अभी कई सारे गीत उन पर लिखे जाने की प्रतीक्षा में हैं
स्वरांगी साने
किताब - गीत फ़िल्मी है लेकिन...
लेखक - डॉ. सुनील देवधर
मूल्य - 450 रुपए
प्रथम संस्करण - सन् 2025
प्रकाशक - भावना प्रकाशन, दिल्ली।
पृष्ठ - 263
समीक्षक - स्वरांगी साने पुणे
डा.सुनील देवधर आकाशवाणी से सहायक निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। वे उस दौर के साक्षी रहे हैं, जिसे आकाशवाणी का स्वर्ण युग कह सकते हैं। आकाशवाणी पर काम करने से विविध भारती पर बजते गीत सालों-साल कई घंटों तक उनके कानों में रस घोलते रहे होंगे। कहने को तो उस दौर में पनवारी और धोबी-परचून की दुकानों पर भी दिेन भर रेडियो बजता था लेकिन रेडियो के बजने और रेडियो सुनने में अंतर है। जब किसी संवेदनशील व्यक्ति का गंभीर मन उसे सुनता है और वह रचनात्मक लेखन भी करता हो तो वे गीत उसकी लेखनी में उतर आते हैं। संयोग ही रहा कि जब वे पहले-पहल कागज़ों पर उतरने लगे तो मैं एक अख़बार में नियमित कार्यरत थी और उनकी गीतों की उस श्रृंखला को हमने स्तंभ के रूप में प्रकाशित किया। तब उन गीतों से गुज़रते हुए कई बार मन अवाक् रह गया कि इस गीत के बारे में ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था। उस स्तंभ ने आगे चलकर 51 गीतों की किताब का रूप लिया, जिसे स्तंभ की तरह ही काफी पसंद किया गया। उसका नाम भी वही था, जो उस स्तंभ का था 'बड़े अनमोल गीतों के बोल'। इसके बाद गीतों पर आधारित उनकी यह दूसरी किताब है 'गीत फ़िल्मी हैं, लेकिन...'।
पहली किताब पढ़ी तब पाठक से पहले एक अख़बारी संपादक के तौर पर उसमें छपे गीतों की 'बिटवीन द लाइंस' से गुज़र चुकी थी। दूसरी किताब पढ़ते हुए संपादक का चश्मा आँखों पर नहीं था और बिना उस चश्मे के किताब पढ़ना अधिक आनंददायक रहा। रस ग्रहण करते हुए अध्ययन अपने आप हो गया क्योंकि हर गीत को लेखक ने नए सिरे से तराशकर एक नगीने के रूप में सामने रखा है। इस किताब में भी लगभग उतने ही गीत है। इंस्टाग्राम पर बनने वाली रील्स और यू ट्यूब के शॉर्ट्स के इस दौर में आप इन गीतों को तसल्ली से पढ़िए, हफ्ते में एक गीत, इस विलंबित गति तक से उन गीतों का आनंद लेते चलिए, देखिए आप एक साल में अनुभवों से कितने अधिक समृद्ध हो जाएँगे। किताब में हर फ़िल्म का उस ज़माने का पोस्टर दिया गया है, उसके बाद वह पूरा गीत है और उसके बाद उसे पंक्ति दर पंक्ति खोला गया है। इन गीतों पर लिखते हुए दुनियाभर के लेखकों, कवियों, शायरों से लेकर वेद-पुराण और ऐतिहासिक संदर्भ भी दिए गए हैं। गीतों को भारतीय दर्शन से जोड़ा गया है। भारतीय दर्शन के साथ उर्दू साहित्य के संदर्भ में इन गीतों के विश्लेषण में मिलते हैं। डॉ. देवधर का भाषा सामर्थ्य और ज्ञान उनके द्वारा किए गए हर गीत के विश्लेषण में दिखता है। इसे महज़ विश्लेषण न कहकर मीमांसा कहना अधिक सही होगा। इस किताब का हर गीत गहरे अर्थों को समेटने वाला है।
