ललित सुरजन की कलम से बिलासपुर की पांच बहनें

'हमारे समाज में न जाने क्यों लड़कियों को शुरु से ही बोझ मान लिया जाता है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-05-28 22:00 GMT

'हमारे समाज में न जाने क्यों लड़कियों को शुरु से ही बोझ मान लिया जाता है। पुत्री को जन्म देने वाली मां को ससुराल में सास, ननद और परिवार के अन्य सदस्यों के ताने ही नहीं, प्रताडऩा भी झेलना पड़ती है।

जिन परिवारों में अर्थाभाव है वहां भूखे रहने की नौबत आए तो वह तकलीफ मां-बेटी को ही झेलना पड़ती है। बेटी की पढ़ाई-लिखाई की ओर दुर्लक्ष्य किया जाता है। उसकी स्वतंत्रता कदम-कदम पर बाधित होती है।

घर, सड़क, स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, ससुराल, उस पर अदृश्य निगाहें गड़ी रहती हैं। ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी जब लड़कियां अपना दमखम दिखाती हैं तो उन्हें एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन उस आदर्श का अनुकरण करने की बात कदाचित ही सोची जाती है।

इसके बावजूद अगर आज लड़कियां आगे बढ़ रही हैं तो इसका श्रेय आधुनिक शिक्षा और आधुनिक प्रौद्योगिकी को देना चाहिए।'

(देशबन्धु में 18 मई 2017 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/05/blog-post_18.html

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