निकाहनामे की शर्त

पुराने लखनऊ की एक तंग लेकिन बेहद जीवंत गली में सुबह की शुरुआत एक अलग ही सुकून के साथ होती थी।;

Update: 2026-06-13 21:38 GMT
  • महेन्द्र तिवारी

फातिमा के होठों पर एक बेहद मीठी और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए कहा क्योंकि इसी एक कागज के टुकड़े में मेरी पूरी दुनिया की बेहद खूबसूरत शुरुआत भी दर्ज है और मेरी आधी उम्र की खामोशी भी इसी में लिपटी हुई है। मायरा ने उस बात को सुनकर बड़े ही ध्यान से उस कागज को पूरी तरह से खोला।

पुराने लखनऊ की एक तंग लेकिन बेहद जीवंत गली में सुबह की शुरुआत एक अलग ही सुकून के साथ होती थी। फज्र की पहली अजान के स्वर जैसे ही हवा में गूंजते, वैसे ही पुराने घरों की रसोइयों से इलायची, अदरक और कड़क चाय की महक उठने लगती थी। इन्हीं मिली जुली खुशबुओं और सुबह की हल्की धुंध के बीच फातिमा बेगम का घर बसा था। बाहर से देखने पर यह महज़ एक साधारण सी पुरानी दो मंजिला इमारत लगती थी जिसकी दीवारों पर वक्त ने अपने गहरे निशान छोड़ दिए थे, लेकिन भीतर कदम रखते ही एक पूरी दुनिया अपनी बाहें खोले स्वागत करती थी। इस घर में पुराने लकड़ी के संदूक, फीकी पड़ चुकी लेकिन बेहद साफ सुथरी सूती चादरें, उर्दू अदब की ढेरों किताबें और अनगिनत यादों की तहें सुरक्षित थीं।

फातिमा बेगम के पति हामिद रज़ा को गुजरे हुए तीन साल का लंबा वक्त बीत चुका था। उनके जाने के बाद घर की दीवारें थोड़ी सूनी जरूर हो गई थीं और आंगनों में गूंजने वाली आवाजें कुछ कम हो गई थीं, मगर घर का सलीका और उसका ठहराव तनिक भी कम नहीं हुआ था। फातिमा की सुबह हमेशा की तरह फज्र की नमाज और कुरआन की तिलावत के साथ शुरू होती थी। इसके बाद वह सीधे अपने आंगन में जातीं। वहां तुलसी के पौधे के साथ रखे एक छोटे से गुलाब के पौधे को सींचना उनका रोज़ का नियम था। यह गुलाब का पौधा कोई साधारण पौधा नहीं था, बल्कि उनकी बहू सना ने अपनी शादी के पहले ही साल उन्हें बड़े प्यार से उपहार में दिया था। सना आधुनिक ख्यालों वाली पढ़ी लिखी लड़की थी। शुरुआत में फातिमा को उसकी यह आधुनिकता और किताबों से लगाव थोड़ा खटकता था क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी एक अलग ही सांचे में ढली हुई देखी थी। मगर वक्त के साथ वही सना इस पुराने घर की सबसे बड़ी और मजबूत ढाल बन गई जिसने फातिमा के अकेलेपन को अपने स्नेह से भर दिया था।

फातिमा की इकलौती बेटी मायरा शहर के एक नामी कॉलेज में इतिहास की पढ़ाई कर रही थी। मायरा का स्वभाव बड़ा ही अनूठा था। वह न तो बहुत ज्यादा बातें करने वाली वाचाल लड़की थी और न ही बिल्कुल खामोश रहने वाली। उसकी एक बड़ी ही दिलचस्प आदत थी कि वह किसी भी पुराने घर में रखी सदियों पुरानी चीज को देखती तो सबसे पहले उसे बड़े प्यार से अपने हाथों में उठाती, उसकी बनावट को महसूस करती और फिर उसकी कहानी पूछती। उसके बाद ही वह उस वस्तु का असल काम पूछती थी। उसकी इस आदत पर अक्सर फातिमा मुस्कुरा देती थीं और बड़े प्यार से कहती थीं कि यह लड़की तो अलमारी का दरवाजा खोलते ही सीधे अपने अतीत की गहराइयों में गोते लगाने लगती है।

