शिक्षा मंत्रालय मौलाना आजाद से प्रहलाद जोशी तक!

केंद्र सरकार में नए शिक्षा मंत्री बने प्रहलाद जोशी को काम संभाले अभी चार दिन भी नहीं बीते कि उन पर विवाद खड़े हो गए हैं।;

Update: 2026-07-29 21:30 GMT

देश भर के विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने और उसकी देखरेख के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की स्थापना की। तकनीकी शिक्षा के उचित विकास के अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद गठित की। कला, साहित्य और संस्कृति के विकास और संरक्षण के लिए साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी जैसे राष्ट्रीय संस्थान बनाए

केंद्र सरकार में नए शिक्षा मंत्री बने प्रहलाद जोशी को काम संभाले अभी चार दिन भी नहीं बीते कि उन पर विवाद खड़े हो गए हैं। संसद में उनके नाम पर हंगामा हो गया। दरअसल मंगलवार को प्रियंका गांधी ने पेपर लीक विरोधी विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा कि प्रधानमंत्री ने एक नए शिक्षामंत्री को नियुक्त किया है। एक ऐसे व्यक्ति को जिन्होंने गर्भवती महिला के साथ बलात्कार के दोषियों की रिहाई पर सहमति और खुशी भी जताई थी। देश के करोड़ों लोगों को प्रधानमंत्री ने क्या संदेश दिया है। इस टिप्पणी के बाद सदन में हंगामा खड़ा हो गया। भाजपा सांसद इसका विरोध करने लगे और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने इसे 'चरित्र हनन' बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई थी और टिप्पणी हटाने की मांग की थी, जिसके बाद इस टिप्पणी को कार्यवाही से हटा दिया गया।

विपक्ष के सांसद कुछ भी कहें तो सत्तापक्ष में बैठे लोग उस पर ऐतराज जताते ही हैं, यही इस सरकार में चलन हो गया है। बुधवार को तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को यहां तक कहना पड़ा कि अगर केवल भाजपा के लोगों को बोलने की इजाज़त है तो फिर मैं बैठ ही जाता हूं। क्योंकि वे जब भी कुछ कहते, सत्ता पक्ष उन्हें टोकने लगता। लेकिन प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर भाजपा के लोगों ने क्यों हंगामा किया, किरण रिजिजू को यह किस तरह से चरित्र हनन लगा, यह भाजपा को बता देना चाहिए। गौरतलब है कि गुजरात दंगों में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था और उनके गर्भ में पल रहे बच्चे को भी मार डाला गया था, जिसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई बिलकिस बानो ने लड़ी थी और जनवरी 2008 में उनके 11 दोषियों को सजा सुनाई गई। लेकिन 15 अगस्त 2022 को गुजरात सरकार ने अपनी क्षमा नीति के तहत 11 दोषियों को रिहा किया था। तब इन बलात्कारियों का फूल-माला पहना कर स्वागत हुआ था, भाजपा और संघ के कई लोगों ने इस फैसले को सही ठहराया था। प्रहलाद जोशी भी उन्हीं में से एक थे। एनडीटीवी ने उनसे सवाल पूछा था और उनका जवाब रिकार्ड में है। सोशल मीडिया पर यह उपलब्ध है। हालांकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को गलत बताया और सारे दोषी फिर जेल में है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अब प्रहलाद जोशी को अपना चार साल पुराना बयान सही नहीं लग रहा है। अगर ऐसा है, तो वे बलात्कारियों की रिहाई के समर्थन में बयान देने पर माफी क्यों नहीं मांग लेते। और अगर उन्हें अपना पुराना बयान सही लगता है तो फिर प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर इतनी तकलीफ क्यों हो रही है। किरण रिजिजू चरित्र हनन की बात किसलिए कर रहे हैं, क्या बलात्कार पीड़िता के समर्थन में खड़े होना भाजपा की नजर में चरित्र हनन है। असल बात यह है कि असलियत और नैतिकता के दिखावे के बीच भाजपा नेता फंस रहे हैं।

