डिजिटल आक्रोश या नया राजनीतिक विकल्प: 'कॉकरोच जनता पार्टी' के उभार के मायने
देश के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस आंदोलन के पीछे एक और गहरी राजनीतिक साजिश या प्रोपेगैंडा होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।;
- अशांशु संचेती
देश के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस आंदोलन के पीछे एक और गहरी राजनीतिक साजिश या प्रोपेगैंडा होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक गलियारों में यह गंभीर चर्चा भी चल रही है कि कहीं यह 'कॉकरोच जनता पार्टी' खुद सत्ताधारी दल यानी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा ही पर्दे के पीछे से प्रायोजित किया गया कोई प्रयोग तो नहीं है?
भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया और मीम्स अब केवल मनोरंजन या समय काटने का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे व्यवस्था के खिलाफ पनप रहे एक बहुत बड़े और गहरे असंतोष को व्यक्त करने का सबसे धारदार हथियार बन चुके हैं। हाल के दिनों में इंटरनेट की दुनिया में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) नाम का एक बेहद अजीबोगरीब और अभूतपूर्व डिजिटल आंदोलन तेजी से उभरा है, जिसने मुख्यधारा के राजनीतिक पंडितों और समाजशास्त्रियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक पर इस तथाकथित आभासी पार्टी के फॉलोअर्स की संख्या रातों-रात लाखों से होती हुई करोड़ों में पहुंच चुकी है। देश का युवा वर्ग, जो अक्सर अलग-अलग वैचारिक, धार्मिक और क्षेत्रीय दायरों में बिखरा रहता है, इस समय पहली बार एक सुर में इस आत्म-निंदा से भरे 'कॉकरोच' ब्रांडिंग के पीछे एकजुट खड़ा दिखाई दे रहा है। लेकिन इस डिजिटल सुनामी के बीच कई गंभीर सवाल भी तैर रहे हैं। सवाल यह है कि इस पूरी मुहिम के पीछे असल में कौन लोग हैं, इनका वास्तविक एजेंडा क्या है, और क्या भारतीय जनता का यह तीखा गुस्सा किसी वास्तविक राजनीतिक या सामाजिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है, या फिर यह भी इतिहास के अन्य आंदोलनों की तरह केवल एक और चुनावी 'वोट-काटू' प्रोपेगैंडा बनकर रह जाएगा? इस पार्टी के बारे में कोई भी अंतिम धारणा बनाना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि डिजिटल दुनिया की हवा जितनी तेजी से चलती है, उतनी ही तेजी से बदल भी जाती है।
इस पूरे विवाद, गुस्से और आंदोलन की जड़ें सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च अदालत की एक तल्ख टिप्पणी से जुड़ी हुई हैं। हाल ही में एक संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान माननीय मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं, सोशल मीडिया पर सक्रिय एक्टिविस्टों और बार-बार आरटीआई लगाने वाले कार्यकर्ताओं के संदर्भ में 'कॉकरोच' (तिलचट्टा) और 'परजीवी' जैसे बेहद कड़े और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। हालांकि, जब इस टिप्पणी को लेकर चौतरफा आलोचना शुरू हुई और सोशल मीडिया पर गुस्सा उबलने लगा, तो सुप्रीम कोर्ट और स्वयं सीजेआई की ओर से एक स्पष्टीकरण भी सामने आया, जिसमें कहा गया कि उनके बयान को संदर्भ से बाहर जाकर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था और वे दरअसल केवल 'फर्जी डिग्री' धारकों और ब्लैकमेलिंग करने वाले तत्वों की बात कर रहे थे। लेकिन राजनीति