पहला गीत 'मेला' फ़िल्म का 'ये जि़ंदगी के मेले...'। गीतकार और संगीतकार का नाम भी हर गीत के प्रारंभ में दिया जाता है। दूसरा गीत 'आवारा' फ़िल्म का है। हर पोस्टर के नीचे कुछ वाक्यों में सिनोपसिस की तरह दिया गया है। शैलेंद्र की गीत 'आवारा हूँ' को उस दौर में कितना पसंद किया गया था। लेखक उससे जुड़े प्रसंग का जिक्र करता है कि शैलेंद्र आजादी के संघर्ष और सामाजिक क्रांति के विषय में कविताएँ लिखते थे, उन्होंने राजकपूर से सवाल किया था 'मैं पैसों के लिए नहीं लिखता, मैं क्यों लिखूँ'? राजकपूर ने न केवल 'आवारा' फ़िल्म का बल्कि 'बरसात' फ़िल्म का 'बरसात में हमसे मिले तुम'...भी शैलेंद्र से लिखवाया। 'दो बीघा ज़मीन' के पुराने पोस्टर के नीचे लेखक का वक्तव्य है कि 'रीमिक्स, पॉप और हिप-हॉप,रैप संगीत के दौर में भी पुराना गीत संगीत आज भी पसंद किया जाता है'। इस फिल्म के 'धरती कहे पुकार' को किताब में शामिल किया गया है। शैलेंद्र की कलम को संगीतबद्ध मदन मोहन ने किया है। सन् 1953 में आई विमल राय की इस फ़िल्म में बलराज साहनी के उत्कृष्ट अभिनय को देखा जा सकता है। फ़िल्मी गीतों के मर्म को सामने रखते हुए लेखक बताते हैं कि इन गीतों में कैसे आध्यात्मिकता और दार्शनिकता है जो कई बार निस्संगता तक ले जाती है।
'दो आँखें बारह हाथ' के पोस्टर के नीचे लेखक अपनी बात कहते हुए बड़ा सीधा सवाल पूछते हैं कि 'कई फ़िल्मी गीतकारों के साहित्यिक अवदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, फिर उन गीतों-कहानियों की चर्चा साहित्य में क्यों नहीं होती'? 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' गीत को ही ले लीजिए। भरत व्यास के शब्द कितने ही सार्थक क्यों न हों, डॉ. देवधर तो गीता का उद्धरण भी यहाँ देते हैं कि 'देशेकाले च पात्रेच तद्दानं सात्विकं स्मृतम्'...पर वे महर्षि वेद व्यास तक इसलिए नहीं पहुँच सकते क्योंकि हमने शुरू से ही फ़िल्मों को और फ़िल्मी गीतों या कह लीजिए फ़िल्मी दुनिया को निकृष्ट, ओछा माना है। वी. शांताराम की इस फ़िल्म का यह गीत आज भी कई संस्कार केंद्रों और संस्थाओं में प्रार्थना की तरह गाया जाता है लेकिन केवल फ़िल्मी होने से वह हमारे घरों के मंदिरों-पूजा गृहों में न आ सका। हमने फ़िल्मों को हमेशा ग्लैमर से जोड़ा भले ही उनमें से कई फ़िल्में नेकी और भलाई के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती हों तब भी।
फ़िल्मों को ओछा माना जाता था तो उन्हें कला और जनसंचार के माध्यम का दर्जा किसने दिया होगा। इसका जवाब भी लेखक 'मदर इंडिया' फ़िल्म के पोस्टर के नीचे दिए अपने वक्तव्य में देते हैं कि साप्ताहिक धर्मयुग ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी। समांतर सिनेमा को धर्मयुग पत्रिका ने स्थापित किया तो रेडियो ने उन्हें बार-बार बजाकर या प्रसारित कर प्रतिष्ठित किया। लोगों को भले ही न पता हो कि ठुमरी, चैती, होरी, कजरी शास्त्रीय संगीत के प्रकार हैं या शास्त्रीय संगीत के कितने राग हैं पर उस दौर में उन पर आधारित गीत सबकी ज़ुबान पर चढ़े थे तो वह आकाशवाणी की ही देन है। अस्तु, 'मदर इंडिया' का गीत 'दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा' कब लोकोक्ति में बदल गया होगा कहा नहीं जा सकता। शकील बदायूँनी ने इसे जिस तरीके से लिखा और नौशाद ने जिस तरह संगीत दिया वह इतिहास बन गया है। डॉ. देवधर इस गीत के साथ उस किस्से का भी जिक्र करते हैं जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर भारत आए थे। तब उन्हें मदर इंडिया दिखाई गई थी। फिल्म खत्म होने के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने संकोचवश उनसे पूछ लिया कि उन्हें फ़िल्म कैसी लगी? नासिर साहब का जवाब हैरान करने वाला था कि वे उससे पहले तीन बार इसे काहिरा में देख चुके थे। गीत की पंक्ति 'जल जाएँ मगर आग पे चलते ही रहेंगे' को डॉ. देवधर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की पंक्तियों 'विपदाएँ आती हैं आएँ, हम न रुके हैं, हम न रुकेंगे' से जोड़ते हैं। श्रम के महत्व को प्रतिपादित करते हुए वे पंजाबी की कहावत लिखते हैं कि 'ऊँट न रुन्ने, बोरे रून्ने' अर्थात् सामान ढोने वाला ऊँट न रोया बल्कि बोरे ही रोने लगे।
