यूएई से नॉर्डिक तक : भारत की कूटनीति, अवसर और अंतर्विरोध

भारत अपनी कूटनीति में पूर्णत: किसी एक धु्रव के साथ नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता के साथ आगे बढ़ रहा है।;

Update: 2026-05-28 21:50 GMT
  • अरुण कुमार डनायक

भारत अपनी कूटनीति में पूर्णत: किसी एक धु्रव के साथ नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता के साथ आगे बढ़ रहा है। नॉर्डिक दौरे में भारत को हरित ऊर्जा, तकनीक व निवेश में—नॉर्वे, स्वीडन और नीदरलैंड के साथ—ठोस लाभ मिले। यूएई यात्रा ऊर्जा और निवेश के क्षेत्र में और अधिक प्रभावी होती, यदि भारत ईरान पर हुए हमलों पर अपनी स्पष्ट चिंता जताता।

मई 2026 की नरेंद्र मोदी की यूएई यात्रा में अनेक अहम समझौते हुए—जिनमें रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, एलपीजी आपूर्ति, सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर, वदीनार शिप रिपेयर क्लस्टर, रक्षा साझेदारी तथा आरबीएल बैंक व सम्मान कैपिटल में निवेश शामिल हैं। द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2032 तक 200 अरब डॉलर करने का लक्ष्य है। यूएई में 40 लाख भारतीयों की उपस्थिति आपसी संबंधों की मजबूती दर्शाती है।

इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व लिमिटेड और अबूधाबी नेशनल ऑयल कंपनी के समझौते के तहत अबूधाबी भारत में 30 मिलियन बैरल तक तेल भंडारित कर सकेगा। यह लीज मॉडल है—सुविधा भारत की, पर स्वामित्व अबूधाबी का। आपातकाल में भारत को केवल 'प्राथमिक पहुंच' मिलेगी, जो पूर्ण गारंटी नहीं देती। भंडारण का अधिकांश खर्च भारत वहन करेगा, जबकि अबूधाबी को वाणिज्यिक लचीलापन मिलेगा। इसलिए इसे पूर्णत: 'परस्पर लाभकारी' कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इस अतिरिक्त स्टॉक की उपलब्धता से हमारी आयात निर्भरता और कम रणनीतिक भंडारण की मूल समस्या को पूरी तरह हल नहीं करता।

यूएई की वेस्ट-ईस्ट पाइपलाइन परियोजना अभी निर्माणाधीन है और इसके 2027 में पूरा होने की संभावना है। यह हबशान से फुजैराह तक कच्चा तेल ले जाने वाली लाइन है, जो होर्मुज़ पर निर्भरता कम करने की यूएई की अपनी निर्यात सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। इसलिए इसे भारत के तत्काल लाभ के रूप में प्रस्तुत करना अतिशयोक्ति होगा।

दुबई यात्रा को लेकर कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं। दुबई ऊर्जा क्षेत्र का प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी नहीं है, और खाड़ी संकट के बाद भारत का व्यापारिक झुकाव सिंगापुर की ओर बढ़ा है। टैक्स हेवन, अपारदर्शी निवेश व संदिग्ध वित्तीय नेटवर्क से जुड़ी उसकी ऐतिहासिक छवि, सुधारों के बावजूद, जटिल रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री की आठ यात्राएं नीति प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती हैं। भारत को अबू धाबी केंद्रित ऊर्जा सहयोग और दुबई आधारित वित्तीय संपर्कों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना चाहिए, ताकि अनावश्यक अटकलों से बचा जा सके।

भू-राजनीतिक तनावों के बीच यूएई की यह यात्रा समयोचित भी नहीं लगती। विशेषज्ञ होर्मुज़ संकट को संरचनात्मक मानते हैं, जिससे 2026 में भारत की जीडीपी घटने व अर्थव्यवस्था पर दबाव संभव है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा हेतु ईरान के साथ संतुलित कूटनीतिक संवाद ज़रूरी है, क्योंकि होर्मुज की चाबी उसी के पास है ; केवल यूएई पर निर्भरता एकतरफा रणनीति हो सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी की नीदरलैंड यात्रा से भारत को सेमीकंडक्टर, जल प्रबंधन, डेयरी, कृषि प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण समझौते हासिल हुए। दोनों देशों ने व्यापार व निवेश बढ़ाने तथा इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने का संकल्प लिया।

प्रधानमंत्री मोदी की स्वीडन यात्रा में दोनों पक्षों ने ग्रीन ट्रांजिशन, एआई टेक्नालॉजी कॉरिडोर, हेल्थ-टेक, ग्रीन मोबिलिटी और रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक औद्योगिक साझेदारी की घोषणाएं कीं। इस यात्रा ने यूरोप में भारत की तकनीकी और रणनीतिक पहुंच को प्रतीकात्मक रूप से मजबूत किया, परंतु इससे आगे ठोस परिणाम अभी दिखने बाकी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्वे यात्रा का महत्व इसलिये है क्योंकि लगभग 42 वर्षों बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री वहां गया। दोनों देशों ने 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें हरित रणनीतिक साझेदारी, हिंद प्रशांत महासागर पहल, डिजिटल विकास, स्वास्थ्य सहयोग, अंतरिक्ष, समुद्री ऊर्जा, तकनीकी नवाचार और भू वैज्ञानिक अनुसंधान शामिल हैं।

