ज्ञान के समुद्र को सूखने मत दीजिए

1911 में सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा के साथ 1891 में स्थापित इम्पीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी भी दिल्ली लाई गई।;

By :  DB Desk
Update: 2026-10-13 22:16 GMT
  • अरुण कुमार डनायक

किसी समाज की शक्ति उसके आधुनिक भवनों और डिजिटल साधनों के साथ-साथ इस बात से भी तय होती है कि वह अपने ज्ञान-संग्रह को कितना सुरक्षित रखता है। पुस्तकालयों का महत्व इसलिए लोकतंत्र के बुनियादी चरित्र से जुड़ा है। वे पाठकों को विविध विचारों, इतिहास की अलग-अलग व्याख्याओं और परस्पर विरोधी मतों से परिचित कराते हैं।

1911 में सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा के साथ 1891 में स्थापित इम्पीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी भी दिल्ली लाई गई। पहले इसे सिविल लाइंस स्थित ओल्ड सेक्रेटेरिएट भवन, फिर नॉर्थ ब्लॉक और अंतत: 1969 में शास्त्री भवन में स्थान मिला। केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय यानी सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी के नाम से पहचानी जाने वाली लगभग 135 वर्ष पुरानी यह संस्था आज फिर विस्थापन के संकट में है। सवाल केवल 8.5 लाख से अधिक पुस्तकों को रखने की जगह का नहीं, बल्कि इस ज्ञान-संग्रह के संरक्षण और भावी पीढ़ियों तक इसकी पहुंच के प्रति हमारे सरोकार का भी है।

इसी प्रश्न को तुलसी सदन पुस्तकालय की कहानी और व्यापक बनाती है। रामचरितमानस के 400 वर्ष पूरे होने पर 1972 में स्थापित इस पुस्तकालय में 14 भारतीय भाषाओं की पुस्तकें थीं। दिल्ली मेट्रो निर्माण के कारण 2011 में इसे अस्थायी रूप से बंद किया गया, लेकिन डेढ़ दशक बीतने को है और दो लाख से अधिक पुस्तकें अब भी डिब्बों में बंद हैं, पाठकों और शोधकर्ताओं की पहुंच से दूर।

एक ओर केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय पर्याप्त स्थान की तलाश में है, दूसरी ओर तुलसी सदन की दो लाख से अधिक पुस्तकें वर्षों से पाठकों की पहुंच से दूर हैं। दोनों स्थितियां अलग होते हुए भी एक ही सवाल उठाती हैं—क्या हमारी विकास-यात्रा में ज्ञान की विरासत के लिए पर्याप्त जगह बची है?

पुस्तकालय आखिर होते क्या हैं? क्या वे केवल अलमारियों में रखी पुस्तकों का समूह हैं? नहीं। वे किसी सभ्यता की स्मृति होते हैं। किसी समाज ने क्या सोचा, किन प्रश्नों से जूझा और विज्ञान, दर्शन, धर्म, साहित्य, चिकित्सा तथा शासन के बारे में क्या समझ विकसित की—इन सबका प्रमाण पुस्तकों और अभिलेखों में मिलता है। इसलिए किसी पुस्तक का नष्ट होना केवल एक वस्तु का नष्ट होना नहीं है; उसके साथ अतीत को समझने का एक रास्ता भी बंद हो जाता है।

नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के विनाश की ऐतिहासिक स्मृति हमें चेताती है कि ज्ञान की धरोहर का नष्ट होना केवल पुस्तकों का नष्ट होना नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति को क्षति पहुंचाना भी है। इतिहास के ऐसे प्रसंगों से सबक लेते हुए हमें समझना होगा कि पुस्तकालयों का संरक्षण केवल अतीत को सहेजना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और विचारों के रास्ते खुले रखना भी है।

केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय की स्थिति इसी कारण चिंताजनक है। शास्त्री भवन में लगभग 5,500 वर्ग मीटर क्षेत्र में चार मंजिलों पर फैले इस पुस्तकालय में दुर्लभ पुस्तकें, पुराने दस्तावेज, सरकारी रिकॉर्ड और राजपत्र हैं। इसके दुर्लभ पुस्तक अनुभाग की सबसे पुरानी पुस्तक एक फ्रांसीसी यात्री के लेखों का संकलन है, जो 1702 का बताया जाता है। भारत सरकार के प्रकाशनों के महत्वपूर्ण भंडार के रूप में काम करने वाले इस पुस्तकालय का उपयोग सरकारी अधिकारियों, शोधार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों द्वारा भी किया जाता है। इतने समृद्ध ऐतिहासिक संग्रह को केवल स्थानांतरण की प्रशासनिक समस्या मानना उसकी वास्तविक महत्ता को कम करके आंकना होगा।

केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय के लिए पर्याप्त जगह की आवश्यकता केवल पुस्तकों को रखने के लिए नहीं है। संग्रह के संरक्षण, पाठकों और शोधकर्ताओं की सुविधा तथा पुस्तकालय की अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए भी उपयुक्त स्थान चाहिए।