एक दिन की बात है जब शहर में भारी बारिश हो रही थी। उस भीगी और ठंडी दोपहर में अचानक बिजली चली गई। पूरे घर में एक अजीब सी खामोशी और हल्की सी उदासी उतर आई थी। बारिश की बूंदों की टपटपाहट के अलावा कोई शोर नहीं था। ऐसे शांत माहौल में मायरा ने अपने घर की सबसे पुरानी और रहस्यमय अलमारी खोलने का मन बनाया। वह अलमारी फातिमा के कमरे में रखी थी और उसमें पुराने कपड़ों से कहीं ज्यादा पुराने किस्से और कहानियां बंद थीं। उस अलमारी के हर खाने में कुछ न कुछ ऐसा था जो गुजरे हुए कल की गवाही देता था। कभी पुराने रिश्तों की धुंधली पड़ती तस्वीरें, कभी हामिद रज़ा की अपनी पसंदीदा उर्दू जुबान में लिखी हुई खूबसूरत कविताएं, तो कभी एक पीला पड़ चुका कागज जिसे फातिमा ने कई बरसों से एक मखमली रूमाल में बड़े जतन से लपेट कर रखा हुआ था।

मायरा की नजर उस मखमली रूमाल पर पड़ी और उसने उत्सुकतावश उसे खोल लिया। उसमें रखे उस पुराने और पीले कागज को देखकर मायरा ने पूछा कि अम्मी यह क्या चीज है।

फातिमा ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा। उस पल ऐसा लगा जैसे बरसों पुरानी यादों का सारा वजन उनकी आंखों की पलकों पर आ गया हो। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया कि यह तुम्हारे अब्बू का निकाहनामा है। मायरा को हैरानी हुई और उसने पूछा कि आपने इसे इतने सालों तक इतने जतन से और इतनी हिफाजत के साथ क्यों संभाल कर रखा है।

फातिमा के होठों पर एक बेहद मीठी और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए कहा क्योंकि इसी एक कागज के टुकड़े में मेरी पूरी दुनिया की बेहद खूबसूरत शुरुआत भी दर्ज है और मेरी आधी उम्र की खामोशी भी इसी में लिपटी हुई है। मायरा ने उस बात को सुनकर बड़े ही ध्यान से उस कागज को पूरी तरह से खोला। उस पर उर्दू की झुकी हुई और बेहद नफीस इबारतें लिखी हुई थीं। सुनहरी कलम से लिखी गई तारीखें उस दौर की कलाकारी और अहमियत को बयां कर रही थीं। लेकिन मायरा की आंखें उस निकाहनामे के एक कोने पर जाकर टिक गईं जहां बेहद बारीक और छोटे अक्षरों में एक खास शर्त लिखी गई थी। वह शर्त किसी मौलवी या कानूनी किताब से निकली हुई सख्त हिदायत नहीं लगती थी, बल्कि वह एक इंसान के साफ और सच्चे दिल से निकली हुई पुकार जैसी थी।

मायरा ने उस बारीक शर्त को पूरा पढ़ा और फिर हैरानी से अपना सिर उठाया। उसने अपनी अम्मी की तरफ देखते हुए कहा कि अम्मी इसमें तो साफ साफ लिखा है कि आपकी पढ़ाई शादी के बाद भी जारी रहेगी। यह सुनकर फातिमा की आंखें कुछ पलों के लिए बिल्कुल स्थिर हो गईं। वह अपने अतीत के उस सुनहरे दिन में खो गईं जब यह निकाहनामा तैयार किया जा रहा था। फिर वह बहुत ही हल्की सी हंसी हंस पड़ीं। यह एक ऐसी हंसी थी जिसमें खुशी के साथ साथ बीते हुए कल के आंसुओं की पहली और बारीक परत भी छुपी रहती है।