और जनभावनाओं की दुनिया में तब तक तीर कमान से छूट चुका था और जो संदेश जनता तक जाना था, वह जा चुका था। देश के पढ़े-लिखे लेकिन बेरोजगार युवाओं, अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्टों और आम नागरिकों को यह भाषा सीधे अपने आत्मसम्मान पर चोट जैसी लगी। युवाओं को लगा कि एक लोकतांत्रिक देश में, जहां उन्हें राष्ट्र निर्माता कहा जाना चाहिए, वहां देश की सबसे बड़ी अदालत उन्हें 'परजीवी' कह रही है। आम आदमी पार्टी के पूर्व सोशल मीडिया रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने युवाओं के इसी सुलगते हुए गुस्से को भांप लिया और इसे एक संगठित डिजिटल अभियान में बदलते हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' की नींव रख दी। इस आंदोलन ने बहुत ही चतुराई से व्यवस्था के दिए ज़ख्म को ही अपना तमगा बना लिया और इसका नारा रखा गया कि 'उन्होंने हमें कुचलने की कोशिश की, लेकिन हम फिर वापस आ गए।' इस तथाकथित डिजिटल पार्टी की सदस्यता के नियम और शर्तें भी इतनी व्यंग्यात्मक और तंजभरी रखी गई हैं कि वे सीधे युवाओं को आकर्षित कर रही हैं, जैसे कि सदस्य बनने के लिए व्यक्ति का बेरोज़गार होना, व्यवस्था से निराश होना, चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहना और पेशेवर तरीके से मीम्स के जरिए सत्ता पर अपनी भड़ास निकालने की क्षमता रखना आवश्यक है।
इस आंदोलन की इस अभूतपूर्व और अकल्पनीय हाइप को देखकर कई वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और आम नागरिक इसकी तुलना वर्ष 2011-12 के ऐतिहासिक 'अन्ना हजारे आंदोलन' से कर रहे हैं, जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी थी। लेकिन वह पुराना अनुभव देश की आम जनता के लिए सुखद नहीं रहा। उस समय देश ने देखा था कि कैसे विदेशी फंडिंग, कॉर्पोरेट घरानों की बैंकिंग और मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से के प्रायोजित समर्थन से घिरे एक आंदोलन ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के इतने बड़े और सनसनीखेज आरोप लगाए कि पूरी सरकार ही कटघरे में खड़ी हो गई। उस आंदोलन का नतीजा क्या निकला? परिणाम यह हुआ कि जिस जनलोकपाल बिल के लिए पूरा देश सड़कों पर उतर आया था, वह आज तक अपने असली स्वरूप में नहीं आ सका। अन्ना हजारे खुद आंदोलन खत्म होने के बाद परिदृश्य से पूरी तरह गायब हो गए या उन्हें गायब कर दिया गया। लेकिन उस आंदोलन की लहर पर सवार होकर देश में एक ऐसी नई राजनीतिक सत्ता का उदय जरूर हो गया, जिसने पूरे देश का राजनीतिक ताना-बाना ही बदलकर रख दिया। इसके बाद जब मामले देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे, तो टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला और कोयला घोटाला जैसी बड़ी-बड़ी जांच समितियां और आरोप पूरी तरह से निराधार और खोखले साबित हुए। पिछले 12-13 सालों की कानूनी लड़ाइयों में उस समय लगाए गए आरोपों में से एक भी बड़ा आरोप अदालतों में साबित नहीं हो सका। विडंबना की पराकाष्ठा यह है कि आज देश में भ्रष्टाचार खत्म होने के बजाय एक नए और विकृत रूप में सामने आया है, जिसे अब लोग 'जीवन का शिष्टाचार' कहने लगे हैं। आज स्थिति यह है कि हजारों करोड़ रुपये के घोटाले या घपले देश की जनता के लिए सिर्फ मज़ाक बनकर रह गए हैं और भ्रष्टाचार एक सामान्य सी दैनिक घटना लगने लगी है। उस अन्ना आंदोलन ने असल में देश की जनता का 'आंदोलनों' और 'क्रांतियों' के प्रति जो एक पवित्र विश्वास था, उसे हमेशा के लिए तोड़ दिया। यही सबसे बड़ी वजह है कि आज भारतीय जनता कॉकरोच जनता पार्टी के इस नए उभार को देखकर भी तुरंत किसी धारणा को बनाने या इस पर भरोसा करने से हिचकिचा रही है।
