युवाओं के सत्याग्रह ने अपने पीछे कुछ सबक छोड़े

आंदोलन ने सत्ता में बैठे लोगों को अपनी कार्यशैली में जरूरी बदलाव पर विचार का मौका दिया है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-07-30 22:00 GMT
  • राजेश पांडेय

आंदोलन ने सत्ता में बैठे लोगों को अपनी कार्यशैली में जरूरी बदलाव पर विचार का मौका दिया है। सत्ता के दुरुपयोग, उसके केंद्रीकरण के खिलाफ लोगों के उठ खड़े होने के बारे में चेतावनी दी है। प्रधान के इस्तीफे से निश्चय ही दूसरे मंत्री सतर्क हो जाएंगे। दरअसल, यह सुरक्षा के अघोषित और अदृश्य कवच में दरार आने का संकेत है। भाजपा सरकार में किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं होने का मिथक टूट गया है।

जंतर-मंतर पर एक माह तक चले युवाओं के आंदोलन ने कुछ सबक सिखाए हैं, कुछ मुद्दों पर रोशनी डाली है, कुछ उम्मीदें जगाई हैं और साहस, सत्याग्रह की अहमियत को सामने रखा है। यह आंदोलन कई मायनों में अद्वितीय है। उसने लोकतंत्र, संविधान के बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी और सत्ता का दुरुपयोग करने वाली सरकार को अपने कदम पीछे हटाने के लिए विवश किया है। इससे पहले किसान आंदोलन के कारण सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेना पड़े थे। लेकिन दोनों आंदोलनों में कुछ फर्क है। किसान आंदोलन का प्रभाव पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिम उत्तरप्रदेश में अधिक था। वहीं युवाओं की हलचल तेजी से फैल रही थी। उसमें छात्रों के परिजन शामिल हो रहे थे। भाजपा का समर्थन करने वाले मध्यम वर्ग में भी बेचैनी थी।

बहुत कम लोगों को शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की उम्मीद थी। राजनीतिक पर्यवेक्षक सत्ताधारी दल के एक वरिष्ठ नेता के बयान का जिक्र करते थे कि भाजपा में इस्तीफे नहीं होते हैं। संतोष का विषय है कि युवाओं ने सरकार को जवाबदेही और जिम्मेदारी का अहसास कराया है। उनके आंदोलन के कारण पहली बार शिक्षा राजनीतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में आ गई है। छात्रों ने संदेश दिया है कि अब भी अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीकों से मनमानी करने वाली सरकार पर अंकुश लगाना संभव है। शासकों के इशारों पर चलने वाली संस्थाओं को सचेत होने का अवसर दिया है।

भारत में संवाद, विरोध और अहिंसक तरीके से अपनी अपेक्षाओं को जाहिर करने की परंपरा पुरानी है। इसके सबसे बड़े प्रतीक महात्मा गांधी हैं। उनके सत्याग्रह ने भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। आजादी के बाद कई मौकों पर जनमत जगाने वाले आंदोलन हुुए हैं। 1970 के दशक में गुजरात से शुरू हुए छात्रों के नवनिर्माण आंदोलन ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की जमीन तैयार की थी। फिर 2011-12 के अन्ना आंदोलन ने यूपीए सरकार की चुनावी हार का रास्ता बनाया। इन आंदोलनों में गैर-राजनीतिक संगठनों, आम लोगों के अलावा राजनीतिक दलों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

छात्रों के मौजूदा आंदोलन के पीछे सुनियोजित रणनीति और कार्यक्रम नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की एक टिप्पणी के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी अस्तित्व में आई। उसने दिल्ली में धरना शुरू किया और इसकी गूंज पूरे देश तक पहुंच गई। चंद दिनों के भीतर हजारों युवा दिल्ली में जुट गए। सरकार के दमन ने आग में घी डाला। पुलिस ने आंसू गैस, पैलेट गन, लाठीचार्ज के जरिये जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। इंटरनेट बंद करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। युवा शक्ति की क्रिएटिविटी से उपजे हास्य, व्यंग्य की पैनी धार के सामने तमाम तरीके बेअसर हो गए। छात्रों के पोस्टर और मीम भारी पड़े। सोशल मीडिया ने आंदोलन की हलचल को हर जगह पहुंचा दिया।

सरकार की जी-हुजूरी करने और विपक्षी पार्टियों को हमेशा निशाना बनाने वाले गोदी मीडिया के पैंतरे बेकार गए। आंदोलन का स्वरूप और उसकी रफ्तार सरकार की कल्पना से परे थी। उसने छात्रों से लगातार बातचीत की। लेकिन छात्र अपने रुख पर अडिग रहे। आंदोलन के पीछे पाकिस्तान, चीन का हाथ होने जैसे पुराने नकारात्मक दांव भी काम नहीं आए। विरोध को देशद्रोह और राष्ट्रविरोधी बताने का जाना-पहचाना हथियार भी कुंद साबित हुआ। यहां प्रमुख विपक्षी दलों कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने छात्रों का समर्थन करने के साथ थोड़ी दूरी बनाए रखने की सावधानी बरती। इस चतुराई के कारण आंदोलन को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित घोषित नहीं किया जा सका है। सोनम वांगचुक के लंबे अनशन ने आंदोलन को नैतिक समर्थन दिया।

