अब युद्धविराम को लालायित ट्रंप
अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह लड़ाई अमेरिका को पहले ही महंगी पड़ रही है
अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह लड़ाई अमेरिका को पहले ही महंगी पड़ रही है। इस युद्ध में ईरान अब तक 3 हजार से ज्यादा ड्रोन दाग चुका है, उसके शाहेद ड्रोन की कीमत करीब 20 हजार डॉलर बताई जाती है, जबकि इन्हें गिराने के लिए अमेरिका की जो मिसाइलें इस्तेमाल हो रही हैं, उनकी कीमत 10 लाख डॉलर से भी ज्यादा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले तीन-चार दिनों से युद्धविराम पर कुछ ज्यादा ही जोर दे रहे हैं। इससे पहले तक ट्रंप बारंबार ऐलान कर रहे थे कि युद्ध अब खत्म होने ही वाला है, ईरान को हम बस जीतने ही वाले हैं, ईरान बस अब घुटनों पर आने ही वाला है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ट्रंप को हकीकत का एहसास हो गया कि 28 फरवरी को ईरान पर हमला बोलने और अली खामेनेई की हत्या के बाद वहां अपनी मर्जी का शासक नियुक्त करने और उसके साथ ही ईरानी तेल भंडारों पर कब्जे के जो ख्वाब उन्होंने देखे थे, वो अब पूरी तरह बिखर चुके हैं। इसलिए युद्ध के 26 दिन बीतने के बाद युद्ध छेड़ने वाला अमेरिका पीछे हटता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन ट्रंप अपनी अकड़ अब भी बरकरार रखने के लिए दावा कर रहे हैं कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है। जबकि ईरान ने किसी बातचीत या उसकी संभावना तक से इंकार कर दिया है। हालांकि नामुमकिन जैसा कोई शब्द राजनीति में नहीं होता, तो हो सकता है कि आज नहीं तो कल ईरान और अमेरिका फिर बातचीत की मेज पर आएं। लेकिन फिलहाल तो इसमें अमेरिका ज्यादा लालायित दिख रहा है, वहीं जख्मी ईरान और ज्यादा पलटवार करने के इरादे दिखा रहा है। ट्रंप की लाचारी की यह पराकाष्ठा है कि भारत-पाकिस्तान समेत आठ देशों में जंग खत्म करने के दावे करने वाले वो खुद अब मध्यस्थ की तलाश में हैं। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान ईरान और अमेरिका में बातचीत करवा सकता है, इसमें अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल हो सकते हैं, लेकिन ईरानी पक्ष से कौन आएगा यह पता नहीं।
पाकिस्तान अगर वाकई यह मध्यस्थता करवाता है, तो भारत के लिए यह बड़ी मात होगी। क्योंकि दुनिया में अब तक पाकिस्तान की छवि आक्रांता देश की रही है, जबकि भारत शांतिदूत की भूमिका में रहा है। अब पाकिस्तान अगर भारत का यह ओहदा छीनने में सफल होता है तो यह मोदी सरकार की बहुत बड़ी कूटनीतिक पराजय होगी। अगर मोदी शुरु से नेहरूजी की बनाई विदेश नीति पर चलते तो न उन्हें किसी को गले लगाने या माई डियर फ्रेंड बोलने की जरूरत पड़ती, न बिना बात हाहा-हीही करने की। लेकिन निजी छवि के लिए मोदी ने यही सब किया अब भुगतान पूरा देश कर रहा है। अंग्रेजी का एक जुमला है कि तुम मुझे बताओ कि तुम्हारे दोस्त कौन हैं और मैं तुम्हें बताता हूं कि तुम कौन हो। वैसे मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा में मध्यपूर्व की जंग पर अपना संक्षिप्त वक्तव्य देने के बाद बुधवार शाम सर्वदलीय बैठक भी बुलाई है। इसमें वो पहले की बैठकों की तरह अनुपस्थित रहेंगे या सारे दलों के नेताओं से चर्चा करने की हिम्मत दिखाएंगे, ये पता