फातिमा ने पुरानी बातों को याद करते हुए बताया कि तुम्हारे अब्बू ने खुद अपनी मर्जी से यह शर्त उस निकाहनामे में लिखवाई थी। उनकी जुबान बहुत कम चलती थी और वह काम बहुत ज्यादा करते थे। बाहर के लोग अक्सर उन्हें देखकर यही समझते थे कि वह मिजाज के बहुत सख्त और अनुशासन प्रिय इंसान हैं, मगर हकीकत में उनका दिल पानी की तरह बिल्कुल साफ और नर्म था। मायरा चुपचाप उस पुराने कागज को निहारती रही और फिर उसने धीमी आवाज में पूछा कि क्या आपने उस शर्त के मुताबिक शादी के बाद आगे की पढ़ाई की थी।

फातिमा ने एक लंबी सांस छोड़ते हुए जवाब दिया कि पढ़ाई तो हुई थी मगर मैं उसे पूरा नहीं कर पाई। कभी मेरी अम्मी की तबीयत खराब रहने लगी, कभी घर की नई जिम्मेदारियां आ गईं और फिर तुम बच्चों की परवरिश में वक्त का पता ही नहीं चला। लेकिन तुम्हारे अब्बू ने एक बार मुझसे कहा था कि फातिमा तालीम हासिल करना सिर्फ इसलिए नहीं होता कि इंसान बाहर जाकर कोई नौकरी करे, बल्कि तालीम इंसान के जमीर को जगाती है और उसे भीतर से पूरी तरह रोशन कर देती है।

यह बात शायद उस बारिश वाली दोपहर में वहीं खत्म हो गई होती, लेकिन उस शाम फातिमा को किसी जरूरी काम से अपनी बड़ी बहन सलमा खातून के घर जाना पड़ गया। सलमा खातून बहुत ही पुराने उसूलों और सख्त मिजाज वाली औरत थीं। उनकी नजर में घर की इज्जत, बेटी की मर्यादा और बहू की जुबान का खामोश रहना, ये तीनों चीजें एक ही रस्सी के अलग-अलग सिरे थे जिन्हें कसकर पकड़ना बहुत जरूरी था। वह अक्सर अपनी छोटी बहन फातिमा को उनके रहन सहन पर ताने दिया करती थीं। उनका हमेशा यही कहना होता था कि अब जमाने की हवा बदल गई है और आजकल की औरतें किताबों में अपना दिमाग खपाने के बजाय जुबान लड़ाने और बातें बनाने में ज्यादा बहादुर हो गई हैं।

उस दिन सलमा खातून की बैठक में उनके मोहल्ले की दो पड़ोसिनें भी बैठी हुई थीं। बातों ही बातों में उन औरतों ने फातिमा के घर और उनके तौर तरीकों की चर्चा छेड़ दी। उनमें से एक पड़ोसिन ने थोड़ा तंज कसते हुए कहा कि अरे हामिद रज़ा ने तो अपनी बीवी और बेटी को बड़ी लाडली बनाकर छोड़ दिया था और अब फातिमा अपनी बेटी को भी बेझिझक कॉलेज भेजती हैं। उसने आगे कहा कि आजकल की लड़कियां हाथ से निकल जाती हैं।

सलमा खातून ने उस पड़ोसिन की अधूरी बात को तुरंत आगे बढ़ाते हुए कहा कि आजकल की लड़कियां अपने घर के बड़ों की बात बिल्कुल नहीं सुनतीं और सिर्फ अपने मन की मनमानी करती हैं। यह सब सुनकर फातिमा को बुरा तो लगा लेकिन उन्होंने बेहद शांत और संयत स्वर में सिर्फ इतना कहा कि और अगर मन भी उसी घर का हो जिसमें वह पली बढ़ी है, तो फिर इसमें क्या बुराई है। फातिमा की इस बात पर कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया और कुछ क्षणों के लिए गहरी चुप्पी उतर आई। मगर यह चुप्पी हमेशा शांति का प्रतीक नहीं होती। कभी कभी वह केवल पुरानी मान्यताओं के टूटने से पहले की जाने वाली एक गहरी सांस होती है।