छात्रों के विरोध ने शिक्षा व्यवस्था की कई मूलभूत समस्याओं, उच्च शिक्षण संस्थाओं की नियुक्तियों में पेशेवर मापदंडों को दरकिनार रखने सहित कई खामियों पर फिर बहस की जरूरत बताई है। पिछले कुछ वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थाओं में अहम पदों पर नियुक्तियों में योग्यता, विद्वता, पेशेवर क्षमता की बजाय विचारधारा को तवज्जो दी गई है। स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव पर भी विचारधारा हावी है। परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर गहराते संकट ने छात्रों को उद्वेलित किया है। साल दर साल तैयारियों के बाद जब पेपर लीक हो जाएं, समय पर रिजल्ट आने का कोई भरोसा न रहे तब असंतोष का विस्फोट होना स्वाभाविक है।

सत्याग्रह ने शिक्षा और रोजगार से जुड़े कुछ बिंदुओं को चर्चा के केंद्र में रख दिया है। यहां हम युवाओं के मुद्दों पर गौर करेंगे। युवाओं की हताशा बढ़ती बेरोजगारी से जुड़ी है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकानॉमी के अनुसार- जॉब्स में 15 साल और उससे अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी 2016-17 के 42.7प्रतिशत से घटकर मार्च 2026 में 38.7 प्रतिशत रह गई। इसलिए समस्या के सभी पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। मई में नीट की पहली परीक्षा में बीस लाख से अधिक छात्र बैठे थे। प्रश्नपत्र लीक होने के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई। इसके बाद एक दर्जन से अधिक छात्रों के आत्महत्या करने की खबरें आईं।

भारत में दुर्घटनाओं और आत्महत्याओं से मौतों पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में 8068 छात्रों ने आत्महत्या की थी। यह संख्या 2024 में 14288 रही। अंग्रेजी अखबार हिंदू में प्रकाशित खबर में बताया गया है, संसद में शिक्षा मंत्रालय ने जानकारी दी कि छात्रों की आत्महत्या के कारणों में अकादमिक तनाव, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक स्वास्थ्य, धन की तंगी और व्यक्तिगत टकराव शामिल हैं। रिपोर्ट में परीक्षा में विफलता को प्रमुख कारण बताया गया है। 2014 से 2024 के बीच छात्रों की आत्महत्याओं के कुल मामलों में 21प्रतिशत छात्रों ने इस कारण जान दे दी। इस अवधि में सिर्फ 2021 को छोड़कर हर साल दो हजार से अधिक छात्रों ने विभिन्न परीक्षाओं में विफलता की वजह से जीवन गंवा दिया।

प्रश्नपत्रों के लीक होने से कई तरह का बोझ पड़ता है। छात्रों और उनके परिवार के लिए परीक्षाओं की तैयारी महंगी पड़ती है। हर साल बड़ी संख्या में छात्र कोचिंग संस्थाओं की शरण में जाते हैं। शिक्षा पर विस्तृत मॉड्यूलर सर्वे 2025 (सीएमएस-ई) के अनुसार हायर सेकंडरी के 37प्रतिशत शहरी और ग्रामीण छात्रों ने प्राइवेट कोचिंग ली है। इस स्तर पर प्रति छात्र कोचिंग का खर्च 6384 रुपए आया है। शिक्षा के संबंध में कुछ आंकड़े चिंताजनक हैं। पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार के शिक्षा बजट में भारी गिरावट आई है। यह यूपीए सरकार के अंतिम वर्ष 2013-14 के 4.6 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 2.5 प्रतिशत पर आ पहुंचा है।

शिक्षा पर खर्च के मामले में राज्यों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। संविधान की सातवीं अनुसूची में शिक्षा समवर्ती सूची में आती है। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों का बंटवारा किया गया है। 2013-14 में शिक्षा के खर्च में राज्यों का हिस्सा 17प्रतिशत के आसपास था। अब यह करीब 13प्रतिशत है। मतलब शिक्षा पर केंद्र और राज्यों की दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ सरकार नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) जैसी संस्था बनाकर कई परीक्षाएं कराने का अधिकार अपने हाथ में ले लेती है। दूसरी ओर वह अपनी जिम्मेदारियों में नाकाम साबित होती है। एजेंसी के पास पर्याप्त स्टाफ तक नहीं है। वह तदर्थवाद की चपेट में है। उसके 39 में से 15 पद खाली पड़े हैं। सभी 24 कर्मचारी दूसरे विभागों से डेपुटेशन पर आए हैं। एनटीए डेटा एनालिसिस, कानूनी और अन्य कामों के लिए 124 आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवाएं ले रही है।

आंदोलन ने सत्ता में बैठे लोगों को अपनी कार्यशैली में जरूरी बदलाव पर विचार का मौका दिया है। सत्ता के दुरुपयोग, उसके केंद्रीकरण के खिलाफ लोगों के उठ खड़े होने के बारे में चेतावनी दी है। प्रधान के इस्तीफे से निश्चय ही दूसरे मंत्री सतर्क हो जाएंगे। दरअसल, यह सुरक्षा के अघोषित और अदृश्य कवच में दरार आने का संकेत है। भाजपा सरकार में किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं होने का मिथक टूट गया है। सत्याग्रह ने सरकारी तंत्र, न्यायपालिका और मीडिया को आजादी से काम करने का रास्ता दिखाया है। उसने सत्ता की सीमाएं याद दिलाई हैं। वह कहता है कि इंसाफ और अधिकारों की लड़ाई संविधान और कानून के दायरे में रहकर लड़ी जा सकती है। एकजुटता, संगठन और शांतिपूर्ण तरीके से आम नागरिक अपनी आवाज असरदार बना सकते हैं। युवाओं ने समूचे राजनीतिक प्रतिष्ठान को मैसेज दिया है कि सिर्फ धर्म और जाति से अलग हटकर दूसरे मुद्दों को भी ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया है कि वे भी अन्याय, एकाधिकार, संवैधानिक संस्थाओं को बौना बनाने की प्रवृत्ति का प्रतिकार कर सकते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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