डॉ. देवधर का अथाह अध्ययन संस्कृत-उर्दू के संदर्भ इस किताब में कई बार प्रत्यक्षे किं प्रमाणम् की तरह उनकी विद्वत्ता के साक्षी बनते हैं। वे वर्तमान समय को भी अपनी लेखनी पर तौलते हैं कि पहले लिखा जाता था इश्क ईमान है, इश्क कुरआन है और अब इश्क कमीना लिखा जा रहा है। 'घर संसार' फ़िल्म के पोस्टर के नीचे वे अपनी यह बात कहते हैं। गीतकार एस.एच. बिहारी के इस फ़िल्म के लिखे गीत 'भला करने वाले भलाई किए जा' की जब वे बात करते हैं तो उनके द्वारा लिखे कई गीतों की याद दिला देते हैं जैसे 'कजरा मुहब्बतवाला', 'रातों को चोरी-चोरी', 'हौले-हौले चलो मोरे साजना', 'मेरा प्यार वो है', 'दीवाना हुआ बादल', 'इशारों-इशारों में', 'तारीफ करूँ क्या'...। 'घर-संसार' के गीत की बानगी देते हुए वे कबीर-रहीम, कवि बेकन, खलील जिब्रान तक को उद्धृत करते हैं। ऐसा लगता है जैसे वे अपने हाथों को लंबा पसार रहे हैं और जितना समेट सकते हैं सब चीज़ों को समेटते जा रहे हैं। 'अनाड़ी' के गीत 'सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी' तो जैसे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। उनकी विद्वत्ता उनकी लेखनी, वाणी में झलकती है लेकिन व्यवहार में वे किसी को कमतर नहीं आँकते। वे इस गीत को कबीरदास से जोड़कर कहते हैं कि 'जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोई तू फूल'। किताब की विशेषता है कि हर गीत की व्याख्या उतनी ही लयात्मकता से की गई है। कहीं भी यह लय टूटती नहीं है। किताब का प्रकाशन भी साफ-सुधरा और त्रुटिविहीन है।
'दीदी' फ़िल्म के गीत 'हमने सुना था एक है भारत' के साथ वे सामाजिक परिवेश में होते बदलाव कैसे साहित्य और सिनेमा में भी दिखते हैं, यह बताते हैं। 'छलिया' फ़िल्म के 'छलिया मेरा नाम' गीत के संदर्भ वे जोश मलीहाबादी की पंक्तियों में भी देते हैं और सूरदास के पद भी कि 'खेलत में कऊ काको गुसइयाँ' यानी खेल में कोई किसी का स्वामी कैसे हो सकता है। डॉ. देवधर द्वारा चुने हर गीत में उनका फलसफा दिखता है लेकिन वे 'जिस देश में गंगा बहती है' के गीत को याद करते हुए कहते हैं कि साहिर लुधियानवी के गीत अपने में एक फलसफा लिये होते थे। वैसे इस फ़िल्म के जिस गीत को वे रखते हैं वह शैलेंद्र का 'मेरा नाम राजू' है, जिसका संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था। इस गीत की व्याख्या करते हुए वे बिहारी कवि, गंग कवि, कवि मान, कविराज, महाकवि पद्माकर की याद करते चलते हैं। 'हमारी याद आएगी' के गीत 'सोचता हूँ ये क्या किया मैंने' लिखा। जबकि 'हम दोनों' के गीत 'अल्लाह तेरो नाम' को चुना। यह गीत सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। 'बंदिनी' के गीत 'अब के बरस भेज' ने कितनों को रुलाया होगा कहा नहीं जा सकता। शैलेंद्र के शब्द और सचिन देव बर्मन का संगीत इस गीत को अधिक मर्मस्पर्शी बना देता है। 'फूल बने अंगारे' के गीत 'वतन पर जो फिदा होगा' फिर पाठकों को देशभक्ति की ओर ले जाता है। समझ नहीं आता कि देशभक्ति के गीतों को अलग से सिलसिलेवार क्यों नहीं दिया गया। हो सकता है पाठकों का जायका बदलता रहे इसलिए ऐसा किया गया होगा। साहिर के इस गीत में भी देशभक्ति की भावना दिखती है जिसे कल्याणजी-आनंदजी ने संगीतबद्ध किया था। भारत-चीन के सन् 1962 के युद्ध की याद इस गीत में है। इसके बाद 'दोस्ती' फ़िल्म का मजरूह का लिखा गीत है
