पर्यावरण क्षरण और इंसानी लालच पर केंद्रित बसंत राघव की लघुकथाएं
मेरे गाँव के बाहर कच्ची सड़क के किनारे एक विशाल नीम का वृक्ष निस्पृह-निरपेक्ष भाव से झूमता हुआ खड़ा था।;
निराश्रित
मेरे गाँव के बाहर कच्ची सड़क के किनारे एक विशाल नीम का वृक्ष निस्पृह-निरपेक्ष भाव से झूमता हुआ खड़ा था। बैसाख-जेठ के अग्निबाणों को अपने में जज़्ब कर वह निदाघ की घमंड को ठेंगा दिखलाता रहता। प्रदूषित हवा को विकारमुक्त कर शुद्ध प्राणवायु में बदलने में उसे महारत हासिल थी। वह अनगिनत परिंदों का ही नहीं, राहगीरों का भी आश्रय स्थल था। वह अपनी सुकोमल हरी पत्तियों से धूल-धूसरित आँधी को छानकर शीतल झोंकों द्वारा देह-आत्मा की जलन मिटाकर सभी को विश्राम प्रदान करता था। धूप खड़ी-खड़ी उसे देखती रह जाती थी। लेकिन एक साल पहले से कच्ची सड़क पर बड़ी-बड़ी गाड़ियों की आवाजाही अचानक बढ़ गई थी, जिससे पूरा गाँव धूल से पट गया था। अब कच्ची और सकरी सड़क के स्थान पर चौड़ी और चमचमाती कोलतार की सड़क बन गई है और वह कल्पतरु सड़क के चौड़ीकरण की भेंट चढ़ गया। कहीं दिखाई नहीं देता। न ही सुबह-शाम चिड़ियों का वह बहुविध मिश्रित कलरव अब श्रुतिगोचर हो रहा है। पथिकों को वह लंबी काली सड़क किसी नागिन की तरह काट रही थी। सब अपने को निराश्रित महसूस कर रहे थे।
अंतर्नाद
मेरी खिड़की के ठीक बाहर खड़ा पीपल अब सिर्फ एक पेड़ नहीं, मेरा आत्मीय साथी था। उसकी टहनियाँ मेरी दीवारों को सहलातीं और पत्तियाँ खिड़की खुलते ही मुझे छूने को आतुर हो उठतीं। खिड़की जब भी बंद होती हैं, तब कई बार पकी हुई पिकरियां (पीपल के फल) उसके बन्द पट पर पट - पट गिरतीं, कभी रोशनदान के रस्ते भीतर आ गिरतीं है। यह उसके अपने अंदाज में एक खास संकेत होता है, आग्रह और मनुहार भी। जैसे वह कह रहा हो - 'ऐ कवि!
खोलो न........ अपनी खिड़की और मैं अन्त:प्रेरित सा हौले से खिड़की खोल देता हूँ। खिड़की खुलते ही उसकी सतरंगी ऊर्जा और प्राणवायु से कमरा महक उठता। वह खुद ज़हर (कार्बन) पीकर मुझे अमृत (ऑक्सीजन) बाँटता था। थकावट में वह मेरा इष्टदेव बन जाता।
उस दोपहर मैंने आँखें मूँदकर उसकी वंशवृद्धि और अनंत विस्तार की मंगल-कामना की ही थी कि अचानक बाहर एक भीषण गर्जना हुई।
खिड़की के बाहर सड़क पर एक पीली जेसीबी मशीन और उसके पीछे सरकारी गाड़ी खड़ी थी। गाड़ी में बेिफक्री से बैठे कुछ 'स्वार्थी' चेहरे फाइलों में उलझे थे। मेरा दिल बैठ गया। 'विकास' की अंधी दौड़ आज मेरे इष्टदेव के द्वार तक आ पहुंची थी। चंद सरकारी कागजों पर खिंची लकीरें अब उस जीवित सत्ता की बलि माँग रही थीं।
मेरी प्रार्थना, एक सवाल में बदल गई- 'हे प्रकृति के देवता, क्या मैं इन खुदगर्ज इंसानों से तुम्हारी रक्षा कर पाऊँगा? '
पीपल शांत था, पर मेरी रूह उस अनकही दहशत से काँप रही थी।
कलरव का अलार्म
सुबह अब मुनिया की नींद चिड़ियों के कलरव से नहीं, बल्कि खिड़की से छनकर आती गाड़ियों के कर्कश भोंपू और कड़वे धुएँ की गंध से खुलती है।
मुनिया को याद है, इसी बुद्ध-चित्र के पीछे कभी गौरैया का सजीव संसार धड़कता था। बिल्ली की आहट भर से पूरा आँगन नन्हीं चीखों और फुर्र-फुर्र की आवाजों से जीवंत हो उठता था। पर आज? आज बुद्ध शांत थे और कमरा निर्जीव।
मुनिया छत पर आई। जहाँ कभी अमरूद और मुनगे की टहनियाँ हवा में झूलती थीं, वहाँ अब कंक्रीट का एक दोमंजिला ढांचा सीना ताने खड़ा था। 'मुनिया बिटिया, नीचे वाले हिस्से का किराया बढ़ गया है, देख लेना, पीछे से पिता की व्यावसायिक आवाज़ आई।
मुनिया चुप रही। उसकी नज़र सूनी मुंडेर पर टिक गई। न कोई तिनका, न कोई चिड़िया। आसमान पर धुंध की चादर थी, जैसे औद्योगीकरण की राख ने शहर के फेफड़ो के साथ-साथ उसकी स्मृतियों को भी सलेटी कर दिया हो।
'बाबूजी, नए किराएदार तो आ गए, पर वे पुराने बाशिंदे कहाँ बेदखल हो गए?' उसने सूनी मुंडेर की ओर इशारा किया।
पिता निरुत्तर रहे। शहर बड़ा हो गया था, पर परिंदों के लिए आसमान छोटा पड़ गया था। मुनिया की आँखों में नमी थी और भीतर एक हूक- कि काश! वह प्राकृतिक अलार्म फिर से गूँज उठता।