चल ही जाएगा। इस बीच नरेन्द्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच होर्मुज खुलवाने से लेकर ऊर्जा संकट आदि मुद्दों पर फोन पर चर्चा हुई है। इस बात की जानकारी भी पहले भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने दी और फिर प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसके बारे में सोशल मीडिया पर बताया। गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी प्रधानमंत्री मोदी से बात की। उन्होंने मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने का महत्व शामिल है।' कुछ देर बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक्स पर पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि बातचीत उपयोगी रही। भारत तनाव कम करने और जल्द शांति बहाल करने का समर्थन करता है। होर्मुज स्ट्रेट को खुला, सुरक्षित और सबके लिए पहुंच योग्य रखना वैश्विक स्थिरता के लिए बेहद ज़रूरी है।
खुद को लोकतंत्र का रहनुमा बताने वाले इन दोनों नेताओं में जो बातचीत हुई, उसमें कुछ नया नहीं है। इस चर्चा का महत्व तो तब रहता जब मोदी ट्रंप को दो टूक कहने की हिम्मत दिखाते कि आपने युद्ध छेड़कर ठीक नहीं किया और आपके कारण अब हम भी मुश्किल में फंसे हैं। लेकिन ऐसी कोई बात का जिक्र इस चर्चा में नहीं था। बाकी मोदी की हिम्मत पर सवाल इसलिए भी है कि वे लोकसभा और राज्यसभा में अपने साथी सांसदों से कह सकते थे कि मैं इस संकट के बारे में ट्रंप से चर्चा करने वाला हूं। या बात होने के फौरन बाद ही सोशल मीडिया पर जानकारी दे देते। लेकिन उन्होंने पहले सर्जियो गोर की पोस्ट का इंतजार किया, फिर अपनी तरफ से देश को जानकारी दी। ठीक वैसे ही जैसे ऑपरेशन सिंदूर को अचानक रोकने की जानकारी पहले ट्रंप ने दी थी, फिर अमेरिका ने। इसके बाद अगर विपक्ष कहे कि पीएम कॉम्प्रोमाइज़्ड हैं, तो इन्हें बुरा लग जाता है।
बहरहाल, 26 दिनों के युद्ध में हजारों मौतें हुई हैं, लाखों परिवार बर्बाद हुए हैं, कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं, अरबों का धन बर्बाद हुआ है, दोनों हाथों से संपदा लुटाने वाली धरती को गोले-बारूद की मार से मरणासन्न किया गया है, बेजुबान पशु-पक्षियों, फूलों, पेड़ों, अनगिनत जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर बन आई है, नदियां, सागर, पोखर, तालाब जहरीले हो चुके हैं और अब भी जीत की कोई संभावना नहीं दिख रही तो डोनाल्ड ट्रंप बेतुके तर्कों से युद्धविराम की बात कर रहे हैं। हालांकि ईरान शुरु से कहता आया है कि युद्ध वह अपनी शर्तों पर बंद करेगा और खून की आखिरी बूंद तक लड़ेगा। इसलिए इस समय भी उसके हमले तेज हैं और निशाने पर है इजरायल, जो ट्रंप की तरह युद्ध खत्म करने की बात तो नहीं कर रहा, लेकिन इस बारे में खबरें जरूर फैला रहा है। सऊदी अरब के मीडिया अल अरबिया ने इजरायली अखबार येदिओथ अहरोनोथ के हवाले से बताया कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने चुपके से अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ को बताया है कि सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने किसी संभावित समझौते तक पहुंचने के लिए बातचीत को मंजूरी दे दी है।