कोई जब राह न पाए'। इस गीत में भी वेदों की पंक्तियों का हवाला दिया गया है तो इतिहास भी रखा गया है कि कैसे तात्या टोपे को उनके ही साथी ने पकड़वाया था और चंद्रशेखर आज़ाद की मुखबिरी भी उनके साथी ने ही की थी। इस गीत के साथ सन् 1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि को भी तौला गया है। 'साँझ-सवेरा' फ़िल्म के गीत 'अजहुँ न आए बालमा', को हसरत जयपुरी ने लिखा है और शंकर जयकिशन ने संगीत दिया है। डॉ. देवधर के शब्दों में कहें तो पहले के गीतों में शब्दों की अपनी ताकत होती थी, उनकी उपस्थिति एक लय बनाती थी। पहले के गीतों में लोक बोलियों के शब्द और उनकी मिठास थी जैसे 'अजहूँ न आए'...। इस गीत पर लिखते हुए डॉ. देवधर प्रकृति के चितेरे कवि पंत और रीतिकाल के कवि सेनापति की पंक्तियों को याद करते हैं। कालिदास के मेघदूत की पंक्तियाँ भी इस लेख में आ जाती हैं तो पं. नरेंद्र शर्मा भी।
अगला गीत 'जहाँआरा' फ़िल्म का 'वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग' है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण के शब्दों के साथ मदन मोहन का संगीत न्याय करता सा लगता है। भाषा, भाव और बयान एक साथ इस गीत के कहन में है। आप इस गीत में डूबते-उतरते हैं कि किताब में अगला गीत 'शहीद' फ़िल्म का 'मेरा रंग दे बसंती चोला' आ जाता है। इसके गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन हैं। इस फ़िल्म के अन्य गीतों का उल्लेख भी यहाँ मिलता है जैसे 'ए वतन, ए वतन', 'हमको तेरी कसम', 'सरफरोशी की तमन्ना', 'पगड़ी सम्हाल जट्टा' और 'जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में'..। डॉ. देवधर इस गीत के साथ भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, महाराणा प्रताप, लक्ष्मीबाई, गुरू गोविंद सिंह, दुर्गावती, रानी चेनम्मा, राणा सांगा, पृथ्वीराज चौहान, बाजीराव आदि का जिक्र करते हैं। 'सिकंदर-ए-आजम' फ़िल्म के गीत 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया' के बारे में अधिक जानना हो तो भी आप इस किताब को पढ़ सकते हैं। इतना ही क्यों 'वक्त' मूवी के 'वक्त से दिन और रात', 'बादल' मूवी का 'ख़ुदगज़र् दुनिया में ये' जैसे कई गीत इस किताब से खुलते चले जाते हैं।
'तीसरी कसम' फ़िल्म के पोस्टर के नीचे लेखक ने जानकारी दी कि सन् 1910 में दादासाहेब फालके ने दि लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखकर भारतीय सिनेमा रचने का संकल्प किया और सन् 1913 में फ़िल्म आई राजा हरिश्चंद्र। वैसे यह बात भी समझ से परे है कि फिल्म के पोस्टर के नीचे दी जानकारी इतनी असंगत क्यों है, भले ही महत्वपूर्ण हो। मतलब फ़िल्म के पोस्टर से उसके नीचे चस्पा की गई जानकारी का वैसे कोई लेना-देना नहीं है। जबकि गीतों पर लिखते हुए वे अपनी बात पर टिके हुए लगते हैं। 