राहुल गांधी से इतना क्यों डरती है भाजपा और सरकार?
वैसे तो भारतीय जनता पार्टी के तमाम बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री अक्सर यह कहते पाए जाते हैं कि वे राहुल गांधी को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते;
- अनिल जैन
पिछले दिनों पश्चिम एशिया में शुरू हुए युद्ध को लेकर जब राहुल ने भारत में भी ऊर्जा संकट और आर्थिक मंदी की चेतावनी दी, तो भाजपा नेताओं और मीडिया ने उनकी खूब खिल्ली उड़ाई। खुद मोदी ने पांच राज्यों में अपनी चुनावी रैलियों में राहुल की चेतावनी को खारिज करते हुए उन पर लोगों को डराने का आरोप लगाया। मगर चुनाव खत्म होते ही खुद मोदी ने मान लिया कि पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते दुनिया भर में ऊर्जा का संकट पैदा हो गया है।
वैसे तो भारतीय जनता पार्टी के तमाम बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री अक्सर यह कहते पाए जाते हैं कि वे राहुल गांधी को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते। मगर होता यह है कि राहुल गांधी जब भी भाजपा और उसकी सरकार, खास कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनके उद्योगपति मित्रों को लेकर कोई सवाल उठाते हैं या गंभीर आरोप लगाते हैं अथवा किसी बड़े संकट से सरकार को आगाह करते हैं या फिर चुनावी गड़बड़ियों को लेकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं, तो उनका जवाब देने के लिए भाजपा के तमाम बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री मैदान में उतर जाते हैं। वे राहुल की बातों या उनके आरोपों का कोई तर्कसंगत जवाब देने के बजाय कभी उन्हें पागल, पप्पू, मूर्ख आदि विशेषणों से नवाजते हैं या उन्हें देशद्रोही, कभी चीन और जॉर्ज सोरोस का एजेंट तो कभी आतंकवादी तक करार देने लगते हैं।
भाजपा नेताओं के इस अभियान में उसके प्रचारतंत्र का हिस्सा बन चुके कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया के साथ ही रिटायर हो चुके कुछ पत्रकार और संपादक भी बतौर राजनीतिक विश्लेषक शामिल हो जाते हैं। कुछ मौकों पर सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के रिटायर जजों, पूर्व नौकरशाहों व सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के समूह को तक भाजपा राहुल के खिलाफ मैदान में उतार देती है। ऐसे सेवानिवृत्त जजों और नौकरशाहों में कुछ तो ऐसे होते हैं, जिन पर उनके सेवाकाल में लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच चल रही होती है और कुछ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि वाले होते हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया में भाजपा ईकोसिस्टम भी पूरी सक्रियता से राहुल गांधी के चरित्र हनन में जुट जाता है।
बात यहीं नहीं रुकती। राहुल गांधी के बयानों को लेकर उनके खिलाफ़ भाजपा शासित राज्यों में मुकदमे भी दर्ज करा दिए जाते हैं। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए संगीन से संगीन अपराध की एफआईआर दर्ज कराना बेहद मुश्किल काम है, लेकिन राहुल के खिलाफ शिकायत चंद मिनटों में दर्ज हो जाती है। इतना ही नहीं, कुछ ही दिनों बाद उस एफआईआर के आधार पर निचली अदालत राहुल को समन भी जारी कर देती है। इस समय राहुल गांधी देश में अकेले ऐसे नेता हैं जिनके खिलाफ 'भावनाएं आहत करने' के करीब 400 मुकदमे देश भर में दर्ज हैं। राहुल के बयानों को लेकर इस बहुआयामी कवायद में भाजपा की बौखलाहट और डर साफ नजर आता है।
नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना महामारी के समय राहुल द्वारा दी गई चेतावनियों को लेकर भी भाजपा ने ऐसा ही किया था। पिछले दिनों पश्चिम एशिया में शुरू हुए युद्ध को लेकर जब राहुल ने भारत में भी ऊर्जा संकट और आर्थिक मंदी की चेतावनी दी, तो भाजपा नेताओं और मीडिया ने उनकी खूब खिल्ली उड़ाई। खुद मोदी ने पांच राज्यों में अपनी चुनावी रैलियों में राहुल की चेतावनी को खारिज करते हुए उन पर लोगों को डराने का आरोप लगाया। मगर चुनाव खत्म होते ही खुद मोदी ने मान लिया कि पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते दुनिया भर में ऊर्जा का संकट पैदा हो गया है, जो समूची अर्थव्यवस्था को गहरे तक प्रभावित कर रहा है। उन्होंने इस सिलसिले में लोगों से पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, खाद तेल, रासायनिक खाद आदि के इस्तेमाल में कटौती करने और कम से कम एक साल तक सोना खरीदने से बचने की अपील भी की।
इस समय भी राहुल गांधी अपने एक बयान को लेकर पूरी केंद्र सरकार, भाजपा और मीडिया के निशाने पर हैं। राहुल ने अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में कहा कि वैश्विक स्तर पर बिगड़ते आर्थिक हालात से भारत भी अछूता नहीं है, जिसके चलते तेजी से बढ़ रही महंगाई और बेरोजगारी से लोगों में सरकार के प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा है। इसका असर देश की राजनीति पर भी जल्द ही दिखाई देगा और मोदी सरकार गिर जाएगी। राहुल के इस बयान में भाजपा अपनी सरकार के खिलाफ साजिश सूंघ रही है और उसके तमाम बड़े-छोटे नेताओं के नथूने फड़फड़ा रहे हैं।