अब इस मामले ने सर्वोच्च न्यायालय का भी ध्यान खींचा है। न्यायालय ने 135 वर्ष पुराने पुस्तकालय के पुनर्वास का स्वत: संज्ञान लिया। कर्तव्य भवन-02 के भूतल पर दो कमरों का प्रस्ताव संपदा निदेशालय ने जनवरी में दिया था, जिसे संस्कृति मंत्रालय ने अपर्याप्त बताया था। अब आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने कर्तव्य पथ पुनर्विकास योजना में पुस्तकालय के लिए स्थान निर्धारित किए जाने और निर्माण प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी है। अंतिम कसौटी यही होगी कि यह स्थान पुस्तकालय के संग्रह, संरक्षण और पाठक सुविधा की जरूरतें पूरी करता है या नहीं।

पुस्तकालय का जीवन उसके पाठकों से है। दुर्लभ पुस्तकें यदि गोदामों में बंद रहें और शोधकर्ता उन तक न पहुंच सकें तो संरक्षण अधूरा है। केवल डिजिटलीकरण भी इसका विकल्प नहीं, क्योंकि मूल पुस्तक की भौतिक विशेषताएं और ऐतिहासिक संकेत डिजिटल प्रति में पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहते। इसलिए प्रशिक्षित अभिलेखपाल, वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण और सबसे बढ़कर पाठकों-शोधकर्ताओं के लिए सहज पहुंच—इन सभी को समान महत्व देना होगा। ज्ञान को सुरक्षित रखकर भी यदि उसे लोगों तक पहुंचने से रोक दिया जाए तो वह जीवित परंपरा नहीं रह जाता।

यहां प्रश्न केवल 'विकास बनाम विरासत' का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि विकास की परिभाषा में ज्ञान और स्मृति के लिए कितनी जगह है। क्या आधुनिक भवनों के साथ हमारे पुराने ज्ञान-भंडार भी सुरक्षित रहेंगे, या पुस्तकालय विकास की दौड़ में पीछे छूट जाएंगे? और इससे भी बड़ा प्रश्न है—क्या हम उस ज्ञान-समुद्र को सूखने दे रहे हैं, जिससे समाज की ज्ञान-धारा निकलती है?

किसी समाज की शक्ति उसके आधुनिक भवनों और डिजिटल साधनों के साथ-साथ इस बात से भी तय होती है कि वह अपने ज्ञान-संग्रह को कितना सुरक्षित रखता है। पुस्तकालयों का महत्व इसलिए लोकतंत्र के बुनियादी चरित्र से जुड़ा है। वे पाठकों को विविध विचारों, इतिहास की अलग-अलग व्याख्याओं और परस्पर विरोधी मतों से परिचित कराते हैं। इससे समाज किसी एक आख्यान या सत्ता-केंद्रित दृष्टि पर निर्भर रहने के बजाय प्रश्न करने, विचारों की तुलना करने और अपने निष्कर्ष स्वयं बनाने की क्षमता विकसित करता है।

भारत के सामने आज अवसर है कि वह अपनी पुस्तकालय नीति को केवल भवन, बजट और पुस्तकों की संख्या तक सीमित न रखे। लखनऊ का मुंशी नवल किशोर प्रेस, रामपुर रज़ा पुस्तकालय, तुलसी सदन, केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय और नगर निगम स्तर के पुस्तकालय हमारी ज्ञान-धरोहर की विविध परतों को सुरक्षित रखते हैं। इन्हें भी उतनी ही गंभीरता से संरक्षित किया जाना चाहिए, जितनी गंभीरता से हम अपने स्थापत्य स्मारकों की रक्षा करते हैं।

आवश्यकता केवल केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय को पर्याप्त जगह देने या तुलसी सदन की पेटियां खोलने की नहीं, बल्कि ऐसी संस्कृति विकसित करने की है जिसमें पुस्तकालय खर्च नहीं, ज्ञान में निवेश हों; दुर्लभ पुस्तकें पुराना कागज नहीं, सामूहिक स्मृति हों; और पाठक ज्ञान-संपदा का स्वाभाविक अधिकारी हो।

भारत को पुस्तकालयों के संरक्षण के लिए समर्पित निधि, आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की व्यवस्था करनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी से भी इस प्रयास को बल मिल सकता है। लेकिन इन सबका उद्देश्य केवल पुस्तकों को बचाना नहीं, उन्हें पाठकों और शोधकर्ताओं तक पहुंचाना होना चाहिए।

हमें तय करना होगा कि हम अगली पीढ़ी को कैसी विरासत देना चाहते हैं—बड़े-बड़े भवनों का देश या समृद्ध ज्ञान-संग्रहों वाला देश? ऐसा समाज जो केवल सत्ता की उपलब्धियों को याद रखे, या ऐसा जो अपनी उपलब्धियों, असफलताओं, संघर्षों और विचारों—सबको पढ़ सके?

(लेखक एवं समाजसेवी )

Tags:    

Similar News