'तीसरी कसम' फ़िल्म का 'दुनिया बनाने वाले' गीत लिया गया है। सर्वज्ञात है कि यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कथा 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित है। हसरत जयपुरी के इस गीत में पूछे सवाल पर डॉ. देवधर की कलम बृहदारण्यक उपनिषद का वाक्य देते हैं कि 'स वै नैव रेमे, तस्मात एकाकी न रमते, सद्वितीयम्इच्छत' अर्थात् वह अकेला नहीं रमा। ज्याँ पॉल सार्त्र का उद्धरण देते हैं कि यदि मनुष्य न भी होता, तब भी सृष्टि होती और शायद कुछ बेहतर होती।
इसके बाद 'ममता' फ़िल्म के 'छुपा लो यूँ दिल में यूँ प्यार मेरा, कि जैसे मंदिर में लौ दिये की', को लिया गया है। सन् 1966 में ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। मजरूह सुलतानपुरी ने गीत लिखे थे और रोशन का संगीत था। 'इक कली मुस्काई' के पोस्टर के बाद 'ना तुम बेवफा हो, ना हम' को लिया गया है। 'नीलकमल' के पोस्टर के बाद उन दिनों को याद किया गया है जब सिनेमाघरों में 5 से 10 मिनट का वृत्तचित्र दिखाया जाता था और याद हो आया कि फ़िल्म प्रभाग की डॉक्युमेंट्रीज का प्रदर्शन अब बहुत कम होता है। इस फ़िल्म का गीत 'हे रोम-रोम में बसने वाले राम' है। इसके बाद सन् 1968 में आई फ़िल्म 'सरस्वतीचंद्र' का गीत 'मैं तो भूल चली बाबुल का देस' का वर्णन अपने आपमें सामाजिक दस्तावेज है। वहाँ से चलते हुए फ़िल्म 'जीने की राह' का 'एक बंजारा गाए' गीत आता है। फिर फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' का 'ए भाई, जरा देख के चलो' गीत वर्णित है। गीतकार नीरज ने इसे लिखा है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार केवल पाँच साल ही थे। इसके बाद योगेश का लिखा 'आनंद' फ़िल्म का गीत है 'जि़ंदगी कैसी है पहेली'। 'पहचान' फ़िल्म का गीत 'बस यही अपराध' अगली बानगी है। यहाँ गीतों के नाम इसलिए दिए जा रहे हैं ताकि पढ़ने वालों के मन में उत्सुकता जगी रहे। आदमी और इंसान के अंतर को स्पष्ट करते हुए लेखक मिर्जा गालिब का हवाला देता है कि 'बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को मयस्सर नहीं इंसां होना'। मतलब आदमी से इंसान होना एक प्रक्रिया है। फ़िल्म 'सीमा' के गीत 'जब भी ये दिल उदास होता है' को भी इस किताब से करीबी से जाना जा सकता है। फ़िल्म 'पिया का घर' के गीत 'ये जीवन है, इस जीवन का', के फलसफे को भी इस किताब से समझा जा सकता है। 'दाग' फिल्म के गीत 'जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा'...साहिर के शब्दों को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने स्वर दिए लेकिन उस आवाज़ का भी जिक्र होना था, जिसने इसमें दर्द भरा। इस गीत के बहाने डॉ. देवधर, मोहन राकेश, और अज्ञेय को भी याद करते हैं। गीत जहाँ ख़त्म होता है, वहाँ नायिका के मुँह से सिसकी निकलती है। इस गीत के बारे में पढ़ने के बाद वह सिसकी याद आती है,या कहिए ज़ेहन में अटक जाती है। इसके बाद दिल के भाव को बनाए रखने के लिए 'दिल की राहें' की गज़ल 'रस्म-ए-उल्फत को निभाएँ' को दिया गया है। नक्श लायलपुरी ने जैसे इसे लिखा है, वैसे ही मदन मोहन ने संगीत से इसे तराशा है। इस गज़ल के साथ निकहत नसीम, जयशंकर प्रसाद और गालिब भी आ जाते हैं।