तमाम केंद्रीय मंत्री, भाजपा के प्रवक्ता, टीवी चैनलों के एंकर और भाजपा समर्थक राजनीतिक विश्लेषक राहुल गांधी के इस बयान पर बुरी तरह उबलते हुए कह रहे हैं कि राहुल का यह बयान एक निर्वाचित सरकार और देश को अस्थिर करने की खतरनाक मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन है। राहुल के बयान पर यह प्रतिक्रिया बताती है कि भाजपा और उसकी सरकार का शीर्ष नेतृत्व हर मोर्चे पर अपनी नाकामी से उपज रहे व्यापक जन-असंतोष से बुरी तरह घबराया हुआ है और वह राष्ट्रवाद व देशभक्ति की दुहाई देते हुए उस अंसतोष का दमन करने का इरादा रखता है। सेमुअल जानसन ने दो सौ साल पहले ठीक ही कहा था-'देशभक्ति, दुष्टों की अंतिम शरणस्थली होती है।'
राहुल की भविष्यवाणी में कितना दम है, यह एक अलग बात है लेकिन बहरहाल देश में मूर्खता और मक्कारी के अंतिम पायदान पर खड़े इन भाजपा नेताओं, टीवी चैनलों के एंकरों और सत्ता के दलाल कथित राजनीतिक विश्लेषकों को यह बताना लाजिमी है कि राहुल गांधी देश में पहले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने सरकार के गिरने की भविष्यवाणी की है। उनसे पहले भी कई मौकों पर विपक्षी नेताओं ने अपने समय की निर्वाचित सरकारों के गिरने की भविष्यवाणियां की हैं। वे भविष्यवाणियां सही साबित भी हुईं लेकिन किसी ने विपक्षी नेताओं को देशद्रोही नहीं कहा या उन्हें देश को अस्थिर करने की साजिश में शामिल नहीं बताया।
इस सिलसिले में सबसे पहला वाकया 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार के समय का है। उस सरकार के बनने के कुछ समय बाद जनता पार्टी के नेताओं में आपसी सिर-फुटौव्वल शुरू हो गई थी। तब इंदिरा गांधी सहित कांग्रेस के कई नेता आए दिन कहते थे कि यह सरकार जल्दी ही गिर जाएगी और वह सरकार ढाई साल में गिर भी गई थी। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से बनी चौधरी चरण सिंह की सरकार के बारे में भी यही कहा गया और उस सरकार का भी चंद महीनों में ही अवसान हो गया। ऐसी ही भविष्यवाणी 1989 में भाजपा और वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से बनी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के लिए भी की गई थी। उस समय कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि यह सरकार जल्दी ही गिर जाएगी और हुआ भी वही। वह सरकार महज 11 महीने ही चल पाई। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से बनी चंद्रशेखर की सरकार का भी ऐसा ही हश्र हुआ।
बाद में 1996-1997 के दौरान देश में तीन सरकारें बनीं और तीनों के बारे में उस समय के विपक्षी नेताओं व राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके जल्दी ही गिरने की भविष्यवाणी की, जो सही साबित भी हुई। पहली सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की, महज 13 दिन में गिर गई। उसके बाद एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की अगुवाई में बनी संयुक्त मोर्चा की सरकारें भी एक-एक साल से ज्यादा नहीं चल पाईं। दोनों सरकारों के समय भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी थी और उसके शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार बनने के साथ ही कह दिया था कि ये सरकारें ज्यादा दिन नहीं चलेंगी लेकिन किसी ने भी वाजपेयी को देशद्रोही नहीं कहा था।
बाद में 1998 में वाजपेयी की अगुवाई में 26 छोटी-बड़ी पार्टियों के गठबंधन की सरकार बनी थी। उस सरकार के पास पूर्ण बहुमत था लेकिन वह सरकार भी महज 13 महीने ही चल पाई थी। उस सरकार के गिरने में स्पष्ट रूप से कांग्रेस की भूमिका थी लेकिन भाजपा की ओर से कांग्रेस के किसी नेता को या सरकार गिरने का प्रमुख कारण बनीं अन्ना डीएमके की नेता जयललिता को देशद्रोही नहीं कहा था। यह अलग बात है कि 1999 में फिर वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी जिसने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। उस दौरान भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता उस सरकार के गिरने की भविष्यवाणी अक्सर करते रहे थे लेकिन उन्हें वाजपेयी या उनके किसी सहयोगी ने कभी देशद्रोही नहीं कहा।
उसके बाद 2004 से 2014 तक कांग्रेस की अगुवाई में दस साल तक डॉ. मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकार चली। उस दौरान भी लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा के तमाम नेता अक्सर उस सरकार के गिरने की भविष्यवाणी करते थे। तब भी किसी ने उन्हें देशद्रोही नहीं कहा था। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से तो राजनीति ऐसी बदली है कि किसी भी मुद्दे पर सरकार का विरोध करने वाले को तत्काल देशद्रोही करार दे दिया जाता है। ऐसे में राहुल गांधी को सरकार गिरने की भविष्यवाणी करने पर देशद्रोही कहा जा रहा है तो इसमें हैरान होने जैसी कोई बात नहीं है। सवाल सिर्फ यही है कि जब सरकार के पास पूर्ण बहुमत है और भाजपा तथा पूरा मीडिया यह दावा करता है कि नरेन्द्र मोदी भारत के अब तक के सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली प्रधानमंत्री है तो फिर ऐसी भविष्यवाणी से डरना और बौखलाना क्यों?
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)