ललित सुरजन की कलम से - वर्तमान समय और प्रगतिशील आंदोलन
'भारत में ऐसे विद्वतजनों की कमी नहीं है जो पाकिस्तान निर्माण के लिए गांधी-नेहरू को दोषी ठहराते हैं।;
'1947 में देश का आज़ाद होना एक बहुत बड़ी घटना थी जिसने तीसरी दुनिया के तमाम अन्य मुल्कों को प्रेरणा दी व उनकी अपनी आज़ादी की लड़ाई को धार देने का काम किया; लेकिन इसके समानांतर भारत का विभाजन होना भी उतनी ही महत्वपूर्ण दूसरी घटना थी। आज यह विचार करने की आवश्यकता है कि जब दक्षिण एशिया में धर्म पर आधारित एक नए देश याने पाकिस्तान की स्थापना हुई ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में धर्म पर आधारित एक दूसरे देश याने इजराइल की स्थापना भी हुई।'
'भारत में ऐसे विद्वतजनों की कमी नहीं है जो पाकिस्तान निर्माण के लिए गांधी-नेहरू को दोषी ठहराते हैं। उन्हें यह सवाल स्वयं से पूछना चाहिए कि फिलिस्तीन को खत्म कर इजरायल की स्थापना का दोषी कौन था। मैंने वर्तमान समय का प्रारंभ निर्धारण करते हुए आज से सत्तर साल पहले जाने की आवश्यकता इसलिए महसूस की क्योंकि उपनिवेशवादी व साम्राज्यवादी ताकतों ने उस दशक में एशिया की धरती पर जो खेल खेला आज उसका विकराल स्वरूप लगभग पूरे एशिया में और उत्तर अफ्रीका में तो देखने मिल ही रहा है, यूरोप भी उसकी आंच में झुलसने से बच नहीं पाया है। यह गौरतलब है कि जिन ताकतों ने धर्म के आधार पर पाकिस्तान और इजरायल का निर्माण करवाया वह नीति आज भी कहीं न कहीं कायम है। इंडोनेशिया से अलग होकर तिमोर ले-ईस्ते, सूडान से पृथक कर दक्षिण सूडान व उसके पूर्व इथोपिया को विभाजित कर इरीट्रिया की स्थापना आदि इसके उदाहरण हैं। यूगोस्लाविया को भी एक बार फिर धर्म आधारित देशों में विभाजित किया गया। करीब-करीब वही स्थिति बाल्टिक गणराज्यों में हुई तथा मध्य एशिया के सोवियत गणराज्यों में भी यही प्रयोग दोहराने के प्रयास किए गए।'
(अक्षर पर्व अक्टूबर 2015 अंक की प्रस्तावना)
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