ओस्लो में आयोजित 'तृतीय भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन' में भारत और पांच नॉर्डिक देशों स्वीडन, नार्वे, आइसलैंड, डेनमार्क व फिनलैंड ने संबंधों को हरित प्रौद्योगिकी एवं नवाचार आधारित रणनीतिक साझेदारी तक उन्नत किया। स्वच्छ ऊर्जा, आर्कटिक सहयोग, ब्लू इकानॉमी, साइबर सुरक्षा, उभरती तकनीकों और निवेश पर व्यापक सहमति बनी।

प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा में दोनों देशों ने राजनीतिक समन्वय, आर्थिक औद्योगिक एकीकरण, उभरती तकनीकों, हरित ऊर्जा और हिन्द भूमध्यसागर आर्थिक कारीडोर जैसे कनेक्टिविटी ढांचों पर सहयोग बढ़ाने का संकल्प दोहराया, जिससे भारत इटली साझेदारी को भविष्य उन्मुख दिशा मिली।

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा कई चमकदार क्षणों से भरी रही—यूएई और स्वीडन के लड़ाकू विमानों की एस्कॉर्ट, नॉर्वे और स्वीडन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, और भव्य स्वागत। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने मोदीजी की अनुपस्थिति में पत्रकारों के समक्ष भारत में प्रेस स्वतंत्रता और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर चिंता जताई। नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने कूटनीति और 'व्यापार के हथियारीकरण' पर मोदी सरकार की नीतियों पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी की। एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने भारत की प्रेस स्वतंत्रता पर सीधा सवाल उठाया। लेकिन प्रतीकात्मक सफलताओं के बीच में इन घटनाओं ने यात्रा की चमक पर हल्की खरोंच डाल दी।

प्रधानमंत्री ने प्रश्न को अनसुना कर दिया, जिससे अनावश्यक कूटनीतिक असहजता पैदा हुई। बाद में विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने सफाई दी। उन्होंने भारत की सभ्यता, लोकतांत्रिक ढांचे और कोविड काल की भूमिका का हवाला दिया, पर उनका जवाब न तो प्रभावी लगा, न ही आश्वस्त करने वाला। उनकी झुंझलाहट और 'जानकारी के अभाव' वाला तर्क स्थिति संभालने के बजाय और कमजोर ही दिखा। यह प्रकरण बताता है कि दूतावासों की तैयारी कमजोर थी; कूटनीति में कभी-कभी प्रधानमंत्री के दो वाक्य भी पूरी छवि बचा लेते हैं—यह अवसर हाथ से निकल गया। इस यात्रा के दौरान नॉर्वे के प्रमुख अखबार 'आफ्टेनपोस्टेन' ने प्रधानमंत्री मोदी का एक कार्टून प्रकाशित किया, जिसमें उन्हें 'सपेरे' की मुद्रा में दिखाया गया। यह चित्रण पश्चिमी मीडिया में भारत की रूढ़िबद्ध छवि को प्रतिबिंबित करता है। हालांकि ऐसे व्यंग्य असामान्य नहीं हैं, लेकिन यह घटना उच्च-स्तरीय कूटनीतिक दौरों में मीडिया प्रबंधन की चुनौतियों की याद दिलाती है।

पश्चिम एशिया संकट के बाद यूएई और इजरायल अंतरराष्ट्रीय जनमत में अलग थलग पड़ते दिख रहे हैं, और युद्ध को लेकर राष्ट्रपति ट्रम्प की छवि भी कमजोर हुई है। ऐसे जटिल वैश्विक माहौल में भारत को अपनी कूटनीतिक स्थिति बेहद सोच समझकर तय करनी होगी। प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा जहां अमेरिकी रुख के प्रति सामरिक सामंजस्य का संकेत है, वहीं यूरोपीय देशों के दौरे यह संदेश भी देते हैं कि भारत अपनी कूटनीति में पूर्णत: किसी एक धु्रव के साथ नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता के साथ आगे बढ़ रहा है। नॉर्डिक दौरे में भारत को हरित ऊर्जा, तकनीक व निवेश में—नॉर्वे, स्वीडन और नीदरलैंड के साथ—ठोस लाभ मिले। यूएई यात्रा ऊर्जा और निवेश के क्षेत्र में और अधिक प्रभावी होती, यदि भारत ईरान पर हुए हमलों पर अपनी स्पष्ट चिंता जताता।

कुल मिलाकर, ये यात्राएं भारत की वैश्विक उपस्थिति को सुदृढ़ करती हैं, पर बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में केवल सक्रिय कूटनीति पर्याप्त नहीं है—संतुलित, बहुपक्षीय और मूल्य-आधारित दृष्टिकोण अनिवार्य है। ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता तभी टिकाऊ होंगी, जब भारत सभी पक्षों से समान दूरी रखते हुए अपने दीर्घकालिक हितों को स्पष्ट प्राथमिकता दे—यही इस पूरे दौरे का वास्तविक सबक है।

(लेखक एवं समाजसेवी )

Tags:    

Similar News