उसी हफ्ते मायरा ने अपने कॉलेज के अंतिम वर्ष में एक नया और अनोखा शोध विषय चुना जिसका शीर्षक था उर्दू दस्तावेजों में महिलाओं की अनकही और अदृश्य भूमिका। उसकी प्रोफेसर डॉ. आयशा ने उसे इस विषय पर गहराई से काम करने के लिए पुराने कानूनी कागज, पुराने निकाहनामे, विरासत से जुड़े पत्र और पारिवारिक डायरियां खोजने और उन्हें पढ़ने की सलाह दी। जैसे ही प्रोफेसर ने निकाहनामे का जिक्र किया, मायरा को अचानक उस बारिश वाली दोपहर, अपने घर की वह पुरानी अलमारी, अपनी मां की छलकती हुई आंखें और उस पीले पड़ चुके निकाहनामे में सुनहरी स्याही से लिखी गई वह बारीक शर्त याद आ गई।

उसने उसी दिन कॉलेज से घर आकर अपनी मां फातिमा से पूछा कि अम्मी क्या मैं आपके उस खास निकाहनामे को अपने कॉलेज के प्रोजेक्ट में इस्तेमाल कर सकती हूं। उसने अपनी मां को तसल्ली देते हुए कहा कि मैं इसमें आपका और अब्बू का नाम बदल दूंगी और इसे बस एक सच्ची मिसाल की तरह पेश करूंगी। फातिमा यह बात सुनकर पहले तो थोड़ी हिचकिचाईं क्योंकि वह उनके जीवन का सबसे निजी और पवित्र हिस्सा था। लेकिन फिर वह मुस्कुराईं और बड़े ही गर्व के साथ बोलीं कि यह अब सिर्फ मेरा निजी कागज नहीं है बेटी, बल्कि यह उस पुराने दौर की एक बहुत ही छोटी लेकिन बेहद अहम जीत है जब एक आम औरत की पढ़ाई को भी किसी दावत या खैरात की तरह नहीं बल्कि उसके अपने हक और अधिकार की तरह कानूनी रूप से लिखा गया था।

अगले दिन सुबह होते ही मां और बेटी ने मिलकर उस पुराने संदूक की कुछ और गहरी तहें खोलीं। संदूक के सबसे निचले हिस्से में एक पुराना रजिस्टर मिला जिसे हरे रंग के मजबूत धागे से बांध कर रखा गया था। जब मायरा ने उस धागे को खोला तो उसने देखा कि उस रजिस्टर में फातिमा की पढ़ाई के कुछ पुराने नोट्स सहेज कर रखे गए थे। उन पन्नों पर उर्दू शायरी के कुछ मशहूर शेर लिखे थे और इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण पन्ने भी दर्ज थे। लेकिन जो बात मायरा के दिल को सबसे ज्यादा छू गई वह यह थी कि उन नोट्स के बीच बीच में उसके अब्बू हामिद रज़ा के हाथ से लिखे हुए कुछ छोटे छोटे और प्यार भरे संदेश भी थे।

एक पन्ने के किनारे पर लिखा था कल तुम्हारी क्लास है इसलिए रात का खाना समय पर खा लेना। दूसरे पन्ने पर लिखा था क्या पढ़ते पढ़ते तुम्हारी चाय ठंडी हो गई। और एक जगह बहुत ही प्यार से लिखा था कि तुम्हारी लिखावट मेरी लिखावट से बहुत बेहतर और सुंदर है। इन छोटी छोटी लेकिन अनमोल पंक्तियों को पढ़ते हुए मायरा को अपनी जिंदगी में पहली बार अपने पिता के व्यक्तित्व की पूरी और सच्ची छवि समझ में आई। वह अब तक यही मानती थी कि उसके अब्बू सिर्फ पांच वक्त की नमाज पढ़ने वाले, खामोशी से अपनी दुकान चलाने वाले और बहुत ही कम बोलने वाले एक सीधे सादे आदमी थे। लेकिन उन पन्नों ने यह साबित कर दिया कि वह एक ऐसे जीवनसाथी थे जो अपनी पत्नी की अधूरी उड़ान को अपने घर की चारदीवारी के नीचे दबाना नहीं चाहते थे, बल्कि उसे पूरा आसमान देना चाहते थे।