इसके साथ ही, देश के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस आंदोलन के पीछे एक और गहरी राजनीतिक साजिश या प्रोपेगैंडा होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक गलियारों में यह गंभीर चर्चा भी चल रही है कि कहीं यह 'कॉकरोच जनता पार्टी' खुद सत्ताधारी दल यानी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा ही पर्दे के पीछे से प्रायोजित किया गया कोई प्रयोग तो नहीं है? इतिहास गवाह है कि जब भी कोई गैर-पारंपरिक और लीक से हटकर काम करने वाली पार्टी, जैसे कि पूर्व में आम आदमी पार्टी या कई अन्य क्षेत्रीय दल, अचानक राष्ट्रीय स्तर पर उभरते हैं, तो वे अंतत: देश के जागरूक और असंतुष्ट मतदाताओं के वोटों को बांटने का काम करते हैं। यदि यह कॉकरोच आंदोलन कल को सिर्फ सोशल मीडिया की दुनिया से बाहर निकलकर एक वास्तविक राजनीतिक दल का रूप लेता है और देश के आगामी चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करता है, तो यह तय है कि इससे जो भी वोट कटेंगे, वे मौजूदा सरकार से नाराज़ लोगों के यानी एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी) वोट होंगे। विपक्ष के वोटों का यह बिखराव सीधे तौर पर मौजूदा सत्ताधारी सरकार को ही राजनीतिक रूप से अजेय बना देगा। यही कारण है कि देश का समझदार और गंभीर नागरिक वर्ग इस पार्टी की लोकप्रियता को कौतुक से देख तो रहा है, लेकिन इसे किसी भी तरह से सीधे तौर पर एंडोर्स या समर्थित करने से पूरी तरह बच रहा है।
अंतत: कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य क्या होगा, यह तो आने वाला वक्त में पता चलेगा। क्या यह डिजिटल दुनिया का महज ऐसा बुलबुला है जो कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद फूट जाएगा, या फिर यह जमीनी स्तर पर जाकर देश के करोड़ों युवाओं के रोजगार, लगातार हो रहे पेपर लीक, नीट परीक्षा जैसे बड़े विवादों और देश में बढ़ती आर्थिक असमानता के खिलाफ एक वास्तविक वैचारिक क्रांति का रूप अख्तियार करेगी? भले ही इस आंदोलन को शुरू करने वाले लोगों की मंशा कितनी भी पवित्र हो या फिर उनका गुप्त उद्देश्य केवल विधानसभा या संसद तक पहुंचने का रास्ता तलाशना हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात पूरी तरह से साफ कर दी है कि भारतीय जनता, और विशेषकर देश का युवा वर्ग, इस समय व्यवस्था की घोर अनदेखी, आर्थिक तंगी और शीर्ष स्तर से आने वाली अपमानजनक टिप्पणियों से भीतर तक बेहद उद्वेलित और परेशान है। देश के मुख्य न्यायाधीश की उस एक टिप्पणी पर सत्ताधारी दल की रहस्यमयी खामोशी भी युवाओं को बहुत ज्यादा चुभ रही है, जो यह संकेत देती है कि शायद सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के विचार भी देश के युवाओं और एक्टिविस्टों के प्रति बहुत सकारात्मक नहीं हैं। सरकार और विपक्ष दोनों के लिए इस समय बुद्धिमानी इसी में होगी कि वे इस 'कॉकरोच आंदोलन' को केवल एक इंटरनेट मीम या सोशल मीडिया की बकवास समझकर कम आंकने की भूल कतई न करें, क्योंकि जनता की इस मूक लेकिन उग्र प्रतिक्रिया के पीछे एक बहुत बड़ा लावा सुलग रहा है।