यह खबर किसी चुटकुले से कम नहीं है, क्योंकि इजरायल यह तो तय कर ले कि मोजतबा खामेनेई के बारे में उसे दुनिया को क्या बताना है। कभी वह मोजतबा खामेनेई के मरने की बात करता है, कभी उन्हें गंभीर रूप से घायल बताता है और अब कह रहा है कि वे किसी संभावित समझौते के लिए बातचीत करने तैयार हैं। इतनी पलटी मारने के बाद इजरायल की विश्वसनीयता खाक रह गई है और यही हाल ट्रंप का भी है। शुक्रवार को ट्रंप ने कहा था कि युद्ध खत्म होने की कगार पर है, शनिवार को ट्रंप ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया और सोमवार को पांच दिन के सीजफायर की बात कह दी। फिर ये भी कहा कि होर्मुज पर मैं और नया अयातुल्लाह मिलकर नियंत्रण रखेंगे। यानी ट्रंप ने दूसरे तरीके से यह मान लिया कि ईरान में नया सुप्रीम लीडर उन्हें मंजूर है, क्योंकि अब तक तो मोजतबा खामेनेई की हत्या की धमकी ट्रंप और नेतन्याहू दोनों दे रहे थे।
दरअसल इन दोनों नेताओं को ये समझ आ गया है कि ईरान के साथ-साथ पूरी दुनिया का जो नुकसान इनकी सनक में हुआ है, उसे अब और ज्यादा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इधर खबर है कि मोजतबा खामेनेई के वरिष्ठ सैन्य सलाहकार मोहसिन रेजाई ने कहा है कि , 'अगर ट्रंप ईरान के बुनियादी ढांचे पर हमला करते हैं, तो यह अब 'आंख के बदले आंख' तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एक आंख के बदले सिर, हाथ और पैर से जवाब दिया जाएगा। अमेरिका लंगड़ा हो जाएगा!' रेजाई ने यह भी दावा किया कि अमेरिका युद्धविराम के लिए तैयार था लेकिन नेतन्याहू ने जारी रखने पर जोर दिया।'
दरअसल अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह लड़ाई अमेरिका को पहले ही महंगी पड़ रही है। इस युद्ध में ईरान अब तक 3 हजार से ज्यादा ड्रोन दाग चुका है, उसके शाहेद ड्रोन की कीमत करीब 20 हजार डॉलर बताई जाती है, जबकि इन्हें गिराने के लिए अमेरिका की जो मिसाइलें इस्तेमाल हो रही हैं, उनकी कीमत 10 लाख डॉलर से भी ज्यादा है। अगर यही हिसाब हजारों बार दोहराया जाए, तो समझ आता है कि अमेरिकी रक्षा अधिकारियों की चिंता क्यों बढ़ रही है। वहीं खाड़ी देशों का खर्च भी बढ़ रहा है। संयुक्त अरब अमीरात का कहना है कि उसने 28 फरवरी के बाद से अब तक 1600 से ज्यादा ड्रोन गिराए हैं। इसके लिए ज्यादातर फाइटर जेट और ऐसे हथियार इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो असल में दूसरे फाइटर जेट को मारने के लिए बनाए गए थे, ना कि धीमी रफ्तार से उड़ने वाले छोटे ड्रोन के लिए। यह तरीका फिलहाल काम तो कर रहा है, लेकिन लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।
खाड़ी देशों की सेनाएं एक अलग तरह के युद्ध के लिए तैयार थीं। उन्होंने तेज, ऊंचाई पर उड़ने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से निपटने के लिए भारी निवेश किया, लेकिन हजारों की संख्या में आने वाले छोटे, धीमे और नीचे उड़ने वाले ड्रोन के खतरे को सही तरीके से नहीं समझा। ये ड्रोन रडार की सीमा से नीचे निकल जाते हैं, क्योंकि सिस्टम को इस तरह के खतरे के लिए अपडेट ही नहीं किया गया था। ईरान ने अमेरिका और उसके साथियों को जवाब देने की तैयारी कब से कर रखी थी, ये अब पता चल रहा है। लेकिन मोसाद और सीआईए जो दुनिया की सबसे खतरनाक जासूसी के लिए जानी जाती हैं, उनकी असलियत भी अब सबके सामने आ गई है कि वे ईरान की असल क्षमता को पहचान ही नहीं पाए।