प्रियंका गांधी के जिस बयान को संसदीय कार्यवाही से हटा दिया गया, उसी बयान को राहुल गांधी ने बाहर आकर पत्रकारों के सामने कहा। राहुल ने लिखा भी कि बलात्कारियों का बचाव करने वाले व्यक्ति से ज़्यादा घटिया और कोई नहीं हो सकता। प्रहलाद जोशी हमारे शिक्षा तंत्र और उसमें पढ़ने वाले हर छात्र का अपमान हैं। जिन संस्थानों की देखरेख अब वे करते हैं, उनमें करोड़ों युवतियां पढ़ती हैं। भारत की महिलाएं प्रधानमंत्री मोदी के नए शिक्षा मंत्री को कभी स्वीकार नहीं करेंगी। विपक्षी सांसदों की ये टिप्पणियां बता रही हैं कि प्रहलाद जोशी के लिए भी शिक्षा मंत्रालय संभालना आसान नहीं होगा। बड़ी मुश्किल से धर्मेन्द्र प्रधान को मंत्रालय से हटाकर नरेन्द्र मोदी ने अपने लिए थोड़ी राहत का इंतजाम किया था, लेकिन अब प्रहलाद जोशी के कारण और बड़ी मुसीबत में मोदी फंस सकते हैं। क्योंकि सरकार का रवैया अब भी घृणा और तिरस्कार दिखाने का ही है।

हम जानते हैं कि जंतर-मंतर पर सरकार के विरोध में एक महीने से लंबा आंदोलन चला, जो शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ। नरेन्द्र मोदी ने शुरु से अपनी छवि एक सख्त प्रशासक के तौर पर बनाई थी, उनके समर्थकों ने भी 56 इंच की छाती, दुश्मनों को लाल आंखें दिखाना जैसी बातों को खूब बढ़ाकर एक गुब्बारा सा बना लिया था, जिसके भीतर कठोर, मजबूत फैसले लेने वाले प्रधानमंत्री दिखाई देते थे। लेकिन नयी पीढ़ी के निडर रवैये और अपनी वाजिब मांगों के लिए डटकर खड़े रहने के कारण मोदी को झुकना पड़ा। मोदी झुके ही नहीं, उनके नाम पर फुलाया हुआ गुब्बारा भी फूट गया। क्योंकि इस प्रदर्शन में धर्मेन्द्र प्रधान से ज्यादा गुस्सा नरेन्द्र मोदी के लिए नजर आया। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ पहली बार नहीं हुआ था, बल्कि मोदी सरकार के बारह सालों में शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा मंत्री दोनों लगातार विवादों में रहे। धर्मेन्द्र प्रधान ने तो फिर भी पांच साल इस पद पर काम किया, लेकिन उनके अलावा कोई और इतना लंबा नहीं टिक सका।

