है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच संबंध अविश्वास, प्रतिबंधों, परोक्ष संघर्षों और सैन्य टकरावों से प्रभावित रहे हैं। 2015 का संयुक्त व्यापक कार्ययोजना समझौता (जेसीपीओ) कूटनीति की सफलता माना गया था, लेकिन 2018 में अमेरिका के उससे बाहर निकलने के बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन बढ़ाया और वाशिंगटन ने प्रतिबंधों को और सख्त किया। यही प्रक्रिया हालिया टकराव तक पहुंची।

मौजूदा समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि परमाणु विवाद का मूल प्रश्न अभी भी अनसुलझा है। उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का भंडार प्रमुख विवादों में शामिल है। अमेरिका संवर्धन क्षमता में कमी और कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की मांग करता है, जबकि ईरान शांतिपूर्ण परमाणु संवर्धन को अपना संप्रभु अधिकार मानता है। अमेरिका के लिए ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना अनिवार्य है, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय गौरव और रणनीतिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखता है।

क्षेत्रीय परिस्थितियां भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं। इजराइल साफ कर चुका है कि उसकी सुरक्षा चिंताएं केवल अमेरिका-ईरान समझौते तक सीमित नहीं हैं। हिजबुल्लाह, ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव और उसकी मिसाइल क्षमताएं अब भी उसके लिए प्रमुख मुद्दे हैं। लेबनान में इजराइली सैन्य गतिविधियां इस समझौते के दायरे से बाहर हैं। दूसरी ओर हिजबुल्लाह और अन्य सहयोगी समूहों के साथ ईरान के संबंध भी मौजूदा व्यवस्था में शामिल नहीं हैं। इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच संवाद जारी रहने के बावजूद क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे।

इसके बावजूद कुछ ऐसे कारण हैं जो इस समझौते को पिछले प्रयासों की तुलना में अधिक टिकाऊ बना सकते हैं। दोनों देशों ने प्रत्यक्ष संघर्ष की भारी कीमत चुकाई है। आर्थिक नुकसान, सैन्य खर्च और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने संयम बरतने के लिए नई परिस्थितियां पैदा की हैं। साथ ही वार्ताकारों ने पहले संघर्ष रोकने और बाद में कठिन मुद्दों पर बातचीत करने की रणनीति अपनाई है।

अंतत: इस समझौते को संकट का अंत नहीं, बल्कि एक लंबी और जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए। इसकी सफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति, भरोसेमंद सत्यापन व्यवस्था, परस्पर प्रतिबद्धताओं के पालन और क्षेत्रीय तनावों के प्रबंधन पर निर्भर करेगी। इसने युद्ध के तत्काल खतरे को कम किया है और क्षेत्रीय स्थिरता की उम्मीद जगाई है, लेकिन स्थायी शांति का रास्ता अभी भी लंबा है। दोनों देशों को दशकों पुराने अविश्वास से आगे बढ़कर यह साबित करना होगा कि बातचीत और समझौता निरंतर टकराव की तुलना में उनके राष्ट्रीय हितों के लिए अधिक लाभकारी हैं। तभी यह युद्धविराम स्थायी शांति में बदल सकेगा।

Tags:    

Similar News