यात्रा वृत्तांत बुल्गारिया

साहित्यसेवी, पत्रकार और स्वतंत्रता-सेनानी। 'आज' समाचार-पत्र के प्रकाशन और 'काशी विद्यापीठ' की स्थापना के लिए उल्लेखनीय

By :  Deshbandhu
Update: 2026-03-07 23:42 GMT
  • शिवप्रसाद गुप्त

(1883 - 1944 बनारस, उत्तर प्रदेश)

साहित्यसेवी, पत्रकार और स्वतंत्रता-सेनानी। 'आज' समाचार-पत्र के प्रकाशन और 'काशी विद्यापीठ' की स्थापना के लिए उल्लेखनीय।

सोफ़िया! यह बुल्गारिया-राज्य की राजधानी है। यहाँ पहुँचने के पहले ही मुझे वही छप्पर के घर, सागपात की बेलें, ढेंकी, सराय, पायजामा, मिज़र्ई, सा$फा और छोटे-छोटे गाँव-पुरवे आदि अपने देश के ऐसे दृश्य देख पड़ने लगे। प्राचीन सर्डिका नगर की जगह पर सो$िफया नगरी बसी है। कुस्तुंतुनिया बनने और बसने के पहले सम्राट कांसटंटाइन कहा करते थे कि 'सार्डिका ही मेरा रोम है।' इस समय एक लाख के ऊपर आदमी यहाँ बसते हैं। उनमें दस बारह हज़ार तुर्क, उनसे भी अधिक यहूदी, और एक हज़ार से अधिक 'जिप्सी' लोग रहते हैं। किसी समय यहाँ डेढ़ लाख आदमियों की बस्ती थी। रूस-टर्कीन युद्ध के बाद साल 1878 में बुल्गारिया तुर्कों के हाथ से निकल स्वतंत्र हो गई। तभी से यह नगर बुल्गारिया की राजधानी है। इस प्रदेश के शासक तुर्की पाशा लोगों ने भी इसी नगर को प्रधानता दी थी । कई एक बा$ग और 'मिनारेट' से नगर की कुछ शोभा हो गई है। रास्तों में उतनी स$फाई नहीं है। गलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हैं। अधिकांश घर लकड़ी के बहुत ही मामूली ढंग के बने हुए हैं। नगर के बाहर चारों ओर उदास मरुभूमि का दृश्य देख पड़ता है। पूर्व बाज़ के उपनगर में राजमहल है। उसके बनने में चालीस लाख फ्रैंक लगे हैं। इसके पास ही नया यूरोपियन-मोहल्ला है। नगर में बहुत सी मस्जिदें हैं। बुयुक-जमी मस्जिद में 9 धातुओं का बना हुआ गुंबद शोभायमान है। सोफ़िया-मस्जिद, जो पहले ईसाइयों का गिरजा थी, भूकंप में गिर गई और वैसी हो पड़ी हुई है। एक भारी मकान में सर्वसाधारण के लिए हम्माम बना है। उसमें भिन्न-भिन्न धर्मावलंबियों के लिए अलग-अलग खंड बने हुए हैं। सन 1829 में तुर्क सूबेदार मुस्त$फा पाशा ने अलबानिया से आकर यहाँ ऐसी भयंकर लूटपाट और अत्याचार किया कि आज भी यहाँ के बच्चे 'अलबेनियन' का नाम सुनकर भय से सिटपिटा कर चुप हो जाते हैं । लंदन में एक जगह इस अत्याचार के अनेकों दृश्य मोम की मूर्तियों के द्वारा ऐसे सजीव भाव से दिखलाए गए हैं कि देखते देखते आँखों से आँसू बहने लगते हैं । बच्चों और माताओं में जैसी पशुओं की ऐसी निठुराई की गई है उसे सभ्य या असभ्य कोई नही जाति नहीं कर सकती।

स्रोत : पुस्तक : भूप्रदक्षिणा (पृष्ठ 520) का अंश

प्रकाशन : द इंडियन प्रेस लिमिटेड इलाहाबाद  

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