फ़िल्म 'परिणय' का गीत 'जैसे सूरज की गर्मी से', को तो भजनों में स्थान मिल गया है। रामानंद शर्मा की लेखनी और जयदेव के संगीत ने इसे उस स्थान तक पहुँचाया है। यह स्थान दिलाने में उज्जैन के शर्मा बंधुओं यानी पं. गोपाल शर्मा, सुखदेव शर्मा, पं. कौशलेंद्र और पं. राघवेंद्र शर्मा का भी योगदान है। राम दरबार गायकों के रूप में जाने जाते इन बंधुओं में से पं. गोपाल शर्मा और शुकदेव कुमार ने इसे गाया था। इसमें तरूवर क्यों लिखा गया है इसका उत्तर देते हुए डॉ. देवधर; रहीम का दोहा बताते हैं कि 'तरूवर फल नहीं खात है, सरवर करै न पान, कह रहीम पर काज हित, संपत्ति संचहि सुजान'। भक्तिभाव को ही आगे बढ़ाते हुए फ़िल्म 'मेहमान' का गीत आता है 'राम रहीम, कृष्ण करीम'। साहिर ने यह गीत लिखा है और डॉ. देवधर रेखांकित करते हैं कि साहिर की कलम से ही 'तोरा मन दर्पण कहलाए', 'हे रोम रोम में बसने वाले राम', 'प्रभु तेरो नाम जो ध्याए' के साथ रोमांटिक गीत व कई कव्वालियाँ लिखी हैं। बालकवि बैरागी के 'क्षितिज' फ़िल्म के गीत 'अंधे सफर में हम भी' है। इसके तुरंत बाद फ़िल्म 'चोर मचाए शोर' का वह गीत है जिसे लिखा भी और संगीतबद्ध भी किया रवींद्र जैन ने- 'ले जाएँगे, ले जाएँगे, दिलवाले दुल्हनियाँ'। पैसे वालों के देखते रहने की बात के साथ डॉ. देवधर; प्रेमचंद का लिखा भी रखते हैं कि 'बरात का बराती कभी खुश नहीं होता'। फ़िल्म 'वरदान' का गीत 'हे गिरिधारी, मेरे कृष्ण मुरारी' भी इस किताब में है। 'इम्तेहाँ' फ़िल्म का गीत 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के' की अभिव्यक्ति भी इस किताब में है, जिसके साथ वे प्रसाद की
'कामायनी' पर भी बात करते हैं कि 'अपने सुख को विस्तृत कर लो'। फ़िल्म 'घटना' के गीत 'हज़ार बातें कहे ज़माना' को लेखक ने गज़लनुमा गीत कहा है। गीतकार का नाम रविशंकर शर्मा आता है और संगीत रवि का। रविशंकर शर्मा ही संगीतकार रवि हैं।
भारतीय फ़िल्मों में जितने गीत मिलते हैं, उतने शायद दुनिया के किसी देश की किसी भाषा में नहीं। ये गीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि जि़ंदगी की बात भी करते हैं जैसे फ़िल्म 'रफ़्तार' का गीत 'संसार है एक नदिया, सुख-दु:ख दो किनारे'। फ़िल्म 'फकीरा' का गीत 'फकीरा चल चला चल' भी इसी दार्शनिकता को बया करता है। फ़िल्म 'कर्मा' का लिया गीत 'समय तू धीरे-धीरे चल' भी उसी तर्ज पर है, तो फ़िल्म 'अपनापन' का गीत 'आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है' भी और फिर 'गोलमाल' का यह गीत भी 'आनेवाला पल, जाने वाला' है। गुलज़ार के इस गीत के बाद किताब में निदा फाजली का गीत है 'कभी पलकों में आँसू हैं, कभी लब पे शिकायत है' (फ़िल्म हरजाई)। 'प्रेम तपस्या' फ़िल्म का गीत 'आदमी दीवाना है, एतबार करता है' भी जीवन, प्रकृति, मौसम, समाज, अध्यात्म और दर्शन की बात करता है। गीतकार आनंद बख्शी के इस गीत के बाद दूसरा गीत भी इसी तर्ज पर है। वह गीत है- 'रोते रोते हँसना सीखो, हँसते-हँसते रोना'। 'राम तेरी गंगा मैली' फ़िल्म के शीर्षक गीत पर लिखते हुए डॉ. देवधर गंगा के अवतरण की पौराणिक कथा बताते हैं। जीवन की दूसरी सच्चाई अगले गीत में आती है, जो 'मेरी जंग' का है। गीत है 'जि़ंदगी हर कदम एक नई जंग है'। हर नए गीत को नए तरीके से रखने का सिलसिला इस किताब में इस गीत के साथ खत्म होता है पर हम चाहते हैं कि गीतों पर अगली किताब भी शीघ्र आए क्योंकि अभी कई सारे गीत उन पर लिखे जाने की प्रतीक्षा में हैं।