ललित सुरजन की कलम से- फर्जी मुठभेड़ : खतरनाक प्रवृत्ति
40 साल पहले दिल्ली-उत्तरप्रदेश की सीमा पर शायद यमुना के किसी पुल पर एक कुख्यात अपराधी को दिल्ली पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था।;
'देश में अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिराने का चलन नया नहीं है। मुझे ध्यान आता है कि आज से 40 साल पहले दिल्ली-उत्तरप्रदेश की सीमा पर शायद यमुना के किसी पुल पर एक कुख्यात अपराधी को दिल्ली पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था। उस समय वह शायद इस तरह का पहला प्रसंग था और इसके कारण दिल्ली पुलिस को कोई वाहवाही नहींमिली थी, उल्टे सारे राजनीतिक दलों ने इस अवैधानिक कृत्य की आलोचना ही की थी।
दुर्भाग्य से यह सिलसिला वहीं खत्म नहीं हुआ, बाद के बरसों में महाराष्ट्र में खासकर मुंबई में तस्करी, हत्या आदि अपराधों में लिप्त अपराधियों को एनकाउंटर में मारने का चलन प्रारंभ हुआ और यहां तक बढ़ा कि कुछ पुलिस कर्मी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के विशेषण से विभूषित होने लगे।
इनमें से कुछेक का महिमामंडन इस सीमा तक हुआ कि उन पर फिल्में बनने लगीं तथा बालीवुड के महानायकों ने इन्हें पुरस्कृत भी किया। एक दुर्दांत अपराधी के खात्मे से शांतिप्रिय समाज कुछ समय के लिए राहत महसूस कर सकता है, लेकिन यह प्रवृत्ति अपनी परिणति में समाज के लिए किस तरह घातक हो सकती है, यह मीमांसा की जाना अभी बाकी है।'
(देशबन्धु में 11जुलाई 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/07/blog-post_10.html