मायरा ने भावुक होकर अपनी मां से पूछा कि अम्मी क्या अब्बू ने आपको कभी आगे बढ़ने से रोका नहीं। फातिमा ने खिड़की से बाहर आसमान की तरफ देखते हुए बहुत ही गहरे अर्थों में कहा कि रोकने वाले तो इस दुनिया में बहुत थे बेटी। घर के अंदर भी कुछ लोग ताने देते थे और बाहर के लोग भी बातें बनाते थे। लेकिन तुम्हारे अब्बू ने हमेशा एक ही बात कही थी कि औरत की तालीम से घर का आंगन छोटा नहीं होता बल्कि घर का दायरा और बड़ा हो जाता है। फातिमा ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा कि बस इस दुनिया और समाज को यह सीधी सी बात समझाने में तुम्हारे अब्बू के हाथ भी कई बार बहुत कड़े पड़ जाते थे और उन्हें लोगों की नाराजगी भी सहनी पड़ती थी।

कुछ दिनों की कड़ी मेहनत के बाद मायरा ने कॉलेज के सेमिनार में अपना वह शोध पत्र प्रस्तुत किया। उसने अपनी मां की कहानी सीधे सीधे शब्दों में नहीं सुनाई, मगर उसने अपने शोध में उस निकाहनामे का विस्तार से जिक्र जरूर किया जिसमें एक मुस्लिम महिला की पढ़ाई और उसकी आजादी को विवाह जैसे पवित्र रिश्ते के भीतर पूरी इज्जत के साथ जगह मिली थी। उसने अपने शोध के माध्यम से यह भी बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि पुराने मुस्लिम घरों की असली और मुकम्मल तस्वीर केवल पर्दे में रहना या खामोशी से अत्याचार सहना नहीं है। उसने बताया कि उन घरों में शालीनता के साथ साथ समझदारी का विकास भी होता है और पुरानी परंपराओं के साथ साथ नए बदलाव भी पलते और बढ़ते हैं।

उसकी शानदार प्रस्तुति के बाद पूरे हॉल में तालियां गूंज उठीं और उसकी प्रोफेसर डॉ. आयशा ने बहुत ही फख्र के साथ कहा कि मायरा तुम्हारा यह विषय सिर्फ कुछ पुराने दस्तावेजों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक पुराने घर की बहुत ही परिपक्व और नैतिक बुद्धि का जीता जागता प्रमाण है।

उस रात जब मायरा खुशी खुशी घर लौटी तो उसने देखा कि फातिमा अपने उसी पुराने आंगन में चुपचाप बैठी हुई थीं। उनके सामने आसमान में खिली हुई चांदनी थी और उनके पास मेज पर एक चाय का कप रखा हुआ था जिसमें से हल्की भाप उठ रही थी। मायरा ने अपनी मां के पास जाकर बहुत ही उत्साह के साथ कहा कि अम्मी मेरा आज का प्रोजेक्ट बहुत ही ज्यादा अच्छा हुआ और सबको बहुत पसंद आया। फातिमा ने चाय का वह कप अपनी बेटी की तरफ बढ़ाते हुए बड़े प्यार से पूछा कि उस पुराने कागज ने नाम रोशन किया या मेरी काबिल बेटी ने नाम रोशन किया। मायरा ने मुस्कुराते हुए अपनी मां के हाथ से कप लिया और कहा कि दोनों ने मिलकर हमारा नाम रोशन किया है।

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद हामिद रज़ा की बरसी का दिन आ गया। उस दिन घर में कुरआन खतम करवाया गया, उनकी रूह के सुकून के लिए लंबी दुआएं मांगी गईं और पड़ोस की सभी औरतों ने मिलकर सादा सी दावत खाई। उसी दिन सलमा खातून भी फातिमा के घर आईं। वे कुछ देर तक बिल्कुल चुपचाप एक कोने में बैठी रहीं और घर के बदलते हुए लेकिन सुकून भरे माहौल को देखती रहीं। फिर वह धीरे से उठकर अपनी छोटी बहन फातिमा के पास आईं और उनके बगल में बैठकर बहुत ही धीमे और कांपते हुए स्वर में बोलीं कि तेरे हामिद ने अपनी जिंदगी में बहुत ही अच्छा काम किया था।