2014 से अब तक मोदी सरकार के तीन कार्यकालों में कुल पांच शिक्षा मंत्री बने हैं। अपने पहले कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी ने स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्री बनाया, और उनके रहते ही इस मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय किया गया। स्मृति ईरानी 26 मई, 2014 से 5 जुलाई 2016 तक शिक्षा मंत्री के पद पर रहीं। इस दौरान उनकी अपनी डिग्री, ज्योतिष को हाथ दिखाना, तीसरी भाषा के तौर पर संस्कृत को अनिवार्य करना जैसे फैसले लिए गए, जिससे विवाद खड़े हुए। लेकिन उनके कार्यकाल में सबसे ज्यादा सरकार की बदनामी रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू में हुए प्रदर्शन के कारण हुई। जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह बताते हुए जिस तरह गिरफ्तारी की गई थी, उस पर स्मृति ईरानी पर विपक्ष हमलावर हुआ था। वहीं जनवरी, 2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या मामले में भी विपक्ष ने उन पर सवाल उठाए। इसके बाद जुलाई, 2016 में स्मृति ईरानी से शिक्षा मंत्रालय वापस लेकर उन्हें कपड़ा मंत्रालय दे दिया गया। फिर प्रकाश जावड़ेकर 5 जुलाई, 2016 से 30 मई, 2019 तक भारत सरकार के शिक्षा मंत्री के पद पर रहे। जावड़ेकर के कार्यकाल में ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की स्थापना हुई। इसका मकसद यह था कि राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली प्रवेश परीक्षाओं का संचालन एक ही संस्था के पास हो। लेकिन जिस तरह बार-बार नीट पेपर लीक हुए उसमें अब एनटीए घिरा हुआ है। जावड़ेकर के शिक्षा मंत्री रहते ही 2018 में सीबीएसई बोर्ड का पेपर लीक होने का विवाद खड़ा हुआ। इसके अलावा जिओ इंस्टीट्यूट को भारत के छह इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस में से एक बताया गया, जिस पर खूब विरोध हुआ। इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस भारत सरकार और यूजीसी की तरफ से शुरू की गई एक योजना है, जिसके तहत 20 विश्व-स्तरीय शिक्षण और अनुसंधान संस्थान तैयार किए जाते हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के चुनिंदा सार्वजनिक और निजी संस्थानों को पूर्ण स्वायत्तता देकर वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट बनाना है। इस सूची में रिलायंस समूह के संस्थान को शामिल किया गया तो सवाल उठे। बहरहाल 2019 में मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में रमेश पोखरियाल निशंक को शिक्षा मंत्री बनाया गया। पोखरियाल के कार्यकाल में ही नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की घोषणा लागू हुई। लेकिन पोखरियाल के शिक्षा मंत्री रहने के दौरान सबसे बड़ी शिकायत यह रही कि जेएनयू, बीएचयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में कई महीनों तक कुलपतियों की नियुक्ति नहीं हुई। इसी तरह पटना, भुवनेश्वर, दिल्ली, इंदौर और मंडी इन पांच आईआईटी में भी पूर्णकालिक निदेशक नहीं नियुक्त किए गए। 7 जुलाई, 2021 को निशंक ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसकी वजह कोरोना के कारण स्वास्थ्य खराब होना कहा गया। फिर इस पद पर धर्मेन्द्र प्रधान आए और अब उन्हें किस तरह शिक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा, यह सबने देखा है। प्रहलाद जोशी तो शिक्षा मंत्री बनते ही विवादों में घिर गए हैं।

मोदी सरकार के 12 सालों में शिक्षा मंत्रालय जैसे अहम विभाग का यह हश्र देखकर देश के पहले शिक्षा मंत्री भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद याद आते हैं, जिन्होंने ग्यारह बरस तक इस मंत्रालय को संभाला। मौलाना आजाद ने आईआईटी की नींव रखी। खड़गपुर में देश का पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी खुला, जिसके कारण तकनीकी शिक्षा की नयी राहें खुलीं। देश भर के विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने और उसकी देखरेख के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की स्थापना की। तकनीकी शिक्षा के उचित विकास के अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद गठित की। कला, साहित्य और संस्कृति के विकास और संरक्षण के लिए साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी जैसे राष्ट्रीय संस्थान बनाए। दूसरे देशों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान और संबंध मजबूत करने के लिए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद यानी आईसीसीआर बनाया। देश की आजादी के शुरुआती ग्यारह बरसों में ही मौलाना आजाद ने ऐसे संस्थान बनाए जिनसे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने की मजबूत नींव तैयार हुई। इसी नींव पर विकास की नयी मंजिलें बनाने का काम आगे की सरकारों ने किया। लेकिन मोदी सरकार के 12 सालों में एक अलग किस्म की नींव शिक्षा क्षेत्र में डाली गई है, जिसमें नफरत, संकुचित सोच, कट्टरता की मंजिलें बन रही थीं। गनीमत है कि नयी पीढ़ी ने इस पर आगे निर्माण को रोकने की आवाज उठाई है। लेकिन क्या मोदी सरकार इस आवाज को सुनेगी।

Tags:    

Similar News