ललित सुरजन की कलम से - शिक्षा और परीक्षा
'जब हम पढ़ रहे थे, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम तब भी थे।;
'जब हम पढ़ रहे थे, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम तब भी थे। सिविल सर्विसेस की परीक्षाएं भी होती थीं, जिनकी अभिलाषा उस ओर होती थी, वे उसकी तैयारी करते थे। लेकिन अभी जैसी आपाधापी मची है इसकी कल्पना हमने नहीं की थी। शायद जमाना आगे निकल गया है और मुझ जैसे लोग पीछे रह गए हैं।ऐसा नहीं कि आज से साठ साल पहले सब कुछ अच्छा ही अच्छा था। परीक्षाओं में नकल होती थी, नकलची छात्र झगड़ा करने पर उतारू भी होते थे, कितने सारे साथी परीक्षा के दिनों में हनुमानजी के मंदिर पर मत्था टेकने जाते थे, फेल होने पर छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के दु:खद प्रसंग भी सामने आते थे, कई बार गुंडानुमा छात्र भी छात्रसंघ का अध्यक्ष बन जाते थे। इस सबके बावजूद सामाजिक ताना-बाना काफी मजबूत था और नौजवानों में अपने भविष्य को लेकर इतनी अधिक दुश्चिंता और हताशा नहीं थी। एक विश्वास था कि सब कुछ समाप्त नहीं हो गया है। उस समय न तो बुजुर्ग पीढ़ी आत्मकेन्द्रित थी और न नई पीढ़ी। समाज में सामूहिकता की एक छाया थी, जिसमें ठहरने का वक्त मिल जाता था।'
(देशबन्धु में 15 जुलाई 2017 को प्रकाशित)
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