फातिमा ने हैरानी से अपनी बहन की तरफ देखा क्योंकि उन्होंने सलमा खातून के मुंह से कभी हामिद रज़ा की ऐसी तारीफ नहीं सुनी थी। सलमा खातून ने अपनी आंखें शर्मिंदगी से झुका लीं और कहा कि मैं आज तक यही समझती थी कि घर की औरत को सिर्फ और सिर्फ सहना चाहिए और जुबान नहीं खोलनी चाहिए। मगर आज तुम्हारे इस भरे पूरे और खुशहाल घर को देखकर मैं यह समझ रही हूं कि सिर्फ सहना और घर को सही मायनों में संभालना, ये दोनों चीजें एक नहीं होतीं। यह जिंदगी में पहली बार था जब फातिमा ने अपनी उस सख्त मिजाज बहन की आवाज में इतनी नरमी और इतनी समझदारी सुनी थी। उसने अपने ही हाथों से सलमा खातून के लिए एक कप चाय डाली और उन्हें दी, उस पल ऐसा लगा जैसे उन दोनों बहनों के बीच बरसों से चली आ रही दूरी और कड़वाहट की चाय में अचानक बहुत सारी चीनी घुल गई हो।

उसी रात मायरा ने अपनी मां के पास लेटकर कहा कि अम्मी मैंने फैसला किया है कि मैं अब आगे एम.ए. की पढ़ाई भी करूंगी। फातिमा ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सिर हिलाया और पूरे विश्वास के साथ कहा कि बिल्कुल करो। मायरा ने फिर पूछा कि और क्या मैं पढ़ाई के बाद नौकरी भी करूंगी। फातिमा ने उसी विश्वास के साथ जवाब दिया कि हां तुम नौकरी भी करो। मायरा ने थोड़ा रुककर पूछा कि अगर मेरी शादी हो गई तो फिर मैं क्या करूंगी।

इस सवाल पर फातिमा कुछ देर के लिए बिल्कुल मौन हो गईं। उन्होंने अपनी बेटी के चेहरे को बड़े ध्यान से देखा और फिर बहुत ही सादगी और गंभीरता के साथ बोलीं कि शादी के बाद भी तुम अपनी पढ़ाई और अपना काम जारी रखोगी। तुम किसी ऐसे इंसान के साथ अपना घर बसाना जो तुम्हारी पढ़ाई और तुम्हारी काबलियत को तुम्हारा सबसे कीमती जेवर समझे, उसे अपने कंधों का बोझ कभी न माने। मायरा का दिल अपनी मां की इन बातों से भर आया और उसने झुककर अपनी मां के दोनों हाथों को चूम लिया।

बहुत दिनों बाद उस घर की वह पुरानी अलमारी एक बार फिर से खोली गई। लेकिन इस बार उसमें केवल अतीत के वे पुराने और पीले पड़ चुके कागज नहीं रखे गए, बल्कि इस बार उसमें एक बिल्कुल नई फाइल बड़े जतन से रखी गई। वह फाइल मायरा की उस मुकम्मल थीसिस की थी जिस पर उसने दिन रात मेहनत की थी। उस फाइल के सबसे पहले पन्ने पर मायरा ने अपने शोध का अंतिम शीर्षक लिखा था। वह शीर्षक कुछ इस तरह था कि निकाहनामे के हाशिए पर मुस्लिम घरों में स्त्री शिक्षा की मौन परंपरा।

फातिमा ने उस फाइल को अपने हाथों में लिया और उस पन्ने पर लिखे हुए शब्दों को ध्यान से पढ़ा। फिर वह बहुत ही सुकून के साथ मुस्कुराकर बोलीं कि मेरी बच्ची अब यह सिर्फ हमारी एक पुरानी कहानी नहीं रह गई है। मायरा ने अपनी मां की आंखों में देखते हुए पूछा कि तो फिर अब यह क्या बन गई है अम्मी। फातिमा ने उसी समय दूर मस्जिद से उठने वाली अजान की मुकद्दस आवाज की तरफ अपना रुख किया और अपनी आंखें बंद करते हुए कहा कि अब यह आने वाली हर नस्ल के लिए एक मुकम्मल